भारत में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर चर्चा उस रिपोर्ट के बाद तेज हो गई है, जिसमें दावा किया गया है कि तीन सदस्यीय चुनाव आयोग के दो चुनाव आयुक्तों ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार आयोग के कुछ फैसलों और प्रक्रियाओं पर औपचारिक आपत्ति दर्ज कराई।
लखनऊ: भारत में मतदाता सूची के Special Intensive Revision (SIR) को लेकर जारी बहस के बीच चुनाव आयोग के भीतर दर्ज की गई आपत्तियों ने राजनीतिक चर्चा को और तेज कर दिया है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों के दौरान चुनाव आयोग के कुछ फैसलों और आदेशों पर कम से कम 14 बार औपचारिक आपत्ति दर्ज कराई। इन आपत्तियों का संबंध नए मतदाताओं के पंजीकरण, मतदाता सूची से नाम हटाने और चुनावी डेटाबेस के प्रबंधन जैसे मुद्दों से बताया गया है।
इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष और कन्नौज से सांसद अखिलेश यादव ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर सवाल उठाए हैं। उन्होंने सोशल मीडिया पोस्ट में कहा कि अगर आयोग के ही दो सदस्य किसी फैसले पर बार-बार आपत्ति दर्ज करा रहे हैं, तो यह गंभीर विषय है।
क्या है SIR और क्यों हो रहा है विवाद?
SIR यानी Special Intensive Revision चुनावी मतदाता सूचियों के व्यापक पुनरीक्षण की प्रक्रिया है। इसका उद्देश्य मतदाता सूची को अपडेट करना और मृत, स्थानांतरित, डुप्लीकेट या अन्य कारणों से अयोग्य प्रविष्टियों की पहचान करना है। चुनाव आयोग ने विभिन्न राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में इस प्रक्रिया को लागू किया है। आयोग की आधिकारिक वेबसाइट पर SIR-2026 के तहत मतदाता सूची देखने और अपना नाम खोजने की सुविधा भी उपलब्ध है।
मौजूदा विवाद इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि एक रिपोर्ट के अनुसार, बिहार से शुरू हुई SIR प्रक्रिया के राष्ट्रीय विस्तार के दौरान 30 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की ड्राफ्ट मतदाता सूचियों में 13 करोड़ से अधिक नाम हटाए गए या सूची से बाहर हुए। यह आंकड़ा अपने आप में यह साबित नहीं करता कि इतने पात्र मतदाताओं को मतदान से वंचित किया गया है, क्योंकि पुनरीक्षण में मृत, स्थानांतरित और डुप्लीकेट प्रविष्टियां भी शामिल हो सकती हैं।

चुनाव आयुक्तों ने किन मुद्दों पर जताई आपत्ति?
द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों चुनाव आयुक्तों ने कई फैसलों को लेकर अपनी आपत्तियां दर्ज कराईं। इनमें नए मतदाताओं के लिए इस्तेमाल होने वाले Form 6 में किए गए बदलाव भी शामिल हैं। रिपोर्ट के अनुसार, Form 6 में SIR से संबंधित अतिरिक्त जानकारी मांगी गई थी। नए मतदाताओं से यह बताने को कहा गया कि उनका या उनके माता-पिता अथवा दादा-दादी का नाम पिछली SIR के दौरान प्रकाशित मतदाता सूची में था या नहीं। दोनों चुनाव आयुक्तों ने इस बदलाव को लेकर आपत्ति दर्ज की और इसे लेकर प्रक्रिया तथा अधिकार क्षेत्र पर सवाल उठाए।
इसके अलावा चुनावी डेटाबेस और उसके आईटी सिस्टम के केंद्रीकरण को लेकर भी सवाल उठाए गए। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि कुछ मामलों में जमीनी स्तर के अधिकारियों के फैसलों को केंद्रीय सॉफ्टवेयर व्यवस्था से जुड़ी तकनीकी अड़चनों का सामना करना पड़ा।
अखिलेश यादव ने क्या कहा?
अखिलेश यादव ने इस रिपोर्ट को लेकर चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और आंतरिक निर्णय प्रक्रिया पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि यदि किसी संवैधानिक संस्था के दो सदस्य लगातार फैसलों पर आपत्ति दर्ज करा रहे हैं और उनकी चिंताओं का समाधान नहीं हो रहा है, तो इस पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।
उन्होंने यह भी कहा कि लोकतांत्रिक संस्थाओं के कामकाज में पारदर्शिता और स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता महत्वपूर्ण है। साथ ही अखिलेश यादव ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट से स्वतः संज्ञान लेने की अपील की। हालांकि, अखिलेश यादव के बयान में लगाए गए राजनीतिक और संवैधानिक आरोप उनके स्वयं के दावे हैं। उपलब्ध रिपोर्ट में चुनाव आयोग की ओर से इन विशेष आरोपों पर तत्काल प्रतिक्रिया दर्ज नहीं की गई थी।










