सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को मौखिक रूप से स्पष्ट किया है कि केवल कानून में बदलाव कर किसी व्यक्ति या समुदाय के पहले से प्राप्त अधिकारों को नहीं छीना जा सकता।
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने ट्रांसजेंडर समुदाय के अधिकारों से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार को अहम टिप्पणी की है। शीर्ष अदालत ने मौखिक रूप से कहा कि किसी नए कानून के जरिए पहले से दिए गए अधिकारों को समाप्त नहीं किया जा सकता। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि नया कानून पुराने प्रावधानों के तहत जारी किए गए ट्रांसजेंडर पहचान पत्रों को अपने आप या पिछली तारीख से अमान्य नहीं कर सकता।
यह मामला ट्रांसजेंडर समुदाय की पहचान और अधिकारों से जुड़ा हुआ है। याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि 2026 में किए गए कानूनी बदलावों से ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के अपनी पहचान स्वयं तय करने के अधिकार पर असर पड़ सकता है। याचिकाकर्ताओं में ट्रांसजेंडर समुदाय के सदस्य और सामाजिक कार्यकर्ता शामिल हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा- अधिकारों की रक्षा जरूरी
मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने मामले की सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार से कहा कि कानून में बदलाव होने के बावजूद पहले से प्राप्त अधिकारों की सुरक्षा होनी चाहिए। पीठ में शामिल न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति को कानून के तहत अधिकार दिए गए हैं, तो केवल कानूनी संशोधन के आधार पर उन्हें खत्म नहीं किया जा सकता।
सुनवाई के दौरान ट्रांसजेंडर समुदाय की ओर से पेश वकील ने अदालत को बताया कि पहचान पत्र उनके लिए केवल एक दस्तावेज नहीं बल्कि उनकी सामाजिक और व्यक्तिगत पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। उन्होंने कहा कि इस समुदाय के कई लोगों के लिए घर किराए पर लेना, रोजगार हासिल करना और सामान्य जीवन जीना अब भी चुनौती बना हुआ है।
‘रहने के लिए घर मिलना भी संघर्ष है’
सुनवाई के दौरान एक याचिकाकर्ता ने अदालत के सामने अपनी परेशानियां रखते हुए कहा कि ट्रांसजेंडर लोगों को रोजमर्रा की जिंदगी में कई तरह के भेदभाव का सामना करना पड़ता है। उन्होंने कहा कि पहचान से जुड़े दस्तावेज उनके लिए सम्मान और सुरक्षा का माध्यम हैं। इस पर न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि अदालत समुदाय के अधिकारों को लेकर संवेदनशील है और उनकी चिंताओं को समझती है।
केंद्र ने जवाब के लिए मांगा समय

केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल Tushar Mehta ने अदालत से मामले में जवाब दाखिल करने के लिए समय मांगा। उन्होंने कहा कि जेंडर पहचान से जुड़े मुद्दों में उत्तराधिकार, संपत्ति और अन्य कानूनी अधिकारों से जुड़े कई पहलू शामिल हो सकते हैं, इसलिए सरकार को कानून का विस्तार से अध्ययन करने की आवश्यकता है।
तुषार मेहता ने याचिकाकर्ताओं की उस मांग पर भी सवाल उठाया, जिसमें ट्रांसजेंडर पहचान पत्रों की वैधता बनाए रखने के लिए अंतरिम आदेश देने की मांग की गई थी। उन्होंने कहा कि पहचान पत्र की स्थिति को राशन कार्ड जैसी व्यवस्था से नहीं जोड़ा जा सकता। हालांकि, अदालत ने इस तर्क पर कहा कि यदि कानून बनाने वालों का उद्देश्य ट्रांसजेंडर कार्ड को समाप्त करना होता, तो संशोधन में इसे स्पष्ट रूप से बताया जाता।
2014 के NALSA फैसले का दिया हवाला
याचिकाकर्ताओं ने अपनी दलीलों में सुप्रीम कोर्ट के वर्ष 2014 के ऐतिहासिक NALSA फैसले का उल्लेख किया। इस फैसले में अदालत ने ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को अपनी जेंडर पहचान स्वयं तय करने का अधिकार दिया था। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि 2026 के कानूनी बदलाव इस संवैधानिक अधिकार के विपरीत हैं। उनका तर्क है कि किसी व्यक्ति की पहचान तय करने का अधिकार सरकार के बजाय व्यक्ति के पास होना चाहिए।
NALSA फैसले के बाद ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए ट्रांसजेंडर पर्सन्स (प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स) एक्ट, 2019 बनाया गया था। इस कानून में ट्रांसजेंडर समुदाय के खिलाफ भेदभाव रोकने और उनके अधिकारों की रक्षा के प्रावधान शामिल किए गए थे।
लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी भी याचिकाकर्ताओं में शामिल
इस मामले में प्रमुख याचिकाकर्ताओं में ट्रांसजेंडर अधिकार कार्यकर्ता Lakshmi Narayan Tripathi भी शामिल हैं। वह संयुक्त राष्ट्र महासभा को संबोधित करने वाली एशिया-प्रशांत क्षेत्र की पहली ट्रांसजेंडर व्यक्तियों में से एक रही हैं और उन्होंने भारत में ट्रांसजेंडर समुदाय के अधिकारों के लिए लंबे समय से काम किया है।
याचिकाकर्ताओं का सवाल है कि क्या सरकार कानून के माध्यम से यह तय कर सकती है कि किसी व्यक्ति की पहचान क्या होगी, जबकि संविधान व्यक्ति की गरिमा, स्वतंत्रता और व्यक्तिगत पहचान की रक्षा करता है।











