बंगाल में TMC के बागी सांसदों की दिल्ली में बड़ी बैठक हुई। काकोली घोष ने 22 सांसदों के समर्थन का दावा किया है। सोमवार को यह गुट लोकसभा स्पीकर से मिलेगा। पार्टी में टूट और तेज होती दिख रही है।
कोलकाता/नई दिल्ली: भारतीय राजनीति में पश्चिम बंगाल की सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस (TMC) एक बड़े संगठनात्मक संकट से गुजर रही है। पार्टी के भीतर बगावत अब दिल्ली तक पहुंच गई है, जहां बागी सांसदों की एक अहम बैठक केंद्रीय मंत्री और भाजपा नेता Bhupender Yadav के आवास पर हुई। इस बैठक में कई TMC सांसदों की मौजूदगी ने राजनीतिक हलकों में हलचल बढ़ा दी है।
दिल्ली में बागी TMC सांसदों की बैठक, भाजपा नेताओं की मौजूदगी ने बढ़ाया सियासी तापमान
सूत्रों के अनुसार, दिल्ली में हुई इस बैठक में TMC के कई असंतुष्ट सांसद शामिल हुए। इनमें सायोनी घोष और प्रसून बनर्जी जैसे नाम प्रमुख हैं। बैठक के दौरान भाजपा सांसद निशिकांत दुबे की मौजूदगी ने इस पूरे घटनाक्रम को और अधिक संवेदनशील बना दिया।
यह बैठक ऐसे समय में हुई है जब बागी गुट पहले ही खुद को “असली तृणमूल कांग्रेस संसदीय दल” के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहा है।
सायोनी घोष का बयान और संगठनात्मक बदलाव
बैठक में शामिल होने के बाद सांसद Saayoni Ghosh ने मीडिया से कोई स्पष्ट बयान देने से इनकार किया और कहा कि वह सही समय आने पर अपनी बात रखेंगी। गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल में पार्टी नेतृत्व ने हाल ही में सायोनी घोष और माला रॉय को उनके संगठनात्मक पदों से हटा दिया था, जिससे पार्टी के भीतर तनाव और बढ़ गया है।
सायोनी पहले TMC युवा विंग की प्रमुख थीं, और उनका इस तरह बागी बैठक में शामिल होना पार्टी के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है।
बागी गुट का दावा: 22 सांसदों का समर्थन
TMC की बागी सांसद काकोली घोष ने दावा किया है कि अब उनके गुट को 22 लोकसभा सांसदों का समर्थन प्राप्त है। इससे पहले उन्होंने 20 सांसदों के समर्थन का दावा किया था। हाल ही में सामने आए एक पत्र में 19 सांसदों के हस्ताक्षर भी शामिल थे, जिसने इस विवाद को और अधिक सार्वजनिक कर दिया है। TMC के कुल 28 लोकसभा सांसद हैं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि पार्टी का बड़ा हिस्सा इस विवाद में शामिल हो चुका है।
संसद में बढ़ता संकट और स्पीकर से मुलाकात की तैयारी
बागी गुट अब लोकसभा अध्यक्ष Om Birla से मिलने की तैयारी में है। इस मुलाकात में वे खुद को “असली TMC संसदीय दल” के रूप में मान्यता देने की मांग कर सकते हैं।
इसके साथ ही राज्यसभा और विधानसभा स्तर पर भी पार्टी में विभाजन की स्थिति गंभीर होती जा रही है।
TMC में अंदरूनी टूट की शुरुआत कैसे हुई
सूत्रों के अनुसार, पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव परिणाम आने के कुछ ही दिनों बाद पार्टी में असंतोष के संकेत मिलने लगे थे। 4 मई को परिणाम घोषित हुए और इसके मात्र 14 दिनों बाद, 18 मई को ही कुछ सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष को पत्र भेजकर अलग गुट बनाने की मांग शुरू कर दी। इस पत्र में कई प्रमुख नेताओं के नाम शामिल थे, जिससे पार्टी नेतृत्व को शुरुआती झटका लगा।
दलबदल कानून और दो-तिहाई नियम की स्थिति
भारतीय संविधान की 10वीं अनुसूची (Anti-Defection Law) के अनुसार, किसी भी पार्टी में विभाजन को मान्यता तभी मिलती है जब कम से कम दो-तिहाई सांसद या विधायक अलग गुट का समर्थन करें।
TMC के मौजूदा राजनीतिक हालात को देखते हुए बागी गुट यह दावा कर रहा है कि उनके पास आवश्यक संख्या से अधिक समर्थन है।
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लोकसभा में पार्टी के 28 सांसदों में से लगभग 20 बागी गुट के साथ बताए जा रहे हैं, जबकि विधानसभा में भी बड़े पैमाने पर टूट की खबरें हैं।
विधानसभा में भी बड़ी टूट का दावा
रिपोर्ट्स के अनुसार, पश्चिम बंगाल विधानसभा में TMC के 80 विधायकों में से लगभग 58 विधायकों के बागी गुट में शामिल होने की बात कही जा रही है।
इस स्थिति में बागी खेमे का दावा है कि उनके पास दो-तिहाई से अधिक समर्थन है, जो किसी नए गुट की मान्यता के लिए महत्वपूर्ण संवैधानिक आधार हो सकता है।
पार्टी नेतृत्व पर दबाव और राजनीतिक अस्थिरता
TMC प्रमुख ममता बनर्जी के लिए यह स्थिति बेहद चुनौतीपूर्ण मानी जा रही है। लोकसभा, राज्यसभा और विधानसभा—तीनों स्तरों पर पार्टी में बगावत की खबरों ने संगठनात्मक ढांचे को कमजोर किया है।
राज्यसभा में भी 13 में से 4 सांसदों के इस्तीफे की खबरें सामने आई हैं, जिससे पार्टी का संसदीय आधार और कमजोर होता दिख रहा है।
महाराष्ट्र राजनीतिक संकट से तुलना
इस पूरे घटनाक्रम की तुलना 2022 के महाराष्ट्र राजनीतिक संकट से की जा रही है, जब शिवसेना में बड़ी टूट के बाद एकनाथ शिंदे गुट सत्ता में आया था।
उस समय भी दलबदल कानून, स्पीकर का फैसला और चुनाव आयोग की भूमिका निर्णायक रही थी। उसी तरह TMC मामले में भी अंतिम फैसला संवैधानिक संस्थाओं के हाथ में होगा।
आगे की प्रक्रिया: कानूनी और संवैधानिक लड़ाई
यदि बागी गुट लोकसभा अध्यक्ष के समक्ष अपना दावा प्रस्तुत करता है, तो मामला दलबदल कानून के तहत जांच के दायरे में आएगा। इसके बाद स्पीकर यह तय करेंगे कि कौन सा गुट वैध है, लेकिन “असली पार्टी” का अंतिम निर्णय चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र में भी जा सकता है। इसके साथ ही यह संभावना भी है कि ममता बनर्जी गुट इस पूरे मामले को अदालत में चुनौती दे सकता है।








