बिहार के नालंदा में हुई भगदड़ की घटना के बाद घायलों का दर्द अब सामने आने लगा है। पीड़ितों ने आरोप लगाया है कि उन्हें न तो समय पर समुचित इलाज मिला और न ही सरकार की ओर से कोई ठोस सहायता दी गई। उनका कहना है कि मुआवजा तो दूर, उन्हें अपनी जेब से हजारों रुपये खर्च कर इलाज कराना पड़ा।
घायलों के अनुसार, भगदड़ के बाद उन्हें अस्पताल पहुंचाया जरूर गया, लेकिन वहां उचित इलाज की व्यवस्था नहीं थी। कई मरीजों का आरोप है कि डॉक्टरों ने सिर्फ प्राथमिक उपचार देकर उन्हें वापस भेज दिया, जिसके बाद उन्हें निजी अस्पतालों का सहारा लेना पड़ा।
एक घायल ने बताया कि उसने अब तक करीब 30 हजार रुपये अपने इलाज पर खर्च कर दिए हैं। बावजूद इसके उसकी तबीयत में सुधार नहीं हुआ, बल्कि लगातार दवाइयां खाने से पेट में संक्रमण हो गया। उसने कहा कि “हमने सोचा था कि सरकार मदद करेगी, लेकिन हमें खुद ही सब कुछ संभालना पड़ रहा है।”
पीड़ितों का कहना है कि सरकारी अस्पतालों में दवाइयों की कमी और सुविधाओं का अभाव साफ नजर आया। कई लोगों ने आरोप लगाया कि उन्हें जरूरी जांच और दवाइयां समय पर नहीं मिलीं, जिससे उनकी हालत और बिगड़ गई।
परिजनों ने भी सरकार और प्रशासन पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि घटना के समय बड़े-बड़े दावे किए गए थे कि सभी घायलों का मुफ्त इलाज कराया जाएगा, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि इस तरह की घटनाओं के बाद प्रशासन को तुरंत और प्रभावी कदम उठाने चाहिए, ताकि पीड़ितों को राहत मिल सके। उन्होंने मांग की है कि घायलों को उचित मुआवजा और बेहतर इलाज की सुविधा दी जाए।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि गंभीर घटनाओं के बाद घायलों को निरंतर निगरानी और उचित चिकित्सा की जरूरत होती है। यदि समय पर सही इलाज नहीं मिलता, तो स्थिति और खराब हो सकती है, जैसा कि इस मामले में देखा जा रहा है।
इस पूरे मामले ने एक बार फिर सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या आपात स्थिति में सिस्टम वास्तव में तैयार है, यह एक बड़ा सवाल बनकर सामने आया है।
प्रशासन की ओर से फिलहाल इस मामले पर कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन माना जा रहा है कि इस खुलासे के बाद जांच हो सकती है और जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई की जा सकती है।
कुल मिलाकर, नालंदा भगदड़ के पीड़ितों की यह आपबीती न केवल उनकी व्यक्तिगत पीड़ा को दर्शाती है, बल्कि यह भी बताती है कि आपदा के बाद राहत और चिकित्सा व्यवस्था में सुधार की कितनी जरूरत है।












