उत्तराखंड के जंगलों में बढ़ा हाथियों के झुंड का आकार, वन विभाग कर रहा वजहों की पड़ताल

उत्तराखंड के तराई जंगलों में हाथियों के बड़े झुंड दिख रहे हैं। वन विभाग बढ़ती आबादी, भोजन उपलब्धता और मानव हस्तक्षेप की वजहों की जांच कर रहा है।

उत्तराखंड के तराई क्षेत्रों में हाथियों के झुंड पहले की तुलना में कहीं बड़े दिखाई दे रहे हैं। वन विभाग और विशेषज्ञ इस बदलाव के पीछे बढ़ती आबादी, भोजन की उपलब्धता और मानव हस्तक्षेप जैसे संभावित कारणों का अध्ययन कर रहे हैं।

हल्द्वानी: उत्तराखंड के तराई क्षेत्र के जंगलों में हाथियों के व्यवहार में एक दिलचस्प बदलाव देखने को मिल रहा है। जहां पहले हाथियों के छोटे झुंड नजर आते थे, वहीं अब 25 से 27 हाथियों के बड़े समूह दिखाई दे रहे हैं। वन विभाग और वन्यजीव विशेषज्ञ इस बदलाव के पीछे के कारणों को समझने के लिए अध्ययन और निगरानी कर रहे हैं।

हाथियों के झुंड का आकार बढ़ने से बढ़ी उत्सुकता

उत्तराखंड के तराई क्षेत्र में हाथियों के झुंड के आकार में अचानक वृद्धि ने वन विभाग और वन्यजीव विशेषज्ञों का ध्यान आकर्षित किया है। आमतौर पर हाथी छोटे समूहों में रहना पसंद करते हैं और भोजन तथा पानी की तलाश में अलग-अलग दिशा में घूमते हैं। पहले एक झुंड में पांच से सात हाथी देखे जाते थे, लेकिन अब कई स्थानों पर 25 से 27 हाथियों के बड़े समूह नजर आ रहे हैं।

उत्तराखंड के जंगलों में बढ़ा हाथियों के झुंड का आकार, वन विभाग कर रहा वजहों की पड़ताल

तराई केंद्रीय वन प्रभाग की टांडा और पीपलपड़ाव रेंज के अलावा रामनगर वन प्रभाग के निहाल नदी क्षेत्र में भी ऐसे बड़े झुंड लगातार देखे जा रहे हैं। यह बदलाव सामान्य व्यवहार से अलग माना जा रहा है, इसलिए वन विभाग इस पर विशेष नजर बनाए हुए है।

क्या इंसानी दखल बन रहा वजह?

वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि हाथियों के झुंड के आकार में वृद्धि के पीछे इंसानी गतिविधियां एक महत्वपूर्ण कारण हो सकती हैं। तराई क्षेत्र में तेजी से बढ़ते बुनियादी ढांचे, सड़कों और अन्य निर्माण कार्यों के कारण हाथियों के पारंपरिक आवागमन मार्ग प्रभावित हो रहे हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार हाथी अत्यंत बुद्धिमान और सामाजिक वन्यजीव हैं। जब उन्हें अपने प्राकृतिक गलियारों में बाधा महसूस होती है तो वे सुरक्षा की दृष्टि से बड़े समूहों में रहना पसंद कर सकते हैं। माना जा रहा है कि कई छोटे झुंड मिलकर बड़े समूह बना रहे हैं ताकि संभावित खतरों से सामूहिक रूप से निपटा जा सके।

हाल ही में हाथी कॉरिडोर संरक्षण को लेकर आयोजित बैठकों में भी यह मुद्दा प्रमुखता से उठाया गया था। विशेषज्ञों ने हाथियों की गतिविधियों को बेहतर ढंग से समझने के लिए कुछ हाथियों पर रेडियो कॉलर लगाने का सुझाव भी दिया है।

बढ़ती आबादी और भोजन की उपलब्धता भी कारण

हाथियों के बड़े झुंड दिखाई देने के पीछे उनकी बढ़ती संख्या भी एक संभावित कारण मानी जा रही है। हाल ही में राज्य में हाथियों की गणना का कार्य पूरा हुआ है और इसकी रिपोर्ट अगले महीने जारी होने की संभावना है। रिपोर्ट आने के बाद यह स्पष्ट हो सकेगा कि हाथियों की आबादी में कितनी वृद्धि हुई है।

वन अधिकारियों का कहना है कि तराई क्षेत्र के घास के मैदान और जंगल हाथियों के लिए पर्याप्त भोजन उपलब्ध कराते हैं। ऐसे में भोजन की अच्छी उपलब्धता भी बड़े समूहों के गठन को बढ़ावा दे सकती है। यदि किसी क्षेत्र में संसाधन पर्याप्त हों तो हाथियों को छोटे समूहों में बंटने की आवश्यकता कम हो जाती है।

निहाल कॉरिडोर पर विशेष नजर

रामनगर और तराई केंद्रीय वन प्रभाग को जोड़ने वाला निहाल-भाखड़ा कॉरिडोर हाथियों की आवाजाही का महत्वपूर्ण मार्ग माना जाता है। वन अधिकारियों का मानना है कि इस क्षेत्र में पर्यावरणीय बदलावों और संसाधनों की स्थिति का भी हाथियों के व्यवहार पर प्रभाव पड़ सकता है।

विशेषज्ञों के अनुसार निहाल नदी के आसपास के घास के मैदानों में आए बदलावों के कारण भी हाथियों के मूवमेंट पैटर्न में परिवर्तन हुआ हो सकता है। भोजन और पानी की तलाश में आगे बढ़ते हुए कई समूह एक जगह इकट्ठा हो रहे हैं, जिससे बड़े झुंड बनते दिखाई दे रहे हैं।

अध्ययन के बाद ही सामने आएगी वास्तविक वजह

वन विभाग फिलहाल इस पूरे घटनाक्रम पर लगातार निगरानी रख रहा है। अधिकारियों का कहना है कि हाथियों के झुंड के आकार में वृद्धि के पीछे एक नहीं बल्कि कई कारण हो सकते हैं। इनमें बढ़ती आबादी, भोजन की उपलब्धता, आवास में बदलाव और मानव गतिविधियां शामिल हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि वैज्ञानिक अध्ययन, हाथी गणना रिपोर्ट और रेडियो कॉलरिंग जैसी तकनीकों के माध्यम से ही इस बदलाव की सटीक वजह सामने आ सकेगी। फिलहाल उत्तराखंड के जंगलों में हाथियों के बढ़ते महाझुंड वन्यजीव प्रबंधन और संरक्षण के लिए एक महत्वपूर्ण विषय बन गए हैं।

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