टाटा संस और टाटा ट्रस्ट के बीच जारी खींचतान के बीच नोएल टाटा को बड़ी कानूनी राहत मिली है। महाराष्ट्र के चैरिटी कमिश्नर ने 1989 में हुए शेयर ट्रांसफर के मामले में उन्हें क्लीन चिट दे दी है।
बिजनेस न्यूज़: टाटा समूह से जुड़े एक पुराने शेयर ट्रांसफर मामले में नोएल टाटा को बड़ी कानूनी राहत मिली है। महाराष्ट्र के चैरिटी कमिश्नर ने 1989 में हुए 833 शेयरों के ट्रांसफर से संबंधित शिकायत को खारिज कर दिया है। जांच के दौरान उपलब्ध दस्तावेजों और उस समय लागू कानूनी प्रावधानों की समीक्षा के बाद कमिश्नर ने माना कि यह लेनदेन तत्कालीन नियमों के अनुरूप था। ऐसे में मामले में आगे किसी जांच की जरूरत नहीं बताई गई।
यह मामला ऐसे समय में सामने आया था, जब टाटा संस और टाटा ट्रस्ट से जुड़े कुछ मुद्दों को लेकर चर्चा तेज थी। शिकायत में शेयरों के पुराने ट्रांसफर की स्वतंत्र जांच की मांग की गई थी।
1989 के शेयर ट्रांसफर पर क्यों उठे सवाल?
मामला नवाजबाई रतन टाटा ट्रस्ट (NRTT) के 833 शेयरों से जुड़ा था। ट्रस्ट के ट्रस्टी विजय सिंह ने इस सौदे को लेकर शिकायत दर्ज कराई थी और पूरे मामले की स्वतंत्र जांच की मांग की थी। शिकायत का केंद्र यह सवाल था कि इन शेयरों का ट्रांसफर किस परिस्थिति में हुआ और क्या उस समय लागू नियमों के तहत यह प्रक्रिया सही थी। मामला करीब चार दशक पुराना होने के कारण इसके मूल्यांकन में उस समय लागू कानूनों, कर नियमों और ट्रस्ट से जुड़े दस्तावेजों को महत्वपूर्ण माना गया।
महाराष्ट्र के चैरिटी कमिश्नर ने उपलब्ध रिकॉर्ड की समीक्षा के बाद शिकायत को खारिज कर दिया। आदेश के अनुसार, शेयरों का ट्रांसफर उस समय लागू वैधानिक प्रावधानों के अनुरूप था। इसलिए इस मामले में अतिरिक्त जांच की आवश्यकता नहीं पाई गई।
शेयर ट्रांसफर में कर नियमों की थी अहम भूमिका
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चैरिटी कमिश्नर के निष्कर्ष में उस समय लागू कर संबंधी प्रावधानों का भी उल्लेख किया गया। आदेश के अनुसार, संबंधित शेयरों की बिक्री तत्कालीन वैधानिक कर दायित्वों को पूरा करने के लिए आवश्यक थी। रिकॉर्ड के मुताबिक, नवल नोएल टाटा ने 1 जनवरी 1988 को ट्रस्टी के पद से इस्तीफा दिया था। इसके करीब एक साल बाद शेयर खरीदने को लेकर तत्कालीन परिस्थितियों और नियमों की समीक्षा की गई।
वरिष्ठ अधिवक्ता नानी ए. पालकीवाला की राय का भी उल्लेख किया गया, जिसमें इस्तीफे के एक वर्ष बाद शेयर खरीदने पर किसी रोक के नहीं होने की बात कही गई थी। इसके अलावा शेयरों का मूल्यांकन वेल्थ टैक्स कमिश्नर की सहमति से किया गया था। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इस लेनदेन से नवाजबाई रतन टाटा ट्रस्ट को शुद्ध वित्तीय लाभ भी हुआ।
विजय सिंह के आचरण पर भी टिप्पणी
चैरिटी कमिश्नर ने शिकायत दर्ज करने की प्रक्रिया को लेकर ट्रस्टी विजय सिंह के आचरण पर भी टिप्पणी की। आदेश में कहा गया कि सिंह 8 जून को हुई बोर्ड बैठक में मौजूद थे। बैठक में ट्रस्ट की ओर से मामले में अपना पक्ष रखने का प्रस्ताव पारित हुआ था। इसके बावजूद, शिकायत के अनुसार, उन्होंने 10 जून को अलग से अपनी शिकायत दर्ज करा दी। कमिश्नर ने इस कदम को ट्रस्ट के ट्रस्टी के रूप में अनुचित और अशोभनीय बताया।
इस टिप्पणी ने मामले को केवल शेयर ट्रांसफर के कानूनी पहलू तक सीमित नहीं रखा, बल्कि ट्रस्ट के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया और ट्रस्टियों की भूमिका पर भी सवाल खड़े किए।
चैरिटी कमिश्नर के फैसले के बाद ट्रस्ट की ओर से शिकायत में लगाए गए आरोपों को निराधार बताया गया। ट्रस्ट का कहना था कि इस पुराने मामले को उठाने का उद्देश्य संस्थान की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाना था। हालांकि, कमिश्नर के आदेश ने उपलब्ध दस्तावेजों और उस समय लागू कानूनी प्रावधानों के आधार पर मामले को आगे बढ़ाने की आवश्यकता नहीं मानी।










