दिल्ली निजी स्कूल फीस विवाद पर हाई कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। अल्पसंख्यक स्कूलों की याचिका पर कोर्ट ने सरकार को नोटिस जारी किया और फीस रेगुलेशन कानून की संवैधानिक वैधता की जांच जरूरी बताई।
New Delhi: दिल्ली के निजी स्कूलों की फीस को लेकर जारी विवाद अब हाई कोर्ट तक पहुंच चुका है। शुक्रवार को दिल्ली हाई कोर्ट ने अल्पसंख्यक स्कूलों को बड़ी राहत देते हुए दिल्ली सरकार और उपराज्यपाल को नोटिस जारी किया है। यह मामला उस नोटिफिकेशन से जुड़ा है, जिसमें निजी स्कूलों को फीस बढ़ाने से पहले सरकारी मंजूरी लेना अनिवार्य किया गया है।
अदालत ने साफ किया कि इस तरह के कानून और आदेशों की संवैधानिक वैधता की गहन जांच जरूरी है। इसी के साथ कोर्ट ने सरकार से जवाब तलब करते हुए मामले की सुनवाई मार्च तक के लिए टाल दी है।
अल्पसंख्यक स्कूलों की याचिका पर सुनवाई
यह मामला अलग अलग अल्पसंख्यक स्कूलों की ओर से दायर याचिकाओं के एक समूह से जुड़ा है। इन स्कूलों ने दिल्ली स्कूल एजुकेशन (फीस निर्धारण और विनियमन में पारदर्शिता) अधिनियम 2025 को चुनौती दी है।
स्कूलों का कहना है कि यह कानून उन्हें संविधान के तहत मिले अधिकारों का उल्लंघन करता है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों को अपने प्रशासन और फीस संरचना तय करने की स्वतंत्रता है।
चीफ जस्टिस की बेंच ने क्या कहा
मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया की पीठ ने इस मामले की सुनवाई की। कोर्ट ने दिल्ली सरकार और उपराज्यपाल दोनों से जवाब मांगा है। बेंच ने यह भी कहा कि इस कानून की संवैधानिक वैधता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अदालत ने माना कि यह मामला केवल प्रशासनिक आदेश का नहीं, बल्कि मौलिक अधिकारों से जुड़ा गंभीर सवाल खड़ा करता है।
फीस कमेटी की समय सीमा बढ़ी
हाई कोर्ट ने स्कूलों को अंतरिम राहत देते हुए फीस रेगुलेशन से जुड़ी समय सीमाओं में भी बदलाव किया है। अदालत ने कहा कि स्कूल अब पहले तय 10 जनवरी की डेडलाइन के बजाय 20 जनवरी तक स्कूल लेवल फीस रेगुलेशन कमेटी बना सकते हैं।
इसके अलावा फीस स्ट्रक्चर से जुड़े प्रस्ताव जमा करने की अंतिम तारीख भी बढ़ा दी गई है। पहले यह तारीख 25 जनवरी थी, जिसे अब 5 फरवरी कर दिया गया है। कोर्ट का मानना है कि बिना पूरी कानूनी जांच के जल्दबाजी उचित नहीं होगी।
नए कानून को लेकर मुख्य आपत्ति

अल्पसंख्यक स्कूलों ने साफ कहा है कि दिल्ली स्कूल एजुकेशन एक्ट 2025 संविधान के अनुच्छेद 30 का उल्लंघन करता है। यह अनुच्छेद धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों को अपने शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना और संचालन का अधिकार देता है।
स्कूलों का कहना है कि सरकार फीस को लेकर केवल निगरानी कर सकती है, लेकिन पहले से मंजूरी लेना अनिवार्य करना असंवैधानिक है। उनका तर्क है कि यह अधिकारों में सीधा हस्तक्षेप है।
सरकार की दलील क्या रही
दिल्ली सरकार की ओर से पेश हुए एडिशनल सॉलिसिटर जनरल एस वी राजू ने कानून का बचाव किया। उन्होंने कोर्ट को बताया कि सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों में यह स्पष्ट किया गया है कि सरकार रेगुलेटरी उपाय लागू कर सकती है। फीस रेगुलेशन का मकसद पारदर्शिता लाना और अभिभावकों को मनमानी फीस वृद्धि से राहत देना है। उनके अनुसार यह कानून किसी भी स्कूल के प्रशासनिक अधिकार को खत्म नहीं करता।
DoE के आदेश पर भी सवाल
इस पूरे विवाद की जड़ शिक्षा निदेशालय द्वारा 24 दिसंबर 2025 को जारी आदेश भी है। इस आदेश में बिना सरकारी सहायता वाले निजी स्कूलों को स्कूल लेवल फीस रेगुलेशन कमेटी बनाने का निर्देश दिया गया था।
इस कमेटी में चेयरपर्सन, स्कूल प्रिंसिपल, पांच अभिभावक, तीन शिक्षक और शिक्षा निदेशालय का एक प्रतिनिधि शामिल होना अनिवार्य बताया गया था। स्कूलों का कहना है कि यह संरचना भी उनके स्वायत्त अधिकारों को प्रभावित करती है।
सीनियर वकील मुकुल रोहतगी की दलील
अल्पसंख्यक स्कूलों की ओर से सीनियर एडवोकेट मुकुल रोहतगी ने कोर्ट में जोरदार पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि जब किसी कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई हो, तब तक उससे जुड़े आदेशों पर रोक लगाई जानी चाहिए।
रोहतगी ने दलील दी कि शिक्षा निदेशालय का आदेश खुद नए एक्ट के खिलाफ है और इसलिए गैर कानूनी है। उन्होंने कोर्ट से मांग की कि जब तक अंतिम फैसला नहीं आ जाता, तब तक स्कूलों पर कोई दबाव न बनाया जाए।
पहले भी जारी हुआ था नोटिस
यह पहली बार नहीं है जब हाई कोर्ट ने इस मुद्दे पर हस्तक्षेप किया हो। इससे एक दिन पहले भी कोर्ट ने कई निजी स्कूलों की याचिका पर नोटिस जारी किया था। लगातार आ रही याचिकाओं से यह साफ हो गया है कि फीस रेगुलेशन कानून को लेकर स्कूल प्रबंधन और सरकार के बीच टकराव गहराता जा रहा है।












