Monsoon 2026: 125 साल में पहली बार पूर्वोत्तर में कम बारिश, 316 जिलों में सूखे जैसे हालात; जानें अल नीनो का असर

Monsoon 2026: पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत में 1901 के बाद सबसे कम मॉनसूनी बारिश दर्ज हुई। जानिए 316 जिलों में सूखे जैसे हालात और अल नीनो का मानसून पर असर।

मौसम विभाग के अनुसार, इस साल भारत में दक्षिण-पश्चिम मानसून 2001 के बाद चौथा सबसे कमजोर रहा। सामान्य मानसून सत्र में 868.6 मिलीमीटर बारिश होती है, जबकि इस वर्ष 759.4 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई, जो दीर्घकालिक औसत का सिर्फ 87.4 फीसदी है।

नई दिल्ली: भारत में दक्षिण-पश्चिम मानसून 2026 का सीजन बारिश के लिहाज से चुनौतीपूर्ण रहा। मौसम विभाग के आंकड़ों के अनुसार, 2001 के बाद यह देश का चौथा सबसे कमजोर मानसून रहा। सामान्य मानसूनी बारिश 868.6 मिलीमीटर मानी जाती है, जबकि इस साल करीब 759.4 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई। यह दीर्घकालिक औसत यानी LPA का लगभग 87.4 प्रतिशत है। मानसून की सबसे बड़ी चिंता केवल कुल बारिश की कमी नहीं रही, बल्कि अलग-अलग क्षेत्रों में बारिश का बेहद असमान वितरण भी रहा।

इस मानसून पर प्रशांत महासागर में सक्रिय अल नीनो की स्थिति का प्रभाव चर्चा में रहा। अल नीनो के दौरान प्रशांत महासागर के समुद्री सतह के तापमान में असामान्य बढ़ोतरी होती है, जिसका असर वैश्विक मौसम प्रणालियों पर पड़ सकता है। भारत में इसका प्रभाव मानसून की तीव्रता और वितरण के रूप में देखने को मिल सकता है। मौजूदा मजबूत अल नीनो की स्थिति के मार्च 2027 तक बने रहने की संभावना बताई गई है।

पूर्व और पूर्वोत्तर भारत में 125 साल का रिकॉर्ड

मानसून 2026 का सबसे गंभीर प्रभाव पूर्व और पूर्वोत्तर भारत में दिखाई दिया। इस क्षेत्र में करीब 1,014-1,017 मिलीमीटर बारिश हुई, जो सामान्य स्तर का लगभग 74 प्रतिशत है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक 1901 के बाद यह इस क्षेत्र का सबसे कम बारिश वाला मानसून रहा। यानी करीब 125 वर्षों में पहली बार इतनी कम मानसूनी वर्षा दर्ज की गई।

बारिश की कमी का असर कई राज्यों में व्यापक रहा। बिहार में लगातार पांचवें वर्ष कम बारिश की स्थिति बनी और राज्य के 38 में से 31 जिलों में सामान्य से कम वर्षा दर्ज की गई। इससे कृषि, जल संसाधन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ने की चिंता पैदा हुई।

दक्षिण भारत में भी बारिश की भारी कमी

दक्षिण प्रायद्वीपीय भारत में भी मानसून सामान्य से काफी कमजोर रहा। यहां करीब 542 मिलीमीटर बारिश हुई, जो दीर्घकालिक औसत का लगभग 76 प्रतिशत है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार यह 2001 के बाद इस क्षेत्र के सबसे कमजोर मानसूनों में शामिल रहा। इसके विपरीत मध्य भारत में बारिश करीब 97 प्रतिशत LPA और उत्तर-पश्चिम भारत में लगभग 94.1 प्रतिशत LPA रही। इन क्षेत्रों में कुल मिलाकर स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर रही। हालांकि, क्षेत्रीय औसत के पीछे जिलों और राज्यों के बीच काफी अंतर रहा।

316 जिलों में सूखे जैसे हालात

देश में बारिश की कमी का असर बड़ी संख्या में जिलों पर पड़ा। आंकड़ों के अनुसार करीब 43 प्रतिशत जिलों में सामान्य से कम या बहुत कम बारिश दर्ज की गई। लगभग 316 जिलों में सूखे जैसी स्थिति का उल्लेख किया गया है। इसका सीधा असर खेती, जलाशयों, भूजल और ग्रामीण क्षेत्रों की जल उपलब्धता पर पड़ सकता है।

पंजाब में पिछले साल सामान्य से 41 प्रतिशत अधिक बारिश हुई थी, लेकिन 2026 में करीब 42 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई। पश्चिमी राजस्थान में भी पिछले आठ वर्षों में पहली बार मानसूनी बारिश में करीब 31 प्रतिशत की गिरावट आई। यह क्षेत्र के लिए 2009 के बाद सबसे कमजोर मानसून सीजन बताया गया है।

जून में सबसे बड़ी बारिश की कमी

मासिक आंकड़ों में जून सबसे खराब रहा। इस महीने देश में सामान्य से 35.4 प्रतिशत कम बारिश हुई। अगस्त में कमी करीब 16.3 प्रतिशत और सितंबर में 7.6 प्रतिशत रही। जुलाई ऐसा महीना रहा जिसमें बारिश सामान्य से लगभग 1 प्रतिशत अधिक दर्ज की गई। मौसम विभाग के अनुसार मानसून के दौरान बने कम दबाव वाले तंत्रों ने बारिश की कमी को कुछ हद तक कम किया। इस सीजन में 14 कम दबाव वाले तंत्र बने और उनसे जुड़े करीब 77 दिन दर्ज किए गए, जबकि सामान्य तौर पर ऐसे तंत्र लगभग 57 दिनों तक सक्रिय रहते हैं।

ओडिशा में मानसून ने बनाया अलग रिकॉर्ड

जहां देश के कई हिस्सों में बारिश की कमी रही, वहीं ओडिशा इसका प्रमुख अपवाद रहा। राज्य में 1,480 मिलीमीटर से अधिक बारिश दर्ज की गई, जो पिछले 20 वर्षों में सबसे अधिक बताई गई है। यह 1901 के बाद ओडिशा के पांच सबसे अधिक बारिश वाले मानसून सीजन में भी शामिल है। मानसून 2026 के आंकड़े बताते हैं कि देश में बारिश का संकट केवल कम वर्षा तक सीमित नहीं रहा। 

अलग-अलग क्षेत्रों में वर्षा के वितरण में बड़ा अंतर देखने को मिला। अल नीनो जैसी वैश्विक जलवायु परिस्थितियों के बीच यह स्थिति कृषि, जल प्रबंधन और आगामी मौसम की योजना के लिए महत्वपूर्ण संकेत देती है।

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