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प्रेम संबंधों में अलगाव का मतलब रेप नहीं, सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला

प्रेम संबंधों में अलगाव का मतलब रेप नहीं, सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला
अंतिम अपडेट: 19 घंटा पहले

सुप्रीम कोर्ट ने विवाह के झूठे वादे के आधार पर रेप के मामले दर्ज करने की प्रवृत्ति पर गहरी चिंता जताई है। अदालत ने कहा कि समाज में बदलते नैतिक मूल्यों और सामाजिक मानदंडों के मद्देनजर, प्रेम संबंधों का टूटना यौन शोषण के आरोपों का आधार नहीं बनना चाहिए।

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने विवाह के झूठे वादे के आधार पर रेप के मामले दर्ज करने की बढ़ती प्रवृत्ति पर गंभीर चिंता जताई है। जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस राजेश बिंदल की बेंच ने बुधवार को इस मुद्दे पर अपनी राय व्यक्त की। बेंच ने कहा कि प्रेम संबंधों का बिगड़ना और जोड़ों का अलग होना, आदर्श रूप से महिलाओं के लिए रेप के मामले दर्ज कराने का कारण नहीं होना चाहिए। कोर्ट ने विशेष रूप से बदलते समाजिक और नैतिक मूल्यों के संदर्भ में इस तरह के मामलों में सावधानी बरतने की सलाह दी।

बदलते सामाजिक परिप्रेक्ष्य में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस राजेश बिंदल की बेंच ने बुधवार को एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि प्रेम संबंध का बिगड़ना और विवाह का न हो पाना, स्वाभाविक रूप से रेप का मामला दर्ज कराने का कारण नहीं हो सकता। अदालत ने कहा कि हमें बदलते समाज और नैतिक मूल्यों के अनुसार इस प्रकार के मामलों को देखना होगा।

दरअसल, एक व्यक्ति ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर रेप के आरोपों को रद्द करने की मांग की थी। याचिकाकर्ता का कहना था कि उसकी मंगेतर रही महिला ने सगाई टूटने के बाद रेप का आरोप लगाया है। महिला का दावा था कि शादी का झूठा वादा कर शारीरिक संबंध बनाए गए।

महिला की समझदारी पर भी सवाल

अदालत ने महिला की दलीलों को सुनने के बाद कहा कि याचिकाकर्ता के साथ रिश्ते में महिला बालिग थी और उसे अपनी समझदारी का उपयोग करना चाहिए था। सुप्रीम कोर्ट ने इस बात को भी रेखांकित किया कि महिला ने सीनियर एडवोकेट माधवी दीवान को अपना पक्ष रखने के लिए नियुक्त किया है, जो यह दर्शाता है कि उसे भोली और अनुभवहीन नहीं कहा जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में अक्सर पुरुष को ही दोषी ठहराने का चलन है। कोर्ट ने कहा, "हम इसे केवल एक पक्षीय दृष्टिकोण से नहीं देख सकते। हमें किसी एक जेंडर के प्रति पक्षपात नहीं रखना चाहिए।" अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि अगर हमारे परिवार में भी ऐसी स्थिति आती है, तो हमें इसे व्यापक दृष्टिकोण से देखना होगा। न्यायाधीशों ने कहा कि समाज को अपनी पुरानी सोच से बाहर आना चाहिए और दोनों पक्षों की बातों पर निष्पक्षता से विचार करना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट का सख्त संदेश

अदालत ने इस मामले में कहा कि बदलते समय के साथ रिश्तों में उतार-चढ़ाव आना स्वाभाविक है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हर बार अलगाव के बाद रेप का आरोप लगाया जाए। यह प्रवृत्ति न केवल न्यायिक प्रणाली पर बोझ डालती है बल्कि वास्तविक पीड़िताओं के न्याय की राह भी कठिन बनाती है।

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