तमिलनाडु सरकार ने धर्म परिवर्तन करने वाले मुसलमानों को पिछड़ा वर्ग आरक्षण देने से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट से अपने फैसले पर दोबारा विचार करने की मांग करने का निर्णय लिया है। मुख्यमंत्री सी जोसेफ विजय की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में पुनर्विचार याचिका दाखिल करने को मंजूरी दी गई है।
चेन्नई: तमिलनाडु में धर्म परिवर्तन के बाद मुस्लिम पिछड़ा वर्ग के तहत आरक्षण पाने का मामला एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट पहुंचेगा। राज्य सरकार ने शीर्ष अदालत के फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिका दाखिल करने का फैसला किया है। सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में मद्रास हाई कोर्ट के उस फैसले को बरकरार रखा था, जिसमें मार्च 2024 के सरकारी आदेश को रद्द कर दिया गया था। इस आदेश के जरिए कुछ पिछड़े समुदायों से इस्लाम अपनाने वाले लोगों को मुस्लिम पिछड़ा वर्ग का प्रमाणपत्र देने की व्यवस्था की गई थी।
कैबिनेट बैठक में लिया गया फैसला
गुरुवार, 29 अक्टूबर को मुख्यमंत्री सी जोसेफ विजय की अध्यक्षता में तमिलनाडु कैबिनेट की बैठक हुई। इसमें आरक्षण से जुड़े मामले पर चर्चा के बाद सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दाखिल करने का निर्णय लिया गया।
बैठक के बाद कानून मंत्री सीटीआर निर्मल कुमार ने पत्रकारों को बताया कि सरकार अदालत के फैसले की दोबारा समीक्षा कराना चाहती है। इसके लिए कानूनी प्रक्रिया पूरी कर याचिका दाखिल की जाएगी।
मंत्री ने कहा कि साल 2024 में धर्म परिवर्तन करने वाले मुसलमानों के आरक्षण से संबंधित जो सरकारी आदेश जारी हुआ था, उसे अदालत ने रद्द कर दिया है। सरकार अब उसी फैसले पर पुनर्विचार की मांग करेगी।
मार्च 2024 में क्या आदेश जारी हुआ था?
तमिलनाडु सरकार ने 9 मार्च 2024 को एक सरकारी आदेश जारी किया था। इसका संबंध उन लोगों से था, जो पहले पिछड़ा वर्ग, अत्यंत पिछड़ा वर्ग या विमुक्त समुदायों में आते थे और बाद में इस्लाम धर्म अपना लेते थे।
इस आदेश के तहत निर्धारित शर्तों पर ऐसे लोगों को मुस्लिम पिछड़ा वर्ग का प्रमाणपत्र जारी करने की व्यवस्था की गई थी। संबंधित आरक्षण व्यवस्था में मुस्लिम पिछड़ा वर्ग के लिए 3.5 प्रतिशत कोटा निर्धारित है।
आदेश से जुड़ी प्रक्रिया में अनुसूचित जाति से धर्म परिवर्तन करने वालों का सवाल भी सामने आया था। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के फैसले में पिछड़ा वर्ग, अत्यंत पिछड़ा वर्ग और विमुक्त समुदायों से जुड़े प्रावधानों की विशेष रूप से चर्चा की गई है।
हाई कोर्ट ने जून में रद्द किया था आदेश
मद्रास हाई कोर्ट ने 25 जून 2026 को सरकारी आदेश को असंवैधानिक ठहराते हुए रद्द कर दिया था। अदालत का कहना था कि केवल धर्म परिवर्तन कर लेने से किसी व्यक्ति को मुस्लिम समुदाय के भीतर अधिसूचित पिछड़े वर्ग की सदस्यता अपने आप नहीं मिल सकती।
हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि किसी समुदाय को पिछड़ा वर्ग के रूप में मान्यता मिलने के पीछे उसका सामाजिक और ऐतिहासिक आधार होता है। ऐसे में केवल सरकारी आदेश जारी करके किसी दूसरे समुदाय के व्यक्ति को उस श्रेणी में शामिल नहीं किया जा सकता।
राज्य सरकार हाई कोर्ट के इस फैसले से सहमत नहीं थी। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां सरकार ने अपने आदेश के समर्थन में दलीलें रखीं।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने 15 अक्टूबर 2026 को मद्रास हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा और तमिलनाडु सरकार की अपील खारिज कर दी।
शीर्ष अदालत ने कहा कि किसी अधिसूचित मुस्लिम पिछड़े समुदाय की पहचान केवल धार्मिक आस्था से तय नहीं होती। इसमें परिवार की पृष्ठभूमि, वंश, पारंपरिक पेशा, सामाजिक पहचान और समुदाय का इतिहास भी महत्वपूर्ण होता है।
अदालत के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति धर्म परिवर्तन करता है, तो इससे यह अपने आप साबित नहीं होता कि वह नए धर्म के किसी विशेष पिछड़े समुदाय का सदस्य बन गया है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी माना कि किसी व्यक्ति की धर्म परिवर्तन से पहले की सामाजिक स्थिति के आधार पर उसे दूसरे धर्म के अधिसूचित पिछड़े समुदाय का प्रमाणपत्र देना कानूनी रूप से उचित नहीं है।
अब आगे क्या होगा?
कैबिनेट की मंजूरी के बाद तमिलनाडु सरकार सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दाखिल करने की प्रक्रिया आगे बढ़ाएगी। इसमें सरकार अदालत से अपने पहले फैसले की समीक्षा करने का अनुरोध करेगी।
हालांकि, पुनर्विचार याचिका दाखिल होने का मतलब यह नहीं है कि पुराना सरकारी आदेश दोबारा लागू हो जाएगा। इसके लिए अदालत का आगे का फैसला महत्वपूर्ण होगा।
यह मामला तमिलनाडु की आरक्षण व्यवस्था के साथ उन लोगों के लिए भी अहम है, जो धर्म परिवर्तन के बाद अपनी सामाजिक श्रेणी और आरक्षण की पात्रता को लेकर कानूनी स्पष्टता चाहते हैं।











