मुजफ्फरपुर में जन्माष्टमी का पर्व कई परिवारों के लिए दोहरी खुशी लेकर आया। भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के दिन जिले के अलग-अलग अस्पतालों में कुल 55 बच्चों ने जन्म लिया। इनमें 34 बेटे और 21 बेटियां शामिल हैं। बच्चों के जन्म के साथ ही अस्पतालों में परिवारों के बीच खुशी का माहौल रहा। कई परिजनों ने नवजात को भगवान कृष्ण के जन्मदिन पर जन्म लेने को शुभ माना और अस्पताल परिसर में एक-दूसरे को मिठाई खिलाकर खुशी जताई।
जन्माष्टमी को लेकर इस बार गर्भवती महिलाओं के परिजनों में बच्चों के जन्म के समय को लेकर भी खास उत्सुकता देखने को मिली। अस्पताल में तैनात डॉक्टरों के अनुसार कई परिवारों की इच्छा थी कि उनके बच्चे का जन्म ठीक रात 12 बजे हो, क्योंकि धार्मिक मान्यता के अनुसार इसी समय भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था। हालांकि चिकित्सकों ने स्पष्ट किया कि प्रसव का समय बच्चे और मां की स्वास्थ्य स्थिति के आधार पर ही तय किया जाता है। केवल किसी विशेष समय पर जन्म कराने के लिए सामान्य प्रसव की प्रक्रिया को रोकना या ऑपरेशन का समय बदलना उचित नहीं होता।
अस्पताल में डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों के लिए भी जन्माष्टमी का दिन व्यस्त रहा। प्रसव के लिए पहुंची महिलाओं की जांच, डिलीवरी और नवजात बच्चों की देखभाल में मेडिकल टीम लगातार जुटी रही। कई महिलाओं को प्रसव पीड़ा के बाद अस्पताल लाया गया, जहां डॉक्टरों ने उनकी स्थिति की जांच करने के बाद सामान्य प्रसव या जरूरत के अनुसार अन्य चिकित्सकीय प्रक्रिया से डिलीवरी कराई।
परिजनों के बीच सबसे ज्यादा चर्चा उन बच्चों को लेकर रही, जिनका जन्म जन्माष्टमी की रात हुआ। कई परिवारों ने इसे भगवान कृष्ण का आशीर्वाद बताया। अस्पताल में नवजात के जन्म के बाद परिवार के सदस्य फोन पर रिश्तेदारों को इसकी जानकारी देते रहे। कुछ परिवारों के लिए यह जन्माष्टमी लंबे समय तक याद रहने वाला पर्व बन गया, क्योंकि इसी दिन उनके घर में नए सदस्य का आगमन हुआ।
डॉक्टरों ने बताया कि जन्माष्टमी जैसे धार्मिक पर्वों पर बच्चे के जन्म का समय तय करने को लेकर परिवारों की विशेष इच्छा सामने आना कोई नई बात नहीं है। कई बार परिजन शुभ मुहूर्त या धार्मिक अवसर को ध्यान में रखते हुए डिलीवरी का समय जानना चाहते हैं। इस बार भी कुछ परिवारों ने रात 12 बजे के आसपास बच्चे के जन्म की इच्छा जाहिर की। डॉक्टरों ने ऐसे मामलों में परिजनों को समझाया कि प्रसव प्रकृति की प्रक्रिया है और सबसे पहली प्राथमिकता मां और बच्चे की सुरक्षा है।
अस्पतालों में जन्म लेने वाले 55 बच्चों में लड़कों की संख्या अधिक रही। कुल 34 लड़कों के जन्म के साथ जहां परिवारों में बेटे के आने की खुशी रही, वहीं 21 बेटियों के जन्म ने भी घर-परिवार में खुशियां बिखेरीं। जन्म के बाद अस्पताल के प्रसव कक्ष से बाहर निकलने वाले परिजनों के चेहरे पर खुशी साफ दिखाई दी। कई परिवारों ने नवजात को पहली बार गोद में लेने के बाद इसे अपनी जिंदगी का सबसे खास पल बताया।
जन्माष्टमी के मौके पर अस्पतालों में सामान्य दिनों की तरह ही प्रसव संबंधी सेवाएं जारी रहीं। डॉक्टरों और नर्सिंग स्टाफ ने प्रसव के लिए आने वाली महिलाओं की जांच की और जरूरत के अनुसार तत्काल उपचार उपलब्ध कराया। नवजात बच्चों की शुरुआती जांच, वजन और स्वास्थ्य की निगरानी भी की गई। मां और बच्चे को सुरक्षित रखने के लिए चिकित्सकीय प्रोटोकॉल का पालन किया गया।
डॉक्टरों का कहना है कि किसी धार्मिक पर्व पर बच्चे का जन्म होना परिवार के लिए भावनात्मक रूप से खास हो सकता है, लेकिन प्रसव का निर्णय पूरी तरह चिकित्सकीय स्थिति के आधार पर होना चाहिए। यदि महिला को तत्काल प्रसव की जरूरत है तो डिलीवरी में देरी करना मां और बच्चे दोनों के लिए जोखिम बढ़ा सकता है। इसी तरह यदि सामान्य प्रसव संभव है तो सिर्फ किसी विशेष समय पर बच्चे के जन्म की इच्छा के कारण अनावश्यक हस्तक्षेप से बचना चाहिए।
मुजफ्फरपुर में जन्माष्टमी के दिन 55 बच्चों के जन्म की खबर सामने आने के बाद अस्पताल में मौजूद परिवारों के बीच भी इस दिन को लेकर खास चर्चा रही। जिन घरों में बेटा या बेटी जन्मी, वहां जन्माष्टमी का उत्सव नए सदस्य के स्वागत के साथ और खास हो गया। परिवार के बुजुर्गों ने नवजात को आशीर्वाद दिया और माता-पिता को बधाई दी।
इस तरह भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के दिन मुजफ्फरपुर के अस्पतालों में 55 परिवारों के लिए भी खुशी का अवसर आया। 34 बेटों और 21 बेटियों के जन्म से अस्पतालों में दिनभर नवजात बच्चों की किलकारियां गूंजती रहीं। वहीं रात 12 बजे बच्चे के जन्म की इच्छा रखने वाले परिवारों के बीच डॉक्टरों की सलाह भी चर्चा में रही कि किसी भी शुभ समय से ज्यादा जरूरी मां और नवजात की सुरक्षित डिलीवरी है।