कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के हल्द्वानी कार्यक्रम के बाद हुआ शुद्धिकरण विवाद अब पार्टी के लिए महज राजनीतिक मुद्दा नहीं रह गया है। राहुल गांधी इसे दलित सम्मान, छुआछूत और सामाजिक बराबरी जैसे व्यापक सवालों से जोड़ रहे हैं।
लखनऊ: उत्तर प्रदेश की राजनीति में दलित और पिछड़े वर्गों के समर्थन को लेकर कांग्रेस ने अपनी रणनीति तेज कर दी है। हल्द्वानी में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के कार्यक्रम के बाद उठे शुद्धिकरण विवाद को पार्टी अब दलित सम्मान, सामाजिक बराबरी और जातिगत भेदभाव के बड़े मुद्दे से जोड़ रही है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी भी इन सवालों को राष्ट्रीय स्तर पर उठाते रहे हैं। ऐसे में माना जा रहा है कि पार्टी उत्तर प्रदेश समेत देश के दूसरे हिस्सों में सामाजिक न्याय को अपनी राजनीतिक रणनीति का प्रमुख आधार बनाने की कोशिश कर रही है।
कांग्रेस की यह कवायद केवल आगामी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव तक सीमित नहीं मानी जा रही। पार्टी नेतृत्व जातिगत जनगणना, सामाजिक प्रतिनिधित्व और पिछड़े वर्गों की राजनीतिक भागीदारी जैसे मुद्दों के जरिए भारतीय जनता पार्टी (BJP) के सामने अपना अलग सामाजिक और राजनीतिक नैरेटिव तैयार करना चाहता है।
हल्द्वानी विवाद को सामाजिक न्याय से जोड़ रही कांग्रेस
हल्द्वानी में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के कार्यक्रम से जुड़ा शुद्धिकरण विवाद पार्टी के लिए राजनीतिक मुद्दा बन गया है। कांग्रेस इसे दलित सम्मान और छुआछूत जैसी सामाजिक बुराइयों के खिलाफ व्यापक अभियान के रूप में पेश कर रही है। पार्टी की रणनीति ऐसे मुद्दों को केवल उत्तराखंड तक सीमित रखने के बजाय देश के अलग-अलग हिस्सों में उठाने की है। कांग्रेस का तर्क है कि सामाजिक बराबरी और सम्मान का सवाल किसी एक राज्य या चुनाव तक सीमित नहीं है।
राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे जातिगत जनगणना में विस्तृत आंकड़े जुटाने की मांग भी लगातार उठा रहे हैं। कांग्रेस का मानना है कि जातियों की वास्तविक सामाजिक और आर्थिक स्थिति से जुड़े आंकड़े सामने आने पर नीतियों और सरकारी योजनाओं को अधिक प्रभावी ढंग से तैयार किया जा सकता है।
जातिगत जनगणना पर कांग्रेस का जोर
कांग्रेस नेतृत्व ने प्रस्तावित जनगणना में जाति संबंधी जानकारी को अधिक विस्तृत बनाने की मांग की है। पार्टी का कहना है कि मौजूदा व्यवस्था से अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) और अन्य सामाजिक समूहों की वास्तविक हिस्सेदारी का पर्याप्त आकलन नहीं हो पाएगा। यह मुद्दा कांग्रेस की व्यापक सामाजिक न्याय की राजनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है। पार्टी इसे रोजगार, प्रतिनिधित्व, कल्याणकारी योजनाओं और राजनीतिक भागीदारी जैसे सवालों से जोड़ रही है।
2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश के नतीजों ने भी विपक्षी दलों को दलित और पिछड़े मतदाताओं की राजनीतिक भूमिका पर नए सिरे से विचार करने का मौका दिया। राज्य में विपक्षी गठबंधन ने बड़ी संख्या में सीटें जीतीं, जबकि BJP का प्रदर्शन पिछले चुनाव की तुलना में कमजोर रहा।
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क्या मायावती के वोट बैंक में सेंध की कोशिश?
उत्तर प्रदेश की राजनीति में दलित मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा लंबे समय तक बहुजन समाज पार्टी (BSP) और उसकी नेता मायावती के साथ जुड़ा रहा है। हालांकि, हाल के चुनावों में BSP का प्रदर्शन कमजोर हुआ है। 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी राज्य की कोई सीट नहीं जीत सकी, लेकिन उसका वोट शेयर करीब 9.4 प्रतिशत रहा।
यही वजह है कि कांग्रेस के लिए BSP के कमजोर चुनावी प्रदर्शन को एक संभावित राजनीतिक अवसर के तौर पर देखा जा सकता है। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि मायावती का दलित आधार समाप्त हो गया है। खासकर जाटव समुदाय के बीच BSP की सामाजिक पकड़ अभी भी उत्तर प्रदेश की राजनीति में महत्वपूर्ण मानी जाती है।
कांग्रेस के सामने चुनौती यह है कि BSP के पारंपरिक समर्थकों को अपने पक्ष में लाना आसान नहीं होगा। दलित राजनीति में सामाजिक पहचान, स्थानीय नेतृत्व और लंबे समय से बने संगठनात्मक संबंध महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
BJP और SP से भी होगा मुकाबला
दलित और पिछड़े मतदाताओं को साधने की कांग्रेस की कोशिश का मुकाबला सिर्फ BSP से नहीं, बल्कि BJP और समाजवादी पार्टी (SP) से भी है। BJP ने पिछले वर्षों में गैर-जाटव दलित और गैर-यादव OBC समूहों के बीच अपना प्रभाव बढ़ाया है। वहीं, समाजवादी पार्टी अपने PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक सामाजिक समीकरण को उत्तर प्रदेश में राजनीतिक आधार बनाने की कोशिश कर रही है।
ऐसे में कांग्रेस के सामने दोहरी चुनौती है। उसे एक ओर BJP के मजबूत सामाजिक गठजोड़ को चुनौती देनी होगी, वहीं दूसरी तरफ विपक्षी खेमे में SP जैसी सहयोगी पार्टी के साथ भी अपना राजनीतिक आधार मजबूत करना होगा।









