नोएडा में आयोजित एक विमर्श कार्यक्रम में पूर्व डीडीए उपाध्यक्ष बलविंदर कुमार ने कहा कि एनसीआर का मूल उद्देश्य अब तक पूरा नहीं हो सका है। उन्होंने नियोजन में देरी, समन्वय की कमी और कमजोर प्रवर्तन व्यवस्था को इसकी प्रमुख वजह बताया।
Noida: राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) की स्थापना दिल्ली पर बढ़ते दबाव को कम करने और आसपास के शहरों के संतुलित विकास के उद्देश्य से की गई थी। हालांकि, पूर्व डीडीए उपाध्यक्ष बलविंदर कुमार का मानना है कि चार दशक बाद भी यह लक्ष्य पूरी तरह हासिल नहीं हो पाया है। उनके अनुसार, योजनाओं की कमी नहीं रही, लेकिन प्रभावी क्रियान्वयन और समन्वित विकास के अभाव ने एनसीआर की अवधारणा को अपेक्षित सफलता से दूर रखा है।
बढ़ता दायरा, कमजोर होता मूल उद्देश्य
डीडीए के पूर्व उपाध्यक्ष बलविंदर कुमार ने दैनिक जागरण के विमर्श कार्यक्रम में कहा कि समय के साथ एनसीआर का क्षेत्रफल लगातार बढ़ाया गया, जिससे इसके मूल उद्देश्य पर असर पड़ा। वर्तमान में एनसीआर लगभग 55 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है। उनका मानना है कि इतने बड़े क्षेत्र में समान विकास सुनिश्चित करना चुनौतीपूर्ण है।
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उन्होंने कहा कि यदि एनसीआर की अवधारणा दिल्ली से सटे प्रमुख शहरों जैसे नोएडा, ग्रेटर नोएडा, गुरुग्राम और फरीदाबाद तक सीमित रहती, तो विकास योजनाओं का प्रभाव अधिक स्पष्ट दिखाई देता। क्षेत्र के विस्तार के साथ प्रशासनिक और राजनीतिक जटिलताएं भी बढ़ीं, जिससे समन्वित विकास की प्रक्रिया प्रभावित हुई।
मास्टर प्लान और नियोजन में देरी बनी चुनौती
बलविंदर कुमार ने कहा कि एनसीआर के विभिन्न राज्यों और शहरों के बीच शहरी नियोजन, मास्टर प्लान और बिल्डिंग बायलाज को लेकर अपेक्षित तालमेल विकसित नहीं हो पाया। इसका परिणाम यह है कि कई क्षेत्रों में अनियोजित निर्माण, अतिक्रमण और अव्यवस्थित शहरीकरण जैसी समस्याएं आज भी बनी हुई हैं।
उन्होंने दिल्ली के वर्ष 2041 के मास्टर प्लान का उदाहरण देते हुए कहा कि इसे वर्ष 2021 में ही मंजूरी मिल जानी चाहिए थी, लेकिन अभी तक इसे अंतिम स्वीकृति नहीं मिल सकी है। ऐसी स्थिति में पूरे एनसीआर में नियोजित विकास की गति प्रभावित होना स्वाभाविक है।
हाल ही में आई कैग रिपोर्ट में भी एनसीआर प्लानिंग बोर्ड की कार्यप्रणाली से जुड़ी कई कमियों की ओर ध्यान दिलाया गया है। उनके अनुसार, बोर्ड के पास प्रभावी प्रवर्तन शक्तियां नहीं होने के कारण योजनाओं को लागू कराने में कठिनाई आती है।
प्रवर्तन शक्तियों और नीतियों में सुधार की जरूरत
बलविंदर कुमार का कहना है कि यदि एनसीआर प्लानिंग बोर्ड को अतिक्रमण रोकने और नियोजन संबंधी नियमों को लागू कराने के लिए अधिक अधिकार दिए जाएं, तो स्थिति में सुधार संभव है। उन्होंने यह भी कहा कि दिल्ली से 100 किलोमीटर से अधिक दूर स्थित क्षेत्रों को एनसीआर का अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाया है।
ग्रेप (GRAP) के तहत लंबे समय तक निर्माण गतिविधियों पर रोक लगाने की व्यवस्था पर भी उन्होंने सवाल उठाए। उनका मानना है कि इससे रोजगार और विकास कार्य प्रभावित होते हैं। साथ ही उन्होंने दिल्ली में सार्वजनिक परिवहन वाहनों से वसूले जाने वाले एमसीडी टोल शुल्क को भी अनुचित बताते हुए इसे समाप्त करने की मांग की।
उन्होंने कहा कि एक ओर सरकार प्रदूषण कम करने के लिए सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा देना चाहती है, वहीं दूसरी ओर टैक्सी और ऑटो जैसे वाहनों पर अतिरिक्त शुल्क लगाया जाता है। ऐसी नीतियां सार्वजनिक परिवहन को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य के विपरीत हैं।
एनसीआर के विकास मॉडल पर उठे ये सवाल इस बात की ओर संकेत करते हैं कि क्षेत्र के दीर्घकालिक और संतुलित विकास के लिए केवल योजनाएं बनाना पर्याप्त नहीं है। प्रभावी क्रियान्वयन, बेहतर समन्वय और मजबूत संस्थागत व्यवस्था के बिना एनसीआर की मूल अवधारणा को पूरी तरह साकार करना अब भी एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।









