अन्नपूर्णा जयंती 2025 4 दिसंबर को मनाई जाएगी, जो मार्गशीर्ष पूर्णिमा पर पड़ती है। यह पर्व अन्न और समृद्धि की देवी अन्नपूर्णा को समर्पित है। श्रद्धालु इस दिन पूजा और अन्नदान के माध्यम से जीवन में भोजन, सुख-शांति और समृद्धि की प्राप्ति की कामना करते हैं। अन्नपूर्णा देवी का अवतार पार्वती ने लिया था, ताकि पृथ्वी पर अन्न की आपूर्ति बनी रहे।
Annapurna Jayanti: अन्नपूर्णा जयंती 4 दिसंबर 2025 को मनाई जाएगी और यह पर्व मार्गशीर्ष माह की पूर्णिमा पर पड़ता है। भारत में विशेष रूप से वाराणसी में इस दिन माता अन्नपूर्णा की पूजा श्रद्धा और भक्ति के साथ होती है। अन्नपूर्णा देवी को अन्न और समृद्धि की अधिष्ठात्री माना जाता है, और उनकी पूजा से घर में अन्न का भंडार भरता है, सुख-शांति आती है और जीवन में समृद्धि बनी रहती है। शास्त्रों के अनुसार, माता पार्वती ने अन्नपूर्णा देवी का अवतार लिया ताकि पृथ्वी पर भोजन की कमी न हो।
अन्नपूर्णा देवी अन्न और समृद्धि की अधिष्ठात्री
मां अन्नपूर्णा को हिंदू धर्म में अन्न की देवी माना जाता है। शास्त्रों में कहा गया है कि अन्न का दान सबसे श्रेष्ठ दान है। अन्नपूर्णा जयंती के दिन उनकी पूजा करने से घर में अन्न का भंडार कभी खाली नहीं होता और परिवार में सुख, शांति एवं समृद्धि बनी रहती है। अन्न ही जीवन का आधार है और इसलिए अन्नपूर्णा देवी का महत्व अत्यधिक माना जाता है।
इस साल अन्नपूर्णा जयंती 4 दिसंबर 2025 को मनाई जाएगी। यह पर्व हर साल मार्गशीर्ष (अगहन) माह की पूर्णिमा को होता है। विशेष रूप से वाराणसी में अन्नपूर्णा देवी की पूजा अत्यंत श्रद्धा और भक्ति के साथ की जाती है। शास्त्रों के अनुसार, अन्नपूर्णा देवी का आशीर्वाद प्राप्त करने से जीवन में पर्याप्त भोजन और समृद्धि बनी रहती है।
पूजा मुहूर्त और समय
- पूर्णिमा तिथि प्रारंभ: 4 दिसंबर 2025, सुबह 08:37
- पूर्णिमा तिथि समाप्त: 5 दिसंबर 2025, सुबह 04:43
- पूजा मुहूर्त: सुबह 10:53 से दोपहर 1:29
इस मुहूर्त में अन्नपूर्णा देवी की पूजा करने से विशेष फल की प्राप्ति होती है। श्रद्धालु इस दिन मंदिरों में जाकर या घर पर पूजा कर देवी से आशीर्वाद लेते हैं।

अन्नपूर्णा देवी का अवतार पार्वती की कथा
स्कंदपुराण और शिवपुराण में अन्नपूर्णा देवी के अवतार की कथा का वर्णन मिलता है। कहा गया है कि एक बार भगवान शिव ने संसार में सब कुछ मिथ्या बताया और यह कहा कि अन्न भी माया है। यह बात सुनकर माता पार्वती ने पृथ्वी पर सभी अन्न का लोप कर दिया। परिणामस्वरूप पृथ्वी पर अन्न की कमी हो गई और मानव एवं जीव-जंतु कष्ट में पड़ गए।
इस घटना से भगवान शिव को अपनी गलती का अहसास हुआ और उन्होंने माता पार्वती से क्षमा याचना की। तब माता पार्वती ने अन्नपूर्णा देवी के रूप में प्रकट होकर वाराणसी में लोगों को अन्न प्रदान किया। उसी समय से मार्गशीर्ष पूर्णिमा को अन्नपूर्णा जयंती के रूप में मनाया जाने लगा।
कैसे होती है अन्नपूर्णा जयंती की पूजा
अन्नपूर्णा जयंती पर भक्त सुबह जल्दी उठकर स्नान और शुद्ध वस्त्र धारण करते हैं। मंदिर या घर में पूजा के लिए माता अन्नपूर्णा की प्रतिमा या चित्र सजाया जाता है। पूजा में अन्न के भोग अर्पित किए जाते हैं, जिसमें चावल, दाल, मिठाई और अन्य अनाज शामिल होते हैं।
पूजा में दीपक और धूप का विशेष महत्व है। भक्त मनोकामना, स्वास्थ्य, भोजन की समृद्धि और परिवार की खुशहाली के लिए देवी से प्रार्थना करते हैं। कई स्थानों पर इस दिन गरीबों और जरूरतमंदों में भोजन का वितरण भी किया जाता है। यह परंपरा अन्नदान के महत्व को दर्शाती है और अन्नपूर्णा देवी की भक्ति में शामिल है।
अन्नपूर्णा जयंती का आध्यात्मिक महत्व
अन्नपूर्णा देवी का मुख्य संदेश यह है कि भोजन ही जीवन का आधार है। उनके आशीर्वाद से जीवन में पर्याप्त अन्न, समृद्धि और सुख प्राप्त होता है। शास्त्रों के अनुसार अन्नपूर्णा देवी की पूजा करने वाले व्यक्ति का घर अन्न से भरा रहता है और जीवन में विपत्ति कम आती है।
भक्त मानते हैं कि अन्नपूर्णा देवी की भक्ति से शरीर और मन दोनों को संतोष और शक्ति मिलती है। यह पर्व न केवल भौतिक समृद्धि बल्कि आध्यात्मिक उन्नति का भी प्रतीक है।











