इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि किसी व्यक्ति को 24 घंटे से अधिक अवैध रूप से हिरासत में रखने पर 25 हजार रुपये प्रतिदिन के हिसाब से मुआवजा देना होगा। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि दोषी अधिकारी के वेतन से राशि वसूली जाएगी और विभागीय कार्रवाई भी की जाएगी।
प्रयागराज: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता और नागरिक अधिकारों की सुरक्षा को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा है कि यदि किसी व्यक्ति को 24 घंटे से अधिक समय तक अवैध रूप से हिरासत में रखा जाता है तो उसे 25 हजार रुपये प्रतिदिन की दर से मुआवजा दिया जाएगा। कोर्ट ने इस मामले में पुलिस अधिकारियों की जवाबदेही तय करने के भी निर्देश दिए हैं।
अवैध हिरासत पर हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका की सुनवाई के दौरान अवैध हिरासत के मामलों पर कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने कहा कि किसी भी व्यक्ति को कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के विपरीत हिरासत में रखना उसके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है और इसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों को जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए।
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खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि यदि किसी व्यक्ति को 24 घंटे से अधिक समय तक गैरकानूनी रूप से हिरासत में रखा जाता है, तो उसे प्रतिदिन 25 हजार रुपये के हिसाब से मुआवजा दिया जाएगा। यह राशि विभागीय जांच में दोष सिद्ध होने के बाद संबंधित अधिकारी के वेतन से वसूली जाएगी।
याचिका की सुनवाई में सामने आए तथ्य
मामला गाजियाबाद निवासी अधिवक्ता चंद्रपाल पाल सिंह और उनके परिजनों द्वारा दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका से जुड़ा था। याचिकाकर्ता की ओर से अदालत को बताया गया कि उन्हें पुलिस द्वारा हिरासत में लेने के बाद निर्धारित समय सीमा के भीतर मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश नहीं किया गया।
याचिका में यह भी आरोप लगाया गया कि आवश्यक कानूनी प्रक्रिया पूरी होने और बांड भरने के बावजूद उन्हें जेल में रखा गया। मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने रिकॉर्ड और तथ्यों का परीक्षण किया तथा हिरासत की परिस्थितियों पर गंभीर सवाल उठाए।
याची को 75 हजार रुपये मुआवजा देने का आदेश
कोर्ट ने मामले में याची को 75 हजार रुपये मुआवजा देने का निर्देश दिया। यह राशि तीन दिनों की अवधि के आधार पर निर्धारित की गई है। अदालत ने राज्य सरकार को छह सप्ताह के भीतर भुगतान सुनिश्चित करने का आदेश दिया है।
साथ ही यह भी कहा गया कि विभागीय जांच के बाद संबंधित अधिकारियों से यह राशि वसूल की जाएगी। अदालत ने पुलिस प्रशासन से मामले में कार्रवाई की प्रगति रिपोर्ट भी मांगी है।
डीजीपी को जारी करना होगा सर्कुलर
हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (DGP) को निर्देश दिया है कि इस आदेश के संबंध में सभी जिला पुलिस प्रमुखों और संबंधित अधिकारियों को सर्कुलर जारी किया जाए।
अदालत का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि भविष्य में किसी भी व्यक्ति के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन न हो और पुलिस तथा प्रशासनिक अधिकारी कानूनी प्रक्रियाओं का पूरी तरह पालन करें।
कोर्ट ने जारी किए महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश
फैसले में अदालत ने अवैध हिरासत और निवारक कार्रवाई से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश भी दिए हैं। अदालत ने कहा कि निवारक हिरासत के मामलों में केवल सीमित राशि का व्यक्तिगत बांड लिया जाए और यदि अधिक राशि तय की जाती है तो उसके लिए स्पष्ट कारण दर्ज किए जाएं।
कोर्ट ने यह भी कहा कि रिहाई संबंधी औपचारिकताएं पूरी होते ही संबंधित व्यक्ति को उसी दिन रिहा किया जाना चाहिए। इसके अलावा, लापरवाही या अधिकारों के उल्लंघन के मामलों में संबंधित अधिकारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई अनिवार्य होगी।
नागरिक अधिकारों की सुरक्षा पर जोर
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यह फैसला व्यक्तिगत स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अदालत ने स्पष्ट संदेश दिया है कि किसी भी व्यक्ति को कानून से परे जाकर हिरासत में रखना स्वीकार्य नहीं है और ऐसे मामलों में जिम्मेदार अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से जवाबदेह ठहराया जा सकता है।
इस फैसले को भविष्य में अवैध हिरासत से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण न्यायिक मिसाल के रूप में भी देखा जा रहा है।







