मिजोरम के चर्च संगठनों ने प्रस्तावित FCRA संशोधन विधेयक 2026 के विरोध में 11 अगस्त को आइजोल में विरोध रैली आयोजित करने का फैसला किया है। चर्च नेताओं का कहना है कि नए प्रावधान धार्मिक और सामाजिक संस्थाओं के कामकाज को प्रभावित कर सकते हैं।
आइजोल: मिजोरम में प्रस्तावित विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (FCRA) संशोधन विधेयक 2026 को लेकर विरोध तेज होता जा रहा है। राज्य के प्रमुख चर्च संगठनों के समूह काउंसिल ऑफ चर्चेज इन मिजोरम (CCM) ने इस विधेयक के विरोध में 11 अगस्त को राजधानी आइजोल में एक बड़ी विरोध रैली आयोजित करने की घोषणा की है। चर्च संगठनों का कहना है कि प्रस्तावित संशोधन विदेशी योगदान प्राप्त करने वाली धार्मिक और सामाजिक संस्थाओं के कामकाज को प्रभावित कर सकते हैं। CCM ने इस मुद्दे को लेकर चिंता जताते हुए कहा कि नए नियमों का असर चर्चों द्वारा संचालित सामाजिक कल्याण कार्यक्रमों और सामुदायिक सेवाओं पर पड़ सकता है। यह विरोध प्रदर्शन मिजोरम के चर्च समुदाय की ओर से एक महत्वपूर्ण सामूहिक पहल माना जा रहा है, क्योंकि राज्य में चर्च संस्थाओं की सामाजिक और सांस्कृतिक भूमिका लंबे समय से प्रभावशाली रही है।
नौ प्रमुख चर्च संगठनों ने मिलकर लिया फैसला
काउंसिल ऑफ चर्चेज इन मिजोरम (CCM) राज्य के नौ प्रमुख ईसाई संप्रदायों का प्रतिनिधित्व करता है। इसमें प्रेस्बिटेरियन चर्च ऑफ इंडिया (PCI), बैपटिस्ट चर्च ऑफ मिजोरम (BCM) सहित कई प्रमुख धार्मिक संस्थाएं शामिल हैं। CCM ने 30 जुलाई को अपने फैसले की जानकारी सार्वजनिक की। संगठन ने कहा कि प्रस्तावित FCRA संशोधन विधेयक को लेकर चर्च समुदाय में गंभीर चिंताएं हैं और इन चिंताओं को सरकार तथा आम जनता तक पहुंचाने के लिए रैली आयोजित की जाएगी। चर्च नेताओं का कहना है कि विदेशी योगदान कई धार्मिक और गैर-सरकारी संस्थाओं के लिए सामाजिक सेवा गतिविधियों का महत्वपूर्ण स्रोत रहा है। इनमें शिक्षा, स्वास्थ्य, गरीबों की सहायता और सामुदायिक विकास जैसे कार्य शामिल हैं।
चर्च संगठनों ने सरकार के रुख पर उठाए सवाल
CCM नेतृत्व ने राज्य सरकार के रवैये को लेकर भी नाराजगी जताई है। चर्च प्रतिनिधियों का आरोप है कि सरकार ने इस विधेयक से जुड़े मुद्दों पर अपेक्षित गंभीरता नहीं दिखाई। संगठन का कहना है कि यदि संशोधन लागू होता है तो इसका असर केवल धार्मिक संस्थाओं तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि उन सामाजिक कार्यक्रमों पर भी पड़ सकता है जो जरूरतमंद लोगों तक सहायता पहुंचाते हैं। चर्च नेताओं ने कहा कि प्रस्तावित बदलावों पर व्यापक चर्चा की आवश्यकता है और सभी संबंधित पक्षों की चिंताओं को ध्यान में रखा जाना चाहिए।
FCRA संशोधन विधेयक को लेकर क्या है चिंता?
विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (FCRA) भारत में विदेशी धन प्राप्त करने वाली संस्थाओं के लिए नियम तय करता है। इसका उद्देश्य विदेशी योगदान के उपयोग में पारदर्शिता और निगरानी सुनिश्चित करना है। सरकार समय-समय पर इस कानून में संशोधन करती रही है ताकि विदेशी धन के इस्तेमाल पर नियंत्रण और जवाबदेही बढ़ाई जा सके। हालांकि, आलोचकों का कहना है कि कड़े नियमों से कई गैर-सरकारी संगठनों और धार्मिक संस्थाओं की गतिविधियां प्रभावित हो सकती हैं। उनका तर्क है कि सामाजिक सेवा कार्यों के लिए मिलने वाले संसाधनों पर इसका असर पड़ सकता है।
मिजोरम में चर्चों की सामाजिक भूमिका
मिजोरम में चर्च केवल धार्मिक संस्थाओं तक सीमित नहीं हैं, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक विकास के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। राज्य के कई हिस्सों में चर्च आधारित संस्थाएं स्कूल, स्वास्थ्य केंद्र और सामुदायिक सहायता कार्यक्रम संचालित करती हैं। यही कारण है कि FCRA से जुड़े बदलावों को लेकर यहां के चर्च समुदाय में विशेष रुचि और चिंता देखी जा रही है। राजनीतिक और सामाजिक विश्लेषकों के अनुसार, मिजोरम में चर्च संस्थाओं का प्रभाव व्यापक है और उनके किसी भी बड़े आंदोलन का सामाजिक असर देखने को मिल सकता है।
11 अगस्त की रैली में बड़ी भागीदारी की उम्मीद
CCM द्वारा आयोजित रैली में आइजोल और आसपास के क्षेत्रों से बड़ी संख्या में लोगों के शामिल होने की संभावना जताई जा रही है। चर्च संगठनों का उद्देश्य सरकार तक अपनी चिंताएं पहुंचाना और प्रस्तावित कानून के संभावित प्रभावों पर ध्यान आकर्षित करना है। हालांकि अभी यह स्पष्ट नहीं है कि रैली के बाद चर्च संगठन आगे कौन-सा कदम उठाएंगे, लेकिन यह प्रदर्शन FCRA संशोधन विधेयक को लेकर राज्य में बढ़ते विरोध का संकेत माना जा रहा है।
केंद्र की ओर से विधेयक पर नजर
प्रस्तावित FCRA संशोधन विधेयक 2026 को संसद के मानसून सत्र में पेश किए जाने की संभावना है। इसके बाद विधेयक पर संसद में चर्चा होगी और अंतिम निर्णय संसदीय प्रक्रिया के अनुसार लिया जाएगा। सरकार की ओर से ऐसे संशोधनों का उद्देश्य आमतौर पर विदेशी योगदान के प्रबंधन को मजबूत करना और वित्तीय पारदर्शिता सुनिश्चित करना बताया जाता है। वहीं विरोध करने वाले संगठन चाहते हैं कि नए प्रावधानों को लागू करने से पहले उनके प्रभावों का विस्तृत अध्ययन किया जाए।
राजनीतिक और सामाजिक महत्व
मिजोरम में चर्चों का यह कदम केवल धार्मिक मुद्दे तक सीमित नहीं है, बल्कि यह नागरिक समाज, सामाजिक संस्थाओं और सरकारी नीतियों के बीच संबंधों को भी दर्शाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में ऐसे विरोध प्रदर्शन नीतिगत फैसलों पर सार्वजनिक चर्चा का माध्यम होते हैं। सरकार और संबंधित संगठनों के बीच संवाद से समाधान की संभावना बढ़ सकती है।











