एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक की पत्नी गीतांजलि आंग्मो ने ‘वंदे मातरम’ के मूल भाव को लेकर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि ‘वंदे मातरम’ का मूल अर्थ है—‘हे मां, मैं आपको नमन करती हूं।’ उनके मुताबिक, भारत ने हजारों वर्षों से देश को मां के रूप में देखा है और इस भावना को छोड़ा नहीं जा सकता।
Vande Mataram Statement: एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक की पत्नी गीतांजलि आंग्मो ने ‘वंदे मातरम’, भारतीय संस्कृति, विविधता और शिक्षा व्यवस्था को लेकर अपने विचार रखे हैं। उन्होंने कहा कि समाज में अलग-अलग पहचान और विचारों का सम्मान होना चाहिए। उनके मुताबिक, किसी दूसरे व्यक्ति या समुदाय को स्वीकार करने के लिए अपनी सांस्कृतिक पहचान को दबाने की जरूरत नहीं है।
‘वंदे मातरम’ के मूल भाव की व्याख्या करते हुए आंग्मो ने इसे भारतभूमि के प्रति सम्मान और मातृभाव से जोड़कर देखा। उन्होंने कहा कि भारत में आम लोगों के बीच इस गीत को लेकर उतनी समस्या नहीं है, जितनी कई बार राजनीतिक एजेंडे और नैरेटिव के जरिए दिखाई जाती है।
‘अपनी पहचान दबाकर किसी को खुश करने की जरूरत नहीं’
गीतांजलि आंग्मो का कहना है कि विविधता के बीच सह-अस्तित्व का मतलब अपनी पहचान को खत्म करना नहीं है। उनके अनुसार, हर व्यक्ति को अपनी सांस्कृतिक और वैचारिक पहचान को स्वतंत्र रूप से व्यक्त करने का अवसर मिलना चाहिए और साथ ही दूसरों की पहचान का भी सम्मान किया जाना चाहिए।उन्होंने कहा कि यदि कोई व्यक्ति किसी दूसरे को खुश करने के लिए अपनी वास्तविक पहचान को दबाता है, तो लंबे समय में इससे व्यक्तिगत स्तर पर असंतोष पैदा हो सकता है। उनके मुताबिक, समाज की वास्तविक खूबसूरती अलग-अलग पहचान के साथ मिलकर आगे बढ़ने में है।
वंदे मातरम को लेकर क्या कहा?
आंग्मो ने कहा कि ‘वंदे मातरम’ लंबे समय से भारत के राष्ट्रीय जीवन का हिस्सा रहा है, लेकिन समय के साथ यह लोगों की सामूहिक स्मृति में पहले की तुलना में कम दिखाई देने लगा। उन्होंने इसके मूल भाव को भारतभूमि को एक जीवंत शक्ति और ‘मां’ के प्रतीक के तौर पर देखने से जोड़ा। उन्होंने बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय और श्री अरविंद के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत को केवल एक भौगोलिक क्षेत्र के रूप में देखने के बजाय उसके सांस्कृतिक और आध्यात्मिक अर्थ को समझना भी जरूरी है।
भारतीय संस्कृति और बाहरी प्रभावों पर राय
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भारत की संस्कृति पर विभिन्न ऐतिहासिक प्रभावों को लेकर आंग्मो ने कहा कि देश ने समय के साथ कई बाहरी सांस्कृतिक प्रभावों को अपनाया है। हालांकि, उनके अनुसार किसी दूसरी संस्कृति को सम्मान देने का अर्थ यह नहीं होना चाहिए कि भारतीय परंपराओं को लेकर संकोच किया जाए। उन्होंने डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम का उदाहरण देते हुए कहा कि उन्होंने भारतीय दार्शनिक परंपराओं के साथ-साथ विभिन्न विचारधाराओं का अध्ययन किया था।
आंग्मो ने यह भी कहा कि अलग-अलग धार्मिक और सांस्कृतिक ग्रंथों को पढ़ना व्यक्ति के ज्ञान को व्यापक बनाता है और इससे उसकी अपनी आस्था समाप्त नहीं होती।
विविधता को बताया ‘बॉटनिकल गार्डन’ जैसा
विविधता को समझाने के लिए आंग्मो ने बॉटनिकल गार्डन का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि वहां अलग-अलग रंग, आकार और खुशबू वाले फूल एक साथ मौजूद होते हैं और यही विविधता उसकी खूबसूरती बनाती है। उनके मुताबिक, समाज और राजनीति में भी एकरूपता थोपने के बजाय विभिन्न विचारों और पहचानों के बीच तालमेल विकसित किया जाना चाहिए। उन्होंने इसे ऐसे जिगसॉ पजल से तुलना की, जिसमें अलग-अलग टुकड़े मिलकर पूरी तस्वीर तैयार करते हैं।
शिक्षा व्यवस्था में भारतीय दर्शन की भूमिका
गीतांजलि आंग्मो ने भारतीय दर्शन को शिक्षा व्यवस्था में अधिक जगह देने की जरूरत पर भी जोर दिया। उन्होंने वेद, उपनिषद, गीता, न्याय, वैशेषिक और अद्वैत वेदांत जैसी भारतीय दार्शनिक परंपराओं को विद्यार्थियों के अध्ययन का हिस्सा बनाने की वकालत की। उनका सवाल था कि यदि छात्रों को तर्कशास्त्र और आधुनिक विज्ञान पढ़ाया जाता है, तो भारतीय परंपराओं में मौजूद तार्किक और दार्शनिक विचारों को भी क्यों न समझाया जाए। उनके अनुसार, बच्चों को विभिन्न दार्शनिक विचारों से परिचित कराया जाना चाहिए, ताकि वे समझ के आधार पर अपनी पसंद और दृष्टिकोण विकसित कर सकें।










