आगरा में आलू किसानों की परेशानी लगातार बढ़ती जा रही है। जिस फसल से किसानों को अच्छी आमदनी की उम्मीद थी, वही अब उनके लिए आर्थिक बोझ बनती जा रही है। बाजार में आलू का उचित भाव नहीं मिल रहा है और बड़ी मात्रा में आलू अभी भी कोल्ड स्टोरेज में रखा हुआ है। किसानों के सामने सबसे बड़ी चिंता यह है कि पुरानी फसल बिक नहीं रही, जबकि नई आलू फसल की बोआई का समय भी नजदीक आ गया है। ऐसे में बीज, खाद, सिंचाई, मजदूरी और खेत की तैयारी के लिए पैसे जुटाना मुश्किल हो रहा है।
आगरा जिले में आलू की खेती बड़े पैमाने पर होती है। मौजूदा स्थिति के अनुसार जिले में करीब 85 हजार हेक्टेयर क्षेत्रफल में आलू की खेती होती है और यहां 332 कोल्ड स्टोरेज हैं। इन शीतगृहों में इस सीजन में लगभग 30.41 लाख मीट्रिक टन आलू भंडारित किया गया था। सितंबर के आखिर तक भी करीब 55 से 60 प्रतिशत आलू कोल्ड स्टोरेज में जमा बताया जा रहा है। यानी बड़ी मात्रा में फसल अभी किसान और व्यापारियों के पास बिक्री के लिए उपलब्ध नहीं हो सकी है।
किसानों के लिए समस्या केवल यह नहीं है कि आलू का भाव कम है। असली परेशानी यह है कि कम कीमत पर भी खरीदार पर्याप्त संख्या में सामने नहीं आ रहे हैं। कई किसानों ने आलू को कोल्ड स्टोरेज में इसलिए रखा था कि कुछ समय बाद बाजार में मांग बढ़ेगी और उन्हें बेहतर कीमत मिल सकेगी। लेकिन अब नई फसल की बोआई का समय सामने है और पुराना आलू अभी तक पर्याप्त मात्रा में नहीं निकल पाया है। ऐसे में किसान दोहरी आर्थिक चुनौती में फंस गए हैं।
सितंबर के मध्य में आलू किसानों की समस्या का समाधान खोजने के लिए क्रेता-विक्रेता सम्मेलन भी आयोजित किया गया था। इसमें देशभर से आलू व्यापारियों को बुलाकर किसानों की फसल की अधिक से अधिक निकासी और बेहतर भाव दिलाने की योजना पर चर्चा की गई थी। इस आयोजन से किसानों को उम्मीद जगी थी कि बड़ी संख्या में खरीदार आगरा पहुंचेंगे और कोल्ड स्टोरेज में रखा आलू तेजी से बाजार में आएगा। लेकिन अमर उजाला की रिपोर्ट के मुताबिक सम्मेलन के बाद भी निकासी में अपेक्षित तेजी नहीं आई और आयोजन महज कुछ सौदों तक सीमित रह गया।
जागरण की 30 सितंबर की रिपोर्ट के अनुसार, किसानों को घाटे से निकालने के लिए जिन उपायों की चर्चा की गई थी, उनमें से कई का असर जमीन पर नजर नहीं आया है। किसानों का कहना है कि उन्हें अपनी उपज का लागत के अनुरूप मूल्य नहीं मिल पा रहा है। स्थिति यह है कि कुछ किस्मों के आलू को खरीदारों की तलाश है, जबकि 3797, चिप्सोना और हाइब्रिड जैसी किस्मों की मांग भी कमजोर बताई जा रही है।
किसानों की चिंता इसलिए भी बढ़ रही है क्योंकि अगली फसल के लिए उन्हें तत्काल नकदी की जरूरत है। अक्टूबर के मध्य से जिले के कई इलाकों में आलू की बोआई शुरू हो जाती है। खेत की जुताई, बीज, खाद, दवा, सिंचाई और मजदूरी समेत कई खर्च एक साथ सामने आते हैं। यदि पिछली फसल से पर्याप्त पैसा वापस नहीं आता है तो किसान अगली फसल में निवेश कैसे करेंगे, यह बड़ा सवाल बन गया है। सितंबर की एक रिपोर्ट में भी बताया गया था कि पिछली फसल की निकासी न होने से आलू का अगला रकबा प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है।
कोल्ड स्टोरेज में रखा आलू भी किसानों के लिए लगातार खर्च का कारण बन रहा है। भंडारण अवधि बढ़ने के साथ भाड़े का दबाव बढ़ता है। दूसरी ओर बाजार में कीमत इतनी आकर्षक नहीं है कि किसान तुरंत अपना आलू निकालकर बेच सकें। ऐसे में कई किसान इंतजार कर रहे हैं कि बाजार में मांग बढ़े और उन्हें बेहतर भाव मिले। लेकिन लंबे समय तक इंतजार करने की स्थिति भी उनके लिए जोखिम भरी है, क्योंकि भंडारण की समयसीमा खत्म होने के बाद आलू की गुणवत्ता और बिक्री दोनों पर असर पड़ सकता है।
आलू किसानों को राहत देने के लिए सरकार की ओर से भंडारण शुल्क पर सब्सिडी और भामाशाह योजना का भी उल्लेख किया गया है। जागरण की रिपोर्ट के अनुसार, भामाशाह योजना के तहत 700 रुपये प्रति क्विंटल से कम में आलू बिकने की स्थिति में अधिकतम 35 हजार रुपये तक की सहायता का प्रावधान बताया गया है। हालांकि किसानों की शिकायत है कि ऐसी योजनाओं का लाभ सीमित संख्या में किसानों तक ही पहुंच पाया है। इससे बड़ी संख्या में किसान अब भी बाजार की मंदी से जूझ रहे हैं।
सबसे अधिक चर्चा इस बात की थी कि आगरा के आलू को विदेशों तक पहुंचाया जाएगा। निर्यात के जरिए किसानों को घरेलू बाजार की कम कीमत से राहत मिलने की उम्मीद थी। इसके लिए व्यापारियों और प्रशासनिक स्तर पर प्रयासों की बात कही गई थी। लेकिन मौजूदा स्थिति में आगरा से आलू का निर्यात किसानों की उम्मीद के मुताबिक शुरू नहीं हो पाया है। जिला उद्यान अधिकारी मनोज कुमार के हवाले से जागरण ने बताया है कि उत्तर प्रदेश से कुल 10 नमूने रूस भेजे गए हैं, जिनमें आगरा के नमूने भी शामिल हैं, लेकिन अभी तक कोई ऑर्डर प्राप्त नहीं हुआ है।
निर्यात के लिए केवल नमूने भेजे जाने और वास्तविक ऑर्डर नहीं मिलने के कारण किसानों को जिस बड़े बाजार की उम्मीद थी, वह फिलहाल नहीं खुल पाया है। किसानों के लिए निर्यात तभी राहत का माध्यम बन सकता है जब खरीदारों के ठोस ऑर्डर मिलें, परिवहन और पैकिंग की व्यवस्था हो तथा कीमत घरेलू बाजार की तुलना में बेहतर हो। फिलहाल इन प्रयासों का अपेक्षित परिणाम नहीं आने से किसान स्थानीय बाजार और कोल्ड स्टोरेज की स्थिति पर ही निर्भर हैं।
आगरा के आलू किसानों की परेशानी इस साल अचानक पैदा हुई समस्या नहीं है। जून में भी जिले से रिपोर्ट आई थी कि आलू के भाव में लगातार कमजोरी बनी हुई थी और उस समय तक कोल्ड स्टोरेज से बहुत कम मात्रा में आलू बाहर निकला था। उस रिपोर्ट में बताया गया था कि इस वर्ष करीब 85 हजार हेक्टेयर में आलू बोया गया था और उत्पादन ठीक रहने के बावजूद बाजार भाव किसानों के लिए निराशाजनक रहा।
कम कीमत का असर किसान की पूरी खेती की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। खेत तैयार करने से लेकर फसल की खुदाई तक किसान को बीज, खाद, दवा, पानी और मजदूरी पर लगातार खर्च करना पड़ता है। इसके बाद फसल को मंडी या कोल्ड स्टोरेज तक पहुंचाने का खर्च अलग होता है। यदि बिक्री के समय कीमत इतनी कम हो कि इन खर्चों की भरपाई भी न हो पाए तो किसान को वास्तविक नुकसान उठाना पड़ता है। यही स्थिति आगरा के कई आलू उत्पादक क्षेत्रों में बताई जा रही है।
जुलाई में भी आगरा के किसानों की ओर से राहत की मांग सामने आई थी। उस समय कोल्ड स्टोरेज संचालकों के संगठन ने सरकार से किसानों को भंडारण भाड़े में 250 रुपये प्रति क्विंटल तक अनुदान देने की मांग की थी। संगठन का तर्क था कि उत्पादन लागत की तुलना में किसानों को पर्याप्त कीमत नहीं मिल रही है और कम भाव के कारण उनकी आर्थिक स्थिति पर दबाव बढ़ रहा है।
इस संकट का असर केवल मौजूदा आलू की बिक्री तक सीमित नहीं रह सकता। यदि किसान पिछली फसल से पर्याप्त पैसा नहीं निकाल पाते हैं तो अगली फसल के लिए बीज खरीदना भी कठिन हो सकता है। सितंबर की रिपोर्ट में इसी वजह से आलू के अगले रकबे में कमी आने की आशंका जताई गई थी। हालांकि वास्तविक रकबा कितना प्रभावित होगा, यह आने वाले दिनों में किसानों की बिक्री और बाजार भाव पर निर्भर करेगा।
आगरा के किसानों के लिए फिलहाल सबसे जरूरी सवाल यह है कि कोल्ड स्टोरेज में रखा आलू समय रहते किस तरह बाजार तक पहुंचे और किसानों को लागत के करीब या उससे बेहतर मूल्य कैसे मिले। इसके साथ ही निर्यात के लिए भेजे गए नमूनों के आधार पर वास्तविक खरीदार और ऑर्डर सामने आना भी महत्वपूर्ण होगा। केवल निर्यात की घोषणा या सम्मेलन से किसानों को राहत नहीं मिलेगी, बल्कि उन्हें वास्तविक बिक्री और बेहतर कीमत की जरूरत है।
मौजूदा हालात में आगरा का आलू किसान एक तरफ पुरानी फसल के कम भाव से परेशान है तो दूसरी तरफ नई फसल की तैयारी के खर्च का दबाव उसके सामने खड़ा है। कोल्ड स्टोरेज में 55 से 60 प्रतिशत तक आलू जमा होने, बाजार में कमजोर मांग और निर्यात से अभी तक ठोस ऑर्डर नहीं मिलने के कारण किसानों की चिंता बढ़ी हुई है। आने वाले सप्ताह उनके लिए महत्वपूर्ण होंगे, क्योंकि इसी दौरान पुरानी फसल की निकासी और नई फसल की बोआई दोनों का दबाव बढ़ेगा












