जापान की कोंगो गुमी दुनिया की सबसे पुरानी कंपनियों में गिनी जाती है। इसकी शुरुआत 578 ईस्वी में हुई थी। करीब 1448 साल पुराने इस कारोबार को कई पीढ़ियों तक एक ही परिवार ने संभाला। जानिए इसकी पूरी कहानी।
World's Oldest Company: आज कोई कंपनी 50 या 100 साल पूरे कर ले, तो इसे बड़ी उपलब्धि माना जाता है। लेकिन जापान में एक ऐसी कंपनी भी है, जिसका इतिहास करीब डेढ़ हजार साल पुराना है। इसका नाम कोंगो गुमी (Kongō Gumi) है। जब इस कारोबार की शुरुआत हुई थी, तब दुनिया में आज के कई देश भी अस्तित्व में नहीं थे। हैरानी की बात यह है कि इतने लंबे सफर में युद्ध, आर्थिक संकट और मालिक बदलने के बाद भी कंपनी का नाम और उसका पुराना काम बना हुआ है।
578 ईस्वी में एक मंदिर बनाने से शुरू हुआ कारोबार
कोंगो गुमी की शुरुआत जापान के ओसाका शहर से जुड़ी है। इसकी नींव 578 ईस्वी में शिगेमित्सु कोंगो ने रखी थी। वह कोरिया के प्राचीन बैक्जे राज्य से जापान आए कुशल कारीगरों में शामिल थे।
उस दौर में जापान में बौद्ध धर्म का विस्तार हो रहा था। राजकुमार शोतोकु के समय शितेनो-जी मंदिर के निर्माण के लिए विशेष कारीगरों को बुलाया गया। शिगेमित्सु भी इसी काम से जुड़े थे। मंदिर के निर्माण के बाद उन्होंने जापान में रहकर धार्मिक इमारतों की देखरेख और मरम्मत का काम जारी रखा।
यहीं से उस कारोबार की शुरुआत मानी जाती है, जिसे आज दुनिया की सबसे पुरानी कंपनी कहा जाता है। हालांकि इतने प्राचीन दौर के सभी लिखित रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं हैं और शुरुआती इतिहास का कुछ हिस्सा पारंपरिक विवरणों पर आधारित है।
पिता के बाद बेटे ने संभाला काम, सदियों तक चला सिलसिल
कोंगो गुमी की खासियत केवल उसकी उम्र नहीं है। लंबे समय तक इस कंपनी का संचालन एक ही परिवार के पास रहा। परिवार के सदस्य अपने बच्चों और अगली पीढ़ी को मंदिर बनाने की बारीकियां सिखाते थे।
लकड़ी से बनने वाली धार्मिक इमारतों में खास तरह की कारीगरी की जरूरत होती थी। कंपनी के कारीगरों ने इसी हुनर को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाया। मंदिरों के अलावा पुराने धार्मिक भवनों की मरम्मत और उनके पुनर्निर्माण में भी कंपनी की पहचान बनी।
कोंगो परिवार का नेतृत्व लगभग 40 पीढ़ियों तक चलता रहा। पारिवारिक विरासत की चर्चा में 41वीं पीढ़ी का भी जिक्र मिलता है। हालांकि इस लंबे इतिहास में कंपनी का नेतृत्व हमेशा सीधे पिता से बेटे को ही नहीं मिला। परिवार के दूसरे सदस्यों और उत्तराधिकार की अलग व्यवस्थाओं की भी भूमिका रही।
इतने पुराने कारोबार पर कैसे आया आर्थिक संकट?
सैकड़ों साल तक काम करते रहने के बावजूद कोंगो गुमी आर्थिक परेशानियों से नहीं बच सकी। आधुनिक निर्माण उद्योग में बढ़ती प्रतिस्पर्धा और वित्तीय दबाव ने कंपनी के लिए मुश्किलें खड़ी कर दीं।
2005 तक कंपनी का सालाना कारोबार लगभग 7.5 अरब जापानी येन बताया जाता था। इसके बावजूद कर्ज का बोझ बढ़ता गया। पुरानी कारोबारी पहचान और पारंपरिक कारीगरी के सहारे कंपनी अपने वित्तीय संकट को दूर नहीं कर सकी।
आखिरकार 2006 में करीब 1428 साल पुरानी पारिवारिक कंपनी को अपना स्वतंत्र स्वरूप छोड़ना पड़ा। यह कोंगो परिवार के लिए बड़ा बदलाव था, क्योंकि जिस कारोबार को उनके पूर्वजों ने शुरू किया था, उसका मालिकाना नियंत्रण अब दूसरे हाथों में जाने वाला था।
2006 में दूसरे ग्रुप के पास पहुंची कंपनी
वित्तीय संकट के बाद जापान के ताकामात्सु कंस्ट्रक्शन ग्रुप ने कोंगो गुमी का कारोबार अपने समूह में शामिल कर लिया। इसके साथ ही सदियों से चला आ रहा स्वतंत्र पारिवारिक संचालन समाप्त हो गया।
हालांकि नए प्रबंधन ने कंपनी की पुरानी पहचान बरकरार रखी। उसके अनुभवी कारीगरों और पारंपरिक निर्माण तकनीकों को भी आगे जारी रखा गया।
ताकामात्सु ग्रुप के आधिकारिक इतिहास में भी 2006 में कोंगो गुमी के समूह से जुड़ने की पुष्टि की गई है। कंपनी आज इसी समूह के तहत अपनी सेवाएं देती है।
आज क्या काम करती है दुनिया की सबसे पुरानी कंपनी?
जापान की कोंगो गुमी आज भी मंदिर बनाने का काम करती है। पुराने मंदिरों की मरम्मत के लिए भी इसी कंपनी के कारीगर बुलाए जाते हैं। कहीं छत की लकड़ियां खराब हो गई हों या मंदिर का कोई हिस्सा टूट गया हो, तो उसे पहले जैसी हालत में लाने की कोशिश की जाती है। खास ध्यान इस बात पर रहता है कि मरम्मत के बाद मंदिर का पुराना रूप बना रहे। लकड़ी को तराशने और उसके अलग-अलग हिस्सों को जोड़ने में आज भी वे तरीके काम आते हैं, जिन्हें जापानी कारीगर सदियों से अपनाते रहे हैं।
कंपनी का दफ्तर ओसाका में है, जबकि मंदिरों के निर्माण और मरम्मत का काम जापान के दूसरे इलाकों में भी होता है। पुराने जमाने में कारीगर लकड़ी काटने से लेकर मंदिर का ढांचा खड़ा करने तक ज्यादातर काम अपने हाथों से करते थे। अब कई काम मशीनों से होने लगे हैं। फिर भी मंदिर की पुरानी बनावट के मुताबिक लकड़ी तैयार करना और उसे सही जगह फिट करना आसान नहीं होता। इसके लिए ऐसे कारीगर चाहिए, जिन्हें इस काम का वर्षों का अनुभव हो। यही वजह है कि कोंगो गुमी में आज भी पुरानी जापानी कारीगरी की अहमियत बनी हुई है।









