पटना - बिहार में फुटवियर उद्योग के विकास की संभावनाएं तेजी से उभर रही हैं और इसे राज्य के आर्थिक विकास से जोड़कर देखा जा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस क्षेत्र को योजनाबद्ध तरीके से आगे बढ़ाया जाए और व्यावसायिक प्रशिक्षण को प्राथमिकता दी जाए, तो यह उद्योग बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन का माध्यम बन सकता है। पटना सहित राज्य के कई जिलों में पारंपरिक रूप से जूता-चप्पल बनाने का काम होता रहा है, लेकिन संसाधनों और तकनीकी ज्ञान की कमी के कारण यह अब तक सीमित स्तर पर ही विकसित हो पाया है।
फुटवियर उद्योग की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें कम पूंजी के साथ भी काम शुरू किया जा सकता है। चमड़ा, सिंथेटिक और रबर से बने उत्पादों की मांग बाजार में लगातार बनी रहती है, जिससे छोटे और मध्यम स्तर के उद्यमियों के लिए आगे बढ़ने के अवसर मौजूद हैं। यदि स्थानीय स्तर पर कच्चे माल की उपलब्धता, आधुनिक मशीनों और बेहतर डिजाइनिंग को बढ़ावा मिले, तो बिहार के फुटवियर उत्पाद अन्य राज्यों के साथ प्रतिस्पर्धा कर सकते हैं।
व्यावसायिक प्रशिक्षण इस पूरे तंत्र की रीढ़ साबित हो सकता है। प्रशिक्षित कारीगर और युवा न केवल उत्पादन की गुणवत्ता सुधार सकते हैं, बल्कि समय और लागत दोनों में संतुलन बनाकर बाजार की मांग के अनुरूप उत्पाद तैयार कर सकते हैं। इससे एक ओर निजी कंपनियों और फैक्ट्रियों में रोजगार के अवसर बढ़ेंगे, वहीं दूसरी ओर स्वरोजगार को भी नई दिशा मिलेगी। खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में इससे पलायन की समस्या को कम करने में मदद मिल सकती है।
फुटवियर उद्योग का विस्तार महिलाओं के लिए भी आर्थिक सशक्तिकरण का मजबूत जरिया बन सकता है। प्रशिक्षण केंद्रों और लघु इकाइयों के माध्यम से महिलाएं घर के आसपास ही काम कर सकती हैं, जिससे उनकी आय में बढ़ोतरी होगी। स्वयं सहायता समूहों के जरिये सामूहिक उत्पादन और विपणन को बढ़ावा देकर महिलाओं की भागीदारी को और मजबूत किया जा सकता है।
उद्योग विशेषज्ञों के अनुसार, यदि सरकार की ओर से प्रशिक्षण संस्थान, आसान ऋण, तकनीकी सहयोग और विपणन से जुड़ी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं, तो फुटवियर उद्योग राज्य की अर्थव्यवस्था में अहम योगदान दे सकता है। पटना जैसे शहरी केंद्रों में डिजाइन, पैकेजिंग और ब्रांडिंग की सुविधाएं विकसित कर बिहार में बने उत्पादों को राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाया जा सकता है।
कुल मिलाकर, फुटवियर उद्योग बिहार के लिए रोजगार, कौशल विकास और आर्थिक समृद्धि का एक मजबूत आधार बन सकता है। सही नीति, प्रभावी प्रशिक्षण और बाजार से जुड़ाव के साथ यह क्षेत्र न केवल युवाओं को आत्मनिर्भर बना सकता है, बल्कि राज्य की औद्योगिक पहचान को भी नई मजबूती दे सकता है।











