सिक्किम टनल हादसा: लैंडस्लाइड के बाद 20 मजदूरों के शव मिले, 5 अब भी फंसे; मीथेन गैस ने बचाव अभियान को बनाया बेहद चुनौतीपूर्ण

सिक्किम के नामची में टनल लैंडस्लाइड के बाद 20 मजदूरों के शव मिले है। मीथेन गैस और मलबे के बीच पांच मजदूरों तक पहुंचने के लिए बचाव अभियान लगातार जारी है।

सिक्किम के नामची जिले में निर्माणाधीन जलविद्युत परियोजना की सुरंग में लैंडस्लाइड के बाद 25 मजदूर फंस गए। अब तक 20 शव बरामद किए जा चुके हैं, जबकि मीथेन गैस और भारी मलबे के बीच पांच मजदूरों तक पहुंचने के लिए राहत अभियान जारी है।

गंगटोक: सिक्किम के नामची जिले में निर्माणाधीन तीस्ता स्टेज-6 हाइड्रोइलेक्ट्रिक परियोजना की सुरंग में हुए भीषण लैंडस्लाइड ने बड़ा मानवीय संकट पैदा कर दिया है। हादसे के बाद सुरंग में फंसे 25 मजदूरों में से 20 के शव बरामद कर लिए गए हैं, जबकि पांच मजदूर अब भी अंदर फंसे हुए हैं। राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय बचाव दल लगातार राहत अभियान चला रहे हैं, लेकिन सुरंग में जमा मलबा और मीथेन गैस की मौजूदगी के कारण ऑपरेशन बेहद कठिन बना हुआ है।

अधिकारियों के अनुसार यह दुर्घटना सोमवार दोपहर लगभग 3:40 बजे हुई, जब अचानक लैंडस्लाइड के कारण सुरंग के एक हिस्से में भारी मात्रा में मलबा भर गया। इसके बाद अंदर काम कर रहे कई मजदूर बाहर नहीं निकल सके।

तीस्ता स्टेज-6 परियोजना की सुरंग में हुआ हादसा

यह हादसा आदित-3 सुरंग में हुआ, जो तीस्ता स्टेज-6 जलविद्युत परियोजना का हिस्सा है। यह परियोजना नामची जिले के समरडुंग-झोलुंगय क्षेत्र में विकसित की जा रही है। सुरंग का निर्माण निजी निर्माण कंपनी पटेल इंजीनियरिंग द्वारा किया जा रहा था। बताया गया है कि सुरंग का प्रभावित हिस्सा फेस-4बी सेक्शन में स्थित है, जहां लैंडस्लाइड के साथ भारी मात्रा में चट्टान और मिट्टी गिरने से रास्ता पूरी तरह बंद हो गया। इसी हिस्से में मीथेन गैस जमा होने की आशंका भी जताई गई है।

मीथेन गैस बनी सबसे बड़ी चुनौती

बचाव अभियान के दौरान सबसे बड़ी बाधा सुरंग में मौजूद मीथेन गैस बनी हुई है। विशेषज्ञों के अनुसार मीथेन स्वयं जहरीली गैस नहीं होती, लेकिन बंद स्थानों में यह ऑक्सीजन की मात्रा को तेजी से कम कर देती है। इससे दम घुटने, बेहोशी और सांस लेने में गंभीर परेशानी का खतरा बढ़ जाता है। रेस्क्यू टीम के कई सदस्य अंदर जाते समय ऑक्सीजन की कमी के कारण बेहोश हो गए, जिसके बाद अभियान को अतिरिक्त सुरक्षा उपायों के साथ आगे बढ़ाया गया। प्रशासन ने सुरंग में ब्लास्ट-प्रूफ ब्लोअर्स और विशेष वेंटिलेशन पाइपों के जरिए लगातार ताजी हवा पहुंचाने की व्यवस्था की है, ताकि गैस का प्रभाव कम किया जा सके।

पांच मजदूरों तक पहुंचने की कोशिश जारी

अधिकारियों के अनुसार जिन पांच मजदूरों तक अभी पहुंचा नहीं जा सका है, वे सुरंग के प्रवेश द्वार से लगभग 1.5 किलोमीटर अंदर फंसे हुए हैं। राहत दल लगातार मलबा हटाकर रास्ता बनाने का प्रयास कर रहे हैं, लेकिन सुरंग की अस्थिर स्थिति के कारण कार्य बेहद धीमी गति से चल रहा है। रेस्क्यू अभियान में आठ-आठ सदस्यों की विशेष टीमें बारी-बारी से सुरंग के भीतर भेजी जा रही हैं। प्रत्येक सदस्य ऑक्सीजन सिलेंडर के सहारे अंदर प्रवेश कर रहा है, लेकिन एक सिलेंडर केवल लगभग 40 मिनट तक ही चल पा रहा है। समय सीमा पूरी होने से पहले टीम को वापस लौटना पड़ता है, जिससे अभियान की गति प्रभावित हो रही है।

आधुनिक तकनीक से हटाया जा रहा मलबा

सुरंग के भीतर जमा भारी मलबे को हटाने के लिए आधुनिक उपकरणों का उपयोग किया जा रहा है। छोटे लोडर, रोबोटिक मशीनें और विशेष खुदाई उपकरणों की मदद से रास्ता साफ करने की कोशिश की जा रही है। इसके साथ ही सुरंग की छत को स्थिर बनाए रखने के लिए शॉटक्रीट और रॉक-बोल्टिंग तकनीक अपनाई जा रही है, ताकि आगे और चट्टानें गिरने का खतरा कम किया जा सके। विशेषज्ञ लगातार सुरंग की संरचनात्मक स्थिति का आकलन भी कर रहे हैं।

सिक्किम टनल हादसा: लैंडस्लाइड के बाद 20 मजदूरों के शव मिले, 5 अब भी फंसे; मीथेन गैस ने बचाव अभियान को बनाया बेहद चुनौतीपूर्ण

लैंडस्लाइड के कारण बाधित हुआ पूरा बचाव अभियान

हादसे के बाद सुरंग के प्रवेश क्षेत्र में बड़ी मात्रा में मलबा जमा हो गया, जिससे राहत दलों को अंदर पहुंचने में काफी कठिनाई हुई। सुरंग के अधिकांश हिस्से को सुरक्षित बताया गया है, लेकिन प्रभावित सेक्शन में ऑक्सीजन की कमी, गैस और लगातार गिरते मलबे के कारण हालात बेहद चुनौतीपूर्ण बने हुए हैं। बचाव एजेंसियां समय के साथ दौड़ लगाते हुए फंसे मजदूरों तक पहुंचने की कोशिश कर रही हैं। हालांकि अधिकारियों ने अभियान की सफलता को लेकर कोई निश्चित समयसीमा नहीं बताई है।

विशेषज्ञों ने समझाया मीथेन गैस का खतरा

भू-तकनीकी और खनन विशेषज्ञों के अनुसार मीथेन गैस रंगहीन और गंधहीन होती है। यदि यह बंद स्थानों में जमा हो जाए तो ऑक्सीजन का स्तर तेजी से घट जाता है। ऐसे वातावरण में लंबे समय तक रहने पर व्यक्ति बेहोश हो सकता है और समय पर ऑक्सीजन न मिलने पर जान का खतरा भी पैदा हो सकता है। इसके अलावा यदि मीथेन गैस किसी चिंगारी या आग के संपर्क में आ जाए तो विस्फोट की संभावना भी बढ़ जाती है। इसी कारण सुरंग के भीतर सभी मशीनों और उपकरणों का उपयोग अत्यधिक सावधानी के साथ किया जा रहा है।

टनल रेस्क्यू क्यों होता है सबसे कठिन

विशेषज्ञों का कहना है कि सुरंगों में बचाव अभियान सामान्य आपदा राहत कार्यों की तुलना में कहीं अधिक जटिल होता है। सीमित जगह, कम दृश्यता, लगातार गिरते मलबे, गैस रिसाव और ऑक्सीजन की कमी जैसी परिस्थितियां राहत कार्य को बेहद जोखिमपूर्ण बना देती हैं। इसी वजह से बचाव दल को चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ना पड़ता है और प्रत्येक कदम पर सुरक्षा मानकों का पालन करना अनिवार्य होता है। किसी भी जल्दबाजी से बचावकर्मियों की जान भी खतरे में पड़ सकती है।

जांच और सुरक्षा मानकों पर उठे सवाल

इस हादसे के बाद निर्माण परियोजनाओं में सुरक्षा मानकों को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि पर्वतीय क्षेत्रों में बनने वाली सुरंगों में भूगर्भीय जोखिम का लगातार मूल्यांकन और गैस मॉनिटरिंग सिस्टम की प्रभावी व्यवस्था आवश्यक है। प्रशासन ने हादसे के कारणों की जांच शुरू कर दी है। जांच में यह पता लगाया जाएगा कि लैंडस्लाइड किन परिस्थितियों में हुआ और क्या निर्माण स्थल पर सभी आवश्यक सुरक्षा प्रोटोकॉल का पालन किया जा रहा था।

आगे की चुनौती

बचाव अभियान का मुख्य उद्देश्य अब सुरंग में फंसे शेष पांच मजदूरों तक सुरक्षित पहुंचना है। राहत एजेंसियां आधुनिक तकनीक और विशेषज्ञों की मदद से लगातार अभियान चला रही हैं। पूरे देश की नजरें इस ऑपरेशन पर टिकी हैं और उम्मीद की जा रही है कि जल्द ही बचाव दल प्रभावित हिस्से तक पहुंचने में सफल होगा।

 

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