गर्भावस्था में वायु प्रदूषण मां और बच्चे दोनों के लिए गंभीर खतरा बन सकता है। पहले ट्राइमेस्टर में जन्मजात दोष और बाद के ट्राइमेस्टर में विकास संबंधी समस्याएं हो सकती हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, जन्म के समय बच्चे के फेफड़े भी प्रदूषित हवा के असर से प्रभावित होते हैं, इसलिए गर्भवती महिलाओं के लिए सुरक्षा जरूरी है।
Pollution Affect Pregnancy: वायु प्रदूषण गर्भवती महिलाओं और उनके बच्चों के लिए गंभीर स्वास्थ्य जोखिम पैदा कर सकता है। दिल्ली-एनसीआर जैसे प्रदूषित शहरों में रहने वाली महिलाएं और उनका भ्रूण विषैले पार्टिकल्स और टॉक्सिन के सीधे संपर्क में आ सकते हैं। पहले ट्राइमेस्टर में अंगों के विकास पर असर, बाद के ट्राइमेस्टर में भ्रूण की वृद्धि में रुकावट और प्रीमैच्योर डिलीवरी जैसी समस्याएं हो सकती हैं। डॉक्टर अरविंद कुमार के अनुसार, यह स्थिति स्वास्थ्य आपातकाल की तरह है और इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
पहले ट्राइमेस्टर में जोखिम
गर्भावस्था के पहले तीन महीनों में बच्चे के अंगों का विकास होता है। इस दौरान अगर मां प्रदूषित हवा में सांस लेती है तो टॉक्सिक केमिकल्स बच्चे के अंगों पर असर डाल सकते हैं। डॉक्टर अरविंद कुमार का कहना है कि इससे कंजनाइटल डिफेक्ट्स (जन्मजात दोष) का खतरा बढ़ जाता है।

बाद के ट्राइमेस्टर में प्रभाव
दूसरे और तीसरे ट्राइमेस्टर में बच्चे की ग्रोथ होती है। प्रदूषण से इंट्रायूटरिन डेथ (गर्भाशय में भ्रूण की मृत्यु), इंट्रायूटरिन ग्रोथ रिटार्डेशन और प्रीमैच्योर डिलीवरी जैसी समस्याएं हो सकती हैं। जन्म के बाद भी बच्चे का फेफड़ा प्रदूषित हवा में सांस लेने से गंभीर रूप से प्रभावित होता है। विशेषज्ञों के अनुसार, AQI 350 जैसी हवा में पैदा होने वाला बच्चा जन्म के साथ ही 15-20 सिगरेट पीने जितना नुकसान झेलता है।
स्वास्थ्य आपात स्थिति
डॉक्टर अरविंद कुमार बताते हैं कि वायु प्रदूषण सिर्फ पर्यावरण का मामला नहीं है, बल्कि यह सीधा स्वास्थ्य संकट है। हर साल प्रदूषण-related बीमारियों और मृत्यु की संख्या कोविड-19 महामारी से भी अधिक होती है। गर्भवती महिलाओं के लिए प्रदूषण जोखिम को कम करना इसलिए अत्यंत जरूरी है।













