कानपुर में बारिश के बाद खराब हुई सड़कों और जगह-जगह बने गड्ढों को भरने की चुनौती अब और बढ़ गई है। सड़क निर्माण और पैचवर्क में इस्तेमाल होने वाले बिटुमिन के दाम में पिछले छह महीनों के दौरान असाधारण बढ़ोतरी हुई है। मार्च 2026 में जिस बिटुमिन की कीमत करीब 38 से 40 हजार रुपये प्रति टन के आसपास बताई जा रही थी, सितंबर में वही कीमत 95 हजार रुपये प्रति टन से ऊपर पहुंच गई है। यानी कुछ ही महीनों में प्रति टन करीब 57 हजार रुपये की बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
महज कीमत बढ़ना ही समस्या नहीं है, बल्कि बाजार में बिटुमिन की उपलब्धता को लेकर भी संकट खड़ा हो गया है। जागरण की रिपोर्ट के अनुसार, मथुरा रिफाइनरी से ठेकेदारों को पर्याप्त आपूर्ति नहीं मिल पा रही है और कई मामलों में 15 से 20 दिन की प्रतीक्षा के बाद भी एक ट्रक बिटुमिन मिलना मुश्किल हो रहा है। ऐसे में बारिश के बाद तेजी से पैचवर्क कराने की जरूरत और दूसरी ओर कच्चे माल की सीमित उपलब्धता ने सड़क मरम्मत से जुड़े विभागों और ठेकेदारों की परेशानी बढ़ा दी है।
कानपुर में लगातार बारिश के बाद शहर की कई प्रमुख और संपर्क सड़कों की ऊपरी परत उखड़ गई है। जलभराव वाले इलाकों में सड़कें और अधिक क्षतिग्रस्त हुई हैं और कई जगह गड्ढों का आकार भी बढ़ गया है। सामान्य परिस्थितियों में ऐसे स्थानों पर हॉट मिक्स और बिटुमिन के जरिए पैचवर्क कराया जाता है, लेकिन इस समय महंगा बिटुमिन और आपूर्ति में देरी दोनों ही काम की गति को प्रभावित कर रहे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, शहर में तीन दिनों की बारिश के बाद 300 से अधिक प्रमुख और संपर्क मार्गों पर सड़क की ऊपरी परत प्रभावित हुई है।
बिटुमिन की कीमतों में बढ़ोतरी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि मार्च 2026 में कीमत करीब 40,580 रुपये प्रति टन बताई गई थी। अप्रैल में यह बढ़कर 77,440 रुपये, मई में 81,640 रुपये, जून में कुछ कमी के साथ 75,070 रुपये और जुलाई में फिर बढ़कर 83,410 रुपये प्रति टन हो गई। सितंबर में यह आंकड़ा 95,570 रुपये प्रति टन तक पहुंच गया। ये आंकड़े लोक निर्माण विभाग के ठेकेदार संघ द्वारा बताए गए आंकड़ों पर आधारित हैं।
इसका सीधा असर उन सड़कों पर पड़ सकता है, जिनकी बारिश के बाद तत्काल मरम्मत जरूरी है। नगर निगम, लोक निर्माण विभाग और राष्ट्रीय राजमार्ग से जुड़े कार्यों में पैचवर्क के लिए बिटुमिन की जरूरत होती है। छोटे गड्ढों के लिए फिलहाल पैकेट पैच जैसे विकल्पों से काम चलाने की कोशिश की जा सकती है, लेकिन बड़े स्तर पर सड़क की मरम्मत के लिए पर्याप्त मात्रा में बिटुमिन की जरूरत होती है। ऐसे में यदि आपूर्ति सामान्य नहीं हुई तो मरम्मत कार्यों की रफ्तार पर असर पड़ने की आशंका है।
कानपुर में सड़क मरम्मत का दबाव पहले से ही बना हुआ है। सितंबर में शहर की 149 सड़कों की जांच के बाद 111 सड़कें बेहद खराब स्थिति में पाई गई थीं। जांच रिपोर्ट में कई जगह जलभराव और पैचवर्क की समस्याएं सामने आई थीं और अधिकारियों को सड़कों की मरम्मत के निर्देश दिए गए थे।
इसके अलावा मंडलायुक्त स्तर पर भी सड़क मरम्मत को लेकर अधिकारियों को समयबद्ध तरीके से काम पूरा करने के निर्देश दिए गए हैं। सितंबर में प्रमुख मार्गों के निरीक्षण के दौरान पैचवर्क जल्द पूरा कराने पर जोर दिया गया था। इससे स्पष्ट है कि सड़क मरम्मत की मांग इस समय पहले से अधिक है, जबकि बिटुमिन की कीमत और उपलब्धता दोनों चुनौती बनकर सामने आ रही हैं।
बिटुमिन पेट्रोलियम रिफाइनिंग प्रक्रिया से प्राप्त होने वाला महत्वपूर्ण उत्पाद है। इसके दाम पर कच्चे तेल की कीमत, रिफाइनरी उत्पादन, परिवहन लागत, घरेलू मांग और उपलब्ध स्टॉक जैसे कई कारकों का असर पड़ता है। कानपुर में मौजूदा तेजी को पश्चिम एशिया के संघर्ष से पैदा हुई वैश्विक ऊर्जा बाजार की अनिश्चितता से भी जोड़ा जा रहा है। हालांकि स्थानीय बाजार में बिटुमिन की कीमत केवल अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों पर निर्भर नहीं करती, बल्कि घरेलू उत्पादन और आपूर्ति की स्थिति भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
जागरण की रिपोर्ट के मुताबिक, कानपुर और आसपास के क्षेत्र में बिटुमिन की आपूर्ति को लेकर मथुरा रिफाइनरी महत्वपूर्ण स्रोत है। मौजूदा स्थिति में वहां से पर्याप्त मात्रा में माल समय पर नहीं पहुंच पा रहा है। ठेकेदारों के लिए समस्या यह है कि सड़क निर्माण या मरम्मत का काम पहले से तय दरों और समयसीमा के आधार पर लिया जाता है, जबकि कच्चे माल की कीमत अचानक काफी बढ़ गई है।
इस बढ़ोतरी का असर ठेकेदारों की लागत पर भी पड़ रहा है। जिस काम का अनुमान उस समय तैयार किया गया था, जब बिटुमिन अपेक्षाकृत सस्ता था, उसी काम को मौजूदा कीमत पर पूरा करना अधिक महंगा हो गया है। यही वजह है कि ठेकेदार संगठन रेट रिवाइज करने की मांग कर रहे हैं। उनके अनुसार, यदि लागत में इतनी बड़ी वृद्धि होती है तो पुराने अनुबंधों की दरों पर काम जारी रखना कठिन हो सकता है।
पीडब्ल्यूडी और केडीए से जुड़े कार्यों के लिए बढ़ी हुई लागत को देखते हुए रेट रिवाइज के आधार पर भुगतान की व्यवस्था का रास्ता खुला है। रिपोर्ट में बताया गया है कि प्रमुख सचिव स्तर से ऐसे निर्देश दिए गए हैं, ताकि बिटुमिन की कीमत बढ़ने के कारण ठेकेदारों पर पड़ने वाले अतिरिक्त बोझ को अनुबंधीय व्यवस्था के तहत संभाला जा सके। वहीं प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना और यूपीसीडा के कामों में बढ़ी कीमतों को लेकर स्पष्ट नीति नहीं होने की बात भी सामने आई है।
ठेकेदारों का कहना है कि जिस दर पर काम लिया गया था, उस समय बिटुमिन की कीमत और वर्तमान कीमत में बहुत बड़ा अंतर आ चुका है। ऐसे में मौजूदा कीमत पर सामग्री खरीदकर निर्धारित दर में काम पूरा करना आर्थिक रूप से मुश्किल हो रहा है। इसी वजह से कुछ परियोजनाओं में काम की गति प्रभावित होने की बात कही जा रही है। हालांकि पीडब्ल्यूडी के मुख्य अभियंता रविदत्त कुमार के अनुसार, रेट लगातार संशोधित किए जा रहे हैं और तीन महीने में समीक्षा के आधार पर भुगतान सुनिश्चित किया जाता है। उन्होंने यह भी कहा कि आपूर्ति में परेशानी जरूर है, लेकिन बहुत अधिक कार्य प्रभावित नहीं हुए हैं और समय पर पैचवर्क पूरा कराने के निर्देश दिए गए हैं।
सड़क मरम्मत के लिए समय भी महत्वपूर्ण है। बारिश के बाद सड़क में पानी घुसने से डामर की ऊपरी परत कमजोर हो जाती है और छोटे गड्ढे धीरे-धीरे बड़े गड्ढों में बदल सकते हैं। यदि ऐसे स्थानों पर समय रहते पैचवर्क नहीं हुआ तो वाहनों की आवाजाही प्रभावित होने के साथ सड़क की स्थिति और खराब हो सकती है। इसलिए विभागों के सामने एक तरफ बढ़ी लागत का प्रबंधन करने और दूसरी तरफ उपलब्ध सामग्री के साथ जरूरी सड़कों की मरम्मत तेजी से कराने की चुनौती है।
कानपुर में हॉट मिक्स प्लांट के जरिए खराब सड़कों के पैचवर्क की तैयारी पहले से चल रही है। सितंबर में नगर निगम की ओर से बारिश से खराब हुई सड़कों पर हॉट मिक्स प्लांट से पैचवर्क कराने की योजना सामने आई थी। इससे पता चलता है कि सड़क मरम्मत के लिए सामग्री की जरूरत इस समय काफी अधिक है।
यदि बिटुमिन की कीमत आने वाले दिनों में एक लाख रुपये प्रति टन तक पहुंचती है, जैसा कि मौजूदा बाजार स्थिति को देखते हुए रिपोर्ट में आशंका जताई गई है, तो सड़क मरम्मत की लागत पर और दबाव पड़ सकता है। मार्च की तुलना में यह कीमत ढाई गुने से भी अधिक हो जाएगी। हालांकि अंतिम कीमत बाजार, रिफाइनरी आपूर्ति और कच्चे तेल की स्थिति पर निर्भर करेगी।
अधिकारियों के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती यह है कि महंगे बिटुमिन के बावजूद जरूरी पैचवर्क को समय पर कैसे पूरा किया जाए और जिन परियोजनाओं की लागत बढ़ रही है, उनके लिए संशोधित दर और भुगतान की व्यवस्था कैसे लागू की जाए। वहीं ठेकेदारों के लिए सामग्री की नियमित उपलब्धता सबसे अहम मुद्दा बनी हुई है। यदि आपूर्ति में सुधार होता है तो सड़क मरम्मत की गति बढ़ाई जा सकती है, लेकिन लंबे समय तक आपूर्ति संकट बना रहा तो बारिश से क्षतिग्रस्त सड़कों की मरम्मत में और देरी हो सकती है।











