10,472 आयुष्मान आरोग्य मंदिरों का असर, अगस्त में 44.71 लाख लोगों ने लिया OPD परामर्श; रोहतास-मुजफ्फरपुर बने मॉडल

बिहार के 10,472 आयुष्मान आरोग्य मंदिरों में अगस्त में 44.71 लाख से अधिक लोगों ने OPD परामर्श लिया। रोहतास और मुजफ्फरपुर 89% उपलब्धि के साथ आगे रहे।
10,472 आयुष्मान आरोग्य मंदिरों का असर, अगस्त में 44.71 लाख लोगों ने लिया OPD परामर्श; रोहतास-मुजफ्फरपुर बने मॉडल
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बिहार के ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच बढ़ाने के लिए संचालित किए जा रहे आयुष्मान आरोग्य मंदिरों का असर अब स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों में भी दिखाई देने लगा है। राज्य स्वास्थ्य समिति के अनुसार, अगस्त 2026 में बिहार के आयुष्मान आरोग्य मंदिरों के माध्यम से 44.71 लाख से अधिक लोगों ने ओपीडी परामर्श लिया। यह आंकड़ा इस बात की ओर संकेत करता है कि प्राथमिक स्तर पर इलाज और स्वास्थ्य परामर्श की सुविधाएं ग्रामीण आबादी के करीब पहुंच रही हैं। राज्य में कुल 10,472 आयुष्मान आरोग्य मंदिर संचालित किए जा रहे हैं, जिन्हें केवल सामान्य इलाज देने वाले केंद्र के बजाय व्यापक प्राथमिक स्वास्थ्य और वेलनेस सेंटर के रूप में विकसित करने की कोशिश की जा रही है।

स्वास्थ्य विभाग ने स्वास्थ्य उपकेंद्र स्तर पर प्रति एक हजार की आबादी पर हर महीने 60 मरीजों के ओपीडी परामर्श का लक्ष्य निर्धारित किया है। अगस्त में इस लक्ष्य को हासिल करने के मामले में रोहतास और मुजफ्फरपुर जिले खास तौर पर सामने आए। दोनों जिलों में 89-89 प्रतिशत केंद्र निर्धारित ओपीडी मानक तक पहुंचने में सफल रहे। इसका मतलब यह है कि इन जिलों के बड़ी संख्या में ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों पर मरीजों की नियमित आवाजाही रही और लोगों ने स्थानीय स्तर पर ही चिकित्सकीय परामर्श लेना शुरू किया।

मुजफ्फरपुर की बात करें तो अगस्त महीने में जिले के स्वास्थ्य उपकेंद्रों पर 2.66 लाख से अधिक मरीज ओपीडी परामर्श के लिए पहुंचे। स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों में यह भी सामने आया कि खगड़िया में 88 प्रतिशत, लखीसराय में 83 प्रतिशत और शेखपुरा में 78 प्रतिशत केंद्रों ने निर्धारित ओपीडी मानक पूरा किया। अतिरिक्त प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों के स्तर पर सुपौल ने 70 प्रतिशत और वैशाली ने 69 प्रतिशत उपलब्धि दर्ज की। इससे यह समझा जा सकता है कि प्राथमिक स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करने के लिए बनाए गए केंद्रों पर इलाज और परामर्श की मांग बनी हुई है।

आयुष्मान आरोग्य मंदिरों की अवधारणा का उद्देश्य सिर्फ मरीजों को दवा देना नहीं है। इन्हें ऐसे वेलनेस हब के रूप में विकसित करने की योजना है, जहां ग्रामीणों को सामान्य बीमारियों के इलाज के साथ-साथ शुरुआती स्तर की जांच, स्वास्थ्य संबंधी सलाह, जीवनशैली से जुड़ी जानकारी और रोगों की रोकथाम से संबंधित सेवाएं भी मिल सकें। इससे छोटी-मोटी बीमारी या प्रारंभिक स्वास्थ्य समस्या के लिए ग्रामीणों को हर बार जिला अस्पताल या शहर के निजी क्लीनिक तक जाने की जरूरत कम हो सकती है।

ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था में दवाओं की उपलब्धता भी एक महत्वपूर्ण पहलू है। राज्य स्वास्थ्य समिति के आंकड़ों के अनुसार, स्वास्थ्य उपकेंद्र स्तर पर 147 आवश्यक दवाओं की सूची निर्धारित की गई है। अगस्त में इन दवाओं में औसतन 126 दवाएं यानी करीब 86 प्रतिशत दवाएं स्टॉक में उपलब्ध रहीं। इसका सीधा संबंध उन मरीजों से है जिन्हें डॉक्टर या स्वास्थ्यकर्मी से परामर्श लेने के बाद दवा की जरूरत होती है। यदि दवा उसी केंद्र पर उपलब्ध हो जाती है तो मरीज को बाहर से दवा खरीदने के लिए अतिरिक्त पैसा खर्च नहीं करना पड़ता और इलाज की प्रक्रिया भी आसान हो जाती है।

दवा उपलब्धता के मामले में बेगूसराय और रोहतास ने बेहतर प्रदर्शन दर्ज किया। बेगूसराय में 96 प्रतिशत और रोहतास में 95 प्रतिशत दवाओं की उपलब्धता बताई गई। वहीं मुजफ्फरपुर, गया, सुपौल और मुंगेर में भी 90 प्रतिशत से अधिक दवाएं उपलब्ध रहीं। मरीजों को परामर्श के साथ दवा देने के मामले में गया में 75 प्रतिशत और गोपालगंज में 74 प्रतिशत मरीजों को आवश्यक दवाएं उपलब्ध कराई गईं। ये आंकड़े प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर दवा आपूर्ति व्यवस्था की स्थिति को समझने में मदद करते हैं।

स्वास्थ्य सेवाओं को प्रभावी बनाने के लिए केवल डॉक्टर या स्वास्थ्यकर्मी की उपलब्धता पर्याप्त नहीं होती, बल्कि समय पर जांच की सुविधा भी जरूरी होती है। इसी उद्देश्य से आयुष्मान आरोग्य मंदिरों में प्वाइंट-ऑफ-केयर जांच की व्यवस्था पर जोर दिया जा रहा है। इसके तहत मरीजों को कई जरूरी जांच स्थानीय स्तर पर ही उपलब्ध कराने की कोशिश की जा रही है, ताकि बीमारी का प्रारंभिक स्तर पर पता लगाया जा सके और उपचार में देरी न हो।

14 अनिवार्य जांचों की उपलब्धता के मामले में मुजफ्फरपुर 99 प्रतिशत के साथ सबसे आगे रहा, जबकि पश्चिम चंपारण में यह उपलब्धता 98 प्रतिशत दर्ज की गई। समस्तीपुर, मुंगेर और नवादा में भी 95 प्रतिशत से अधिक जांच उपलब्धता दर्ज की गई। इसका महत्व इसलिए अधिक है क्योंकि ग्रामीण क्षेत्रों में कई बार मरीजों को केवल जांच कराने के लिए भी बड़े अस्पताल या निजी पैथोलॉजी केंद्र तक जाना पड़ता है। स्थानीय स्तर पर जांच की सुविधा मिलने से समय और यात्रा खर्च दोनों कम हो सकते हैं।

अतिरिक्त प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर जांच का दायरा और व्यापक है। यहां 63 प्रकार की जांचों की सुविधा के मामले में वैशाली ने 99 प्रतिशत और सीतामढ़ी ने 97 प्रतिशत उपलब्धता दर्ज की। स्वास्थ्य विभाग के अनुसार, इस तरह की जांच सुविधाएं ग्रामीणों की निजी पैथोलॉजी केंद्रों पर निर्भरता कम करने में मदद कर सकती हैं। खासकर आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए स्थानीय स्तर पर जांच उपलब्ध होना महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

आयुष्मान आरोग्य मंदिर मॉडल में बीमारी का इलाज करने के साथ-साथ लोगों को स्वस्थ रखने पर भी जोर दिया जा रहा है। इसके तहत प्रत्येक केंद्र पर हर महीने कम से कम 10 योग और वेलनेस सत्र आयोजित करना अनिवार्य किया गया है। इसका उद्देश्य ग्रामीण आबादी को नियमित शारीरिक गतिविधि, योग, प्राणायाम और स्वस्थ जीवनशैली के प्रति जागरूक करना है। स्वास्थ्य विभाग की सोच यह है कि प्राथमिक स्वास्थ्य व्यवस्था केवल बीमारी होने के बाद उपचार तक सीमित न रहे, बल्कि बीमारी से बचाव और स्वस्थ जीवनशैली को भी इसका हिस्सा बनाया जाए।

योग और वेलनेस सत्रों के आयोजन में पूर्णिया और शेखपुरा ने बेहतर प्रदर्शन किया। दोनों जिलों में 97-97 प्रतिशत केंद्रों पर नियमित वेलनेस सत्र आयोजित किए गए। सहरसा में 93 प्रतिशत और खगड़िया में 90 प्रतिशत केंद्रों पर भी नियमित रूप से ऐसे सत्र आयोजित किए गए। इन गतिविधियों के माध्यम से ग्रामीणों को प्राणायाम, योग और जीवनशैली से जुड़े स्वास्थ्य संदेशों के साथ जोड़ा जा रहा है।

आयुष्मान आरोग्य मंदिरों की व्यवस्था में समुदाय की भागीदारी बढ़ाने के लिए जन आरोग्य समितियों के गठन पर भी जोर दिया गया है। राज्य के 96 प्रतिशत केंद्रों पर जन आरोग्य समितियों का गठन हो चुका है। इन समितियों के माध्यम से स्थानीय स्तर पर स्वास्थ्य केंद्रों की गतिविधियों में समुदाय की भागीदारी और निगरानी बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है। इससे स्वास्थ्य सेवाओं को स्थानीय जरूरतों के अनुरूप बेहतर बनाने में मदद मिलने की उम्मीद है।

दरअसल, बिहार जैसे बड़े और ग्रामीण आबादी वाले राज्य में स्वास्थ्य सेवाओं की सबसे बड़ी चुनौती यही रही है कि मरीजों को प्राथमिक उपचार के लिए भी कई बार दूर जाना पड़ता है। यदि गांव या उसके आसपास ही परामर्श, जरूरी जांच और दवाओं की सुविधा मिल जाए तो जिला अस्पतालों पर अनावश्यक दबाव भी कम किया जा सकता है। आयुष्मान आरोग्य मंदिरों के जरिए इसी प्राथमिक स्तर को मजबूत करने पर ध्यान दिया जा रहा है। अगस्त में 44.71 लाख से अधिक लोगों का ओपीडी परामर्श लेना इस व्यवस्था के उपयोग का बड़ा आंकड़ा है।

मुजफ्फरपुर का प्रदर्शन इस लिहाज से खास है कि जिले में एक ओर ओपीडी लक्ष्य हासिल करने वाले केंद्रों का अनुपात 89 प्रतिशत रहा, वहीं दूसरी ओर 14 अनिवार्य जांचों की उपलब्धता 99 प्रतिशत तक पहुंची। अगस्त में 2.66 लाख से अधिक मरीजों का स्वास्थ्य उपकेंद्रों पर पहुंचना भी जिले में प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं की मांग को दर्शाता है। इसी तरह रोहतास ने ओपीडी मानक के साथ-साथ दवा उपलब्धता में भी 95 प्रतिशत का आंकड़ा दर्ज किया।

हालांकि इन आंकड़ों का वास्तविक असर लंबे समय तक तभी दिखाई देगा जब केंद्रों पर नियमित स्वास्थ्यकर्मी, पर्याप्त दवाएं, जांच की सुविधा और आवश्यक उपकरण लगातार उपलब्ध रहें। मरीजों की संख्या बढ़ना तभी स्वास्थ्य व्यवस्था की मजबूती का संकेत माना जा सकता है, जब उन्हें समय पर परामर्श, जांच और जरूरत के अनुसार उपचार भी मिल सके। इसलिए आयुष्मान आरोग्य मंदिरों की निगरानी, दवा आपूर्ति और सेवाओं की गुणवत्ता बनाए रखना आगे भी महत्वपूर्ण रहेगा।

राज्य स्वास्थ्य समिति की ओर से सामने आए अगस्त के आंकड़े यह बताते हैं कि बिहार में प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं को गांव के स्तर तक ले जाने की दिशा में बड़े पैमाने पर काम किया जा रहा है। 10,472 आयुष्मान आरोग्य मंदिरों का नेटवर्क, 44.71 लाख से अधिक ओपीडी परामर्श, दवाओं की उपलब्धता, स्थानीय स्तर पर जांच और योग-वेलनेस गतिविधियां इस मॉडल के प्रमुख हिस्से हैं। रोहतास और मुजफ्फरपुर जैसे जिलों के प्रदर्शन को दूसरे जिलों के लिए उदाहरण के तौर पर देखा जा रहा है।

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