बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन के बाद तारिक रहमान के नेतृत्व में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी की सरकार बनने जा रही है। शेख हसीना के बाहर होने से देश की राजनीति नई दिशा में बढ़ रही है।
Dhaka: बांग्लादेश की राजनीति में बड़ा बदलाव सामने आया है। लंबे समय तक सत्ता में रहीं शेख हसीना के तख्तापलट के बाद अब देश में नई सरकार बनने जा रही है। अंतरिम व्यवस्था के तहत नोबेल पुरस्कार विजेता मोहम्मद यूनुस ने जिम्मेदारी संभाली थी, लेकिन आम चुनाव के बाद अब तारिक रहमान के नेतृत्व में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी की सरकार बनने वाली है।
इस सत्ता परिवर्तन ने बांग्लादेश की राजनीति को पूरी तरह से उलट दिया है। एक समय था जब शेख हसीना ढाका से देश चलाती थीं और तारिक रहमान लंदन में निर्वासन में थे। अब हालात ऐसे हैं कि तारिक रहमान सत्ता की बागडोर संभालने जा रहे हैं और शेख हसीना देश से बाहर रहकर हालात पर नजर रख रही हैं।
चुनाव से बाहर हुई आवामी लीग
इस पूरे राजनीतिक बदलाव में सबसे बड़ा झटका आवामी लीग को लगा है। इस बार पार्टी को चुनाव लड़ने की अनुमति ही नहीं मिली। इसका सीधा असर यह हुआ कि दशकों से सत्ता में रही पार्टी अचानक हाशिए पर चली गई।
आवामी लीग के समर्थकों के सामने अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि उनका राजनीतिक भविष्य क्या होगा। पार्टी के कई कार्यकर्ता और नेता या तो सार्वजनिक जीवन से दूर हो गए हैं या फिर उन पर मुकदमे दर्ज हैं। केवल पार्टी से जुड़े होने की वजह से कई लोगों को कानूनी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।
बीएनपी की 20 साल बाद वापसी
बीएनपी की यह जीत केवल सत्ता परिवर्तन नहीं है, बल्कि 20 साल बाद पार्टी की वापसी का प्रतीक भी है। तारिक रहमान के लिए यह राजनीतिक पुनरुत्थान का क्षण है। उन्होंने चुनाव प्रचार के दौरान खुद को एक ऐसे नेता के रूप में पेश किया, जो देश में स्थिरता और सुलह ला सकता है।
बीएनपी के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह देश को राजनीतिक बदले की भावना से बाहर निकाले। लंबे समय से चले आ रहे टकराव और आरोप-प्रत्यारोप से आम जनता थक चुकी है। ऐसे में नई सरकार से उम्मीदें काफी ज्यादा हैं।
तारिक रहमान का कानून का राज वादा

चुनाव के बाद जब एक पत्रकार ने तारिक रहमान से सवाल किया कि आवामी लीग के समर्थकों के साथ सुलह कैसे होगी, तो उनका जवाब छोटा लेकिन असरदार था। उन्होंने कहा कि इसका रास्ता केवल ‘Rule of Law’ यानी कानून का राज है।
इस बयान से यह साफ हुआ कि बीएनपी बदले की राजनीति के बजाय कानूनी प्रक्रिया पर जोर देना चाहती है। तारिक रहमान का कहना है कि पहले कानून व्यवस्था को मजबूत किया जाएगा, उसके बाद ही किसी भी तरह की राजनीतिक सुलह संभव होगी।
आवामी लीग का वोट कहां गया
चुनाव से बाहर होने के बावजूद आवामी लीग का वोट बैंक खत्म नहीं हुआ है। जुलाई 2024 के प्रदर्शनों के बाद भले ही पार्टी के कई समर्थक चुप हो गए हों, लेकिन उनका वोट अब भी मौजूद है।
चूंकि आवामी लीग चुनाव नहीं लड़ सकी, इसलिए उसका बड़ा हिस्सा बीएनपी की ओर शिफ्ट हो गया। 2026 के चुनाव नतीजों के शुरुआती विश्लेषण से साफ है कि बॉयकॉट की अपील के बावजूद वोट ट्रांसफर हुआ है। जिन मतदाताओं को वोट देना था, उनके सामने असली विकल्प बीएनपी और बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी ही थे। ज्यादातर लोगों ने बीएनपी को चुना।
जमात से दूरी का असर
इस वोट ट्रांसफर की एक बड़ी वजह राष्ट्रीय पहचान से जुड़ी सोच है। आवामी लीग और बीएनपी दोनों ही 1971 के लिबरेशन वॉर के ऐतिहासिक महत्व को स्वीकार करते हैं। इसके उलट जमात-ए-इस्लामी पर आज भी पाकिस्तान समर्थक होने का आरोप लगता है।
लिबरेशन वॉर के दौरान पाकिस्तान की भूमिका और बांग्लादेशी नागरिकों पर हुए अत्याचारों की यादें आज भी लोगों के मन में हैं। यही कारण है कि सेक्युलर और राष्ट्रवादी सोच रखने वाले मतदाता जमात को अब भी संदेह की नजर से देखते हैं।
अल्पसंख्यकों के बीच बीएनपी की बढ़त
इस चुनाव में एक अहम बदलाव अल्पसंख्यक समुदाय के रुख में भी देखने को मिला। यह वर्ग लंबे समय से आवामी लीग का समर्थक माना जाता रहा है। लेकिन इस बार बीएनपी ने यहां भी बढ़त बनाई।
तारिक रहमान ने चुनाव से पहले साफ वादा किया कि माइनॉरिटीज को टारगेट करना और उन पर होने वाले अत्याचार बंद किए जाएंगे। उनका ‘सबको साथ लेकर चलने वाला बराबर बांग्लादेश’ का संदेश इन वोटर्स को पसंद आया।
बीएनपी सरकार के सामने बड़ी चुनौती
नई सरकार के सामने सबसे कठिन काम आवामी लीग के समर्थकों के खिलाफ दर्ज मुकदमों को लेकर होगा। बीएनपी को यह तय करना होगा कि कौन से मामले राजनीतिक बदले की भावना से दर्ज हुए हैं और किन मामलों में सच में अपराध हुआ है।
सरकार को ऐसा सिस्टम बनाना होगा, जिसमें निर्दोष लोगों को राहत मिले और असली गुनहगारों को सजा हो। यही संतुलन बीएनपी सरकार की सफलता या असफलता तय करेगा।










