हिंसा की आग में जल रहा मणिपुर, अब तक 9000 लोग हुए विस्थापित कइयों ने गवाँई जान
भारत के पूर्वी राज्य मणिपुर एक बार फिर से हिंसा की चपेट में है, अचानक भड़की इस हिंसा ने राज्य में सबकुछ अस्त व्यस्त कर दिया है। राज्य सरकार ने जानबूझ कर उपद्रव करने के मामले में देखते ही गोली मारने के आदेश दिए हैं। दरससल तीन मई को मणिपुर के है कोर्ट ने एक आदेश दिया, उस आदेश के बाद से ही पुरे राज्य में हिंसा सुरु हो गई और देखते ही देखते इस हिंसा ने पुरे प्रदेश को अपने चपेट में ले लिया।
अभी तक के अनुमान के मुताबिक़ इस हिंसा की वजह से अब तक करीब करीब 9000 से ज्यादा लोग विस्थापित और काफी संख्या में लोग जख्मी भी हुए हैं। राज्य सरकार के पास अभी जख्मी हुए लोगों की या मरने वाले लोगों का सटीक आंकड़ा नहीं है इसलिए सरकार अभी ये बताने की स्थिति में नहीं है की कितने लोग जख्मी हुए हैं या कितने लोगों की मौत हुई है। इस बारे में और खबर मिलते ही हम उसे इस खबर के साथ जोड़ देंगे।
क्यों भड़की हिंसा
असल में मणिपुर में तनाव फरवरी महीने से ही सुरु हो गया था जब प्रदेश की सरकार ने कुछ संरक्षित इलाक़ों से अतिक्रमण हटाने का काम सुरु किया था। फरवरी से ही लोग अतिक्रमण हटाए जाने का विरोध कर रहे थे, पर तीन मई को जब है कोर्ट ने आदेश सुनाया उसके बाद विरोध इतना बढ़ा की इसने हिंसक रूप ले लिया।
क्या था है कोर्ट के आदेश में
है कोर्ट ने अपने आदेश में कहा है की राज्य सरकार उस सिफ़ारिश को लागू करे जो दस साल पहले की गई थी, इस सिफारिश में ग़ैर-जनजाति बाले मैतेई समुदाय को, स्थानीय जनजाति में शामिल करने की थी। इस जनजाति के लोगोन का दबदबा मणिपुर के करीब करीब 10 प्रतिशत भूभाग पर है। वहीँ मणिपुर की आबादी में मैतेई समुदाय की हिस्सेदारी तक़रीबन 65 % के आसपास है
मैतेई समुदाय
मणिपुर की आबादी में मैतेई समुदाय की हिस्सेदारी तक़रीबन 65 % के आसपास है।
मैतेई समुदाय के कुल 40 विधायक हैं, मणिपुर में कुल विधायकों की संख्या 60 है।
मणिपुर राज्य में काफी बड़ा इलाका पहाड़ी छेत्र का है, मान्यता प्राप्त जनजातियों की 35 फ़ीसदी आबादी इन्ही पहाड़ी भौगोलिक क्षेत्र में रहती है।
लेकिन मान्यता प्राप्त जनजातियों के सिर्फ 20 विधायक ही हैं
मैतेई समुदाय में हिन्दू और मुस्लिम दोनों ही धर्मो को मानने वाले हैं , इनमे से समुदाय का बड़ा हिस्सा हिन्दू धर्म को मानता है।
जिन 33 समुदायों को कोर्ट के आदेश के द्वारा जनजाति का दर्जा मिला है, उन्हें कुकी और नगा जनजाति के रूप में जाना जाता है. ये दोनों ही स्थानीय जनजातियां मुख्य रूप से ईसाई धर्म को मानते हैं।
मैतेई समुदाय का तर्क
शिड्यूल ट्राइब डिमांड कमिटी ऑफ़ मणिपुर यानी ( (STDCM) ) साल 2012 से ही ये मांग कर रहा है की मैतेई समुदाय को जनजाति का दर्जा दिया जाए। (STDCM) ) ने ये भी कहा है की मैतेई समुदाय को बाहरियों के अतिक्रमण सेबचाये जाने के लिए इस संवैधानिक कवच की ज़रूरत है। दलील है कि मैतेई समुदाय को जनजाति का दर्जा इस समुदाय को लोगों के पूर्वजों की ज़मीन, और परंपरा, के साथ साथ संस्कृति और भाषा की रक्षा भी करेगा।