नेतन्याहू का ब्रिटेन पर विवादित बयान, ‘इस्लामिक रिपब्लिक’ कहने से छिड़ी बहस

इजराइली PM नेतन्याहू ने ब्रिटेन की बदलती आबादी और इजराइल के प्रति बदलते रुख पर टिप्पणी की। उनके ब्रिटेन को ‘इस्लामिक रिपब्लिक’ बताने वाले बयान पर बहस छिड़ी।

इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने ब्रिटेन की बदलती आबादी और इजराइल के प्रति बदलते नजरिए पर टिप्पणी करते हुए देश को ‘इस्लामिक रिपब्लिक’ बताया। उनके बयान ने ब्रिटेन की राजनीति, प्रवासन और पश्चिमी देशों में इजराइल की छवि को लेकर नई बहस छेड़ दी।

तेल अवीव: इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की ब्रिटेन को लेकर की गई टिप्पणी ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक बहस को तेज कर दिया है। नेतन्याहू ने ब्रिटेन में जनसांख्यिकीय बदलाव और इजराइल के प्रति बदलते राजनीतिक तथा सामाजिक नजरिए का जिक्र करते हुए देश को भविष्य में ‘इस्लामिक रिपब्लिक’ बनने की दिशा में बढ़ता हुआ बताया। हालांकि, यह टिप्पणी राजनीतिक आकलन और आलोचना के तौर पर सामने आई है, क्योंकि ब्रिटेन संवैधानिक रूप से एक लोकतांत्रिक देश है और उसकी शासन व्यवस्था किसी एक धर्म पर आधारित नहीं है।

नेतन्याहू का बयान ऐसे समय आया है जब गाजा युद्ध, इजराइल की सैन्य कार्रवाई और फिलिस्तीनी मुद्दे को लेकर यूरोप के कई देशों में इजराइल की नीतियों पर बहस जारी है। ब्रिटेन में भी इजराइल के प्रति राजनीतिक रुख और गाजा में मानवीय स्थिति को लेकर चर्चा और आलोचना बढ़ी है।

ब्रिटेन के बदलते नजरिए का किया जिक्र

नेतन्याहू ने ब्रिटेन और यूरोप में बदलती आबादी का उल्लेख करते हुए कहा कि कुछ दशक पहले इजराइल को लेकर ब्रिटेन में माहौल आज की तुलना में अलग था। उन्होंने 1967 के अरब-इजराइल युद्ध का उदाहरण देते हुए बताया कि उस समय ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल के परिवार से जुड़े पत्रकार इजराइल पहुंचे थे और वहां से युद्ध की रिपोर्टिंग की थी। नेतन्याहू के मुताबिक, उस दौर में ब्रिटेन में इजराइल के प्रति जिस तरह की सहानुभूति या समर्थन दिखाई देता था, वैसा माहौल आज देखना मुश्किल है। उन्होंने इस बदलाव को यूरोप में हो रहे व्यापक सामाजिक और जनसांख्यिकीय परिवर्तन से जोड़ने की कोशिश की।

हालांकि, किसी देश की विदेश नीति में बदलाव को केवल आबादी में बदलाव से जोड़ना एक जटिल राजनीतिक मुद्दा है। ब्रिटेन की इजराइल नीति पर घरेलू राजनीति, अंतरराष्ट्रीय कानून, गाजा की मानवीय स्थिति, अमेरिका के साथ संबंध और मध्य-पूर्व की व्यापक परिस्थितियों जैसे कई कारकों का प्रभाव पड़ता है।

यूरोप में मुस्लिम आबादी को लेकर नेतन्याहू की चिंता

नेतन्याहू पहले भी यूरोप में बढ़ती मुस्लिम आबादी और प्रवासन के मुद्दे पर चिंता व्यक्त करते रहे हैं। उनका तर्क रहा है कि यूरोपीय समाजों में जनसांख्यिकीय बदलाव भविष्य में वहां की राजनीति और विदेश नीति को प्रभावित कर सकते हैं। 7 अक्टूबर 2023 को हमास के इजराइल पर हमले के बाद गाजा में इजराइल ने व्यापक सैन्य अभियान शुरू किया। इस अभियान के दौरान बड़ी संख्या में फिलिस्तीनी नागरिकों के मारे जाने और मानवीय संकट को लेकर दुनिया भर में चिंता जताई गई। कई यूरोपीय सरकारों ने इजराइल के सैन्य अभियान के तरीके और नागरिकों पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर आलोचना की।

नेतन्याहू का मानना है कि यूरोप में बदलती आबादी और मुस्लिम समुदाय के बढ़ते राजनीतिक प्रभाव का असर इजराइल के प्रति यूरोपीय देशों के नजरिए पर भी पड़ रहा है। हालांकि, यह उनका राजनीतिक विश्लेषण है और इसे ब्रिटेन या यूरोप की आधिकारिक नीति के रूप में नहीं देखा जा सकता।

जेडी वेंस की पुरानी टिप्पणी से समानता

नेतन्याहू की टिप्पणी की तुलना अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस की पहले की एक टिप्पणी से भी की जा रही है। वेंस ने 2024 में ब्रिटेन में लेबर पार्टी के सत्ता में आने और वहां प्रवासन से जुड़ी नीतियों पर टिप्पणी करते हुए परमाणु हथियारों वाले संभावित ‘इस्लामिक देश’ का संदर्भ दिया था।

उस समय वेंस ने मजाकिया अंदाज में इस संभावना पर बात की थी कि ऐसा देश ईरान या पाकिस्तान हो सकता है। उन्होंने ब्रिटेन को लेकर भी विवादास्पद टिप्पणी की थी और लेबर पार्टी की नीतियों पर सवाल उठाया था। उस समय वेंस अमेरिकी सीनेटर थे और बाद में वह डोनाल्ड ट्रंप के उपराष्ट्रपति बने।

दोनों टिप्पणियों में ब्रिटेन की जनसांख्यिकी, प्रवासन और राजनीति को लेकर एक समान राजनीतिक चिंता दिखाई देती है, हालांकि दोनों नेताओं के बयान अलग-अलग संदर्भों में दिए गए थे।

फैक्ट चेक: क्या ब्रिटेन ‘इस्लामिक रिपब्लिक’ है?

यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य स्पष्ट करना जरूरी है। ब्रिटेन ‘इस्लामिक रिपब्लिक’ नहीं है। यूनाइटेड किंगडम एक संवैधानिक राजतंत्र और संसदीय लोकतंत्र है। देश की सरकार और कानून किसी एक धर्म के शासन पर आधारित नहीं हैं। ब्रिटेन में धार्मिक स्वतंत्रता और विभिन्न समुदायों के अधिकार संवैधानिक तथा कानूनी व्यवस्था के तहत संरक्षित हैं। देश में मुस्लिम आबादी महत्वपूर्ण है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि ब्रिटेन इस्लामी शासन व्यवस्था वाला देश बन गया है या वर्तमान में ऐसा कोई संवैधानिक दर्जा रखता है।

इसके विपरीत, पाकिस्तान का आधिकारिक संवैधानिक नाम इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ पाकिस्तान है। पाकिस्तान ने 1998 में परमाणु परीक्षण किए थे और वह दुनिया का पहला परमाणु हथियार संपन्न मुस्लिम-बहुल देश बना था। इसलिए नेतन्याहू द्वारा ब्रिटेन को ‘इस्लामिक रिपब्लिक’ कहने वाली टिप्पणी को तथ्यात्मक स्थिति के बजाय एक राजनीतिक चेतावनी या आलोचनात्मक बयान के रूप में समझना अधिक उचित होगा।

गाजा युद्ध के बाद बदला यूरोप का रुख

इजराइल और यूरोपीय देशों के संबंधों में गाजा युद्ध के बाद कई स्तरों पर बदलाव देखने को मिला है। जहां कुछ यूरोपीय सरकारें इजराइल के सुरक्षा अधिकार का समर्थन करती रही हैं, वहीं कई देशों में गाजा में नागरिकों की स्थिति और सैन्य कार्रवाई को लेकर आलोचना भी बढ़ी है।

ब्रिटेन में भी यह मुद्दा राजनीतिक रूप से संवेदनशील बना हुआ है। सरकार, विपक्ष, मानवाधिकार संगठन और आम जनता के बीच इजराइल-फिलिस्तीन संघर्ष को लेकर अलग-अलग मत हैं। ऐसे में नेतन्याहू की टिप्पणी को व्यापक अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक संदर्भ में देखा जा रहा है।

विशेषज्ञों के अनुसार, यूरोप की विदेश नीति केवल धार्मिक या जनसांख्यिकीय बदलावों से निर्धारित नहीं होती। सुरक्षा हित, व्यापार, अमेरिका के साथ रणनीतिक संबंध, अंतरराष्ट्रीय कानून, घरेलू चुनावी राजनीति और मानवीय चिंताएं भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

बयान ने फिर छेड़ी पहचान और प्रवासन की बहस

नेतन्याहू की टिप्पणी ने पश्चिमी देशों में प्रवासन, धार्मिक पहचान और बदलती जनसांख्यिकी को लेकर चल रही बहस को एक बार फिर सामने ला दिया है। यूरोप के कई देशों में मुस्लिम आबादी बढ़ी है और प्रवासन राजनीतिक बहस का प्रमुख विषय बना हुआ है।

हालांकि, मुस्लिम आबादी की वृद्धि को किसी देश के लोकतांत्रिक या संवैधानिक स्वरूप में बदलाव के बराबर मानना उचित नहीं है। ब्रिटेन की राजनीतिक व्यवस्था संसद, कानून और संवैधानिक संस्थाओं पर आधारित है।

इस विवाद के बीच सबसे अहम बात यह है कि नेतन्याहू का बयान एक राजनीतिक टिप्पणी है, जबकि ब्रिटेन की वास्तविक संवैधानिक स्थिति इससे अलग है। बयान ने इजराइल, ब्रिटेन, यूरोप, प्रवासन और गाजा युद्ध को लेकर जारी अंतरराष्ट्रीय बहस को जरूर और अधिक तीखा कर दिया है।

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