बिहार में पारंपरिक कुम्हारी कला को आधुनिक रूप देकर स्थानीय कारीगरों के हुनर को अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचाने की पहल की जा रही है। मुजफ्फरपुर में मिट्टी के साधारण बर्तनों पर मिथिला पेंटिंग और दुनिया की दूसरी प्रसिद्ध कला शैलियों को उकेरकर उन्हें आकर्षक उत्पादों में बदला जा रहा है। उद्यमी डॉ. ऋतुराज की पहल से कुम्हारों की पारंपरिक कला को नई पहचान मिल रही है। मिट्टी के घड़े, कलश, कुल्हड़, दीप, कटोरी, गिलास, हुक्का और धूपदानी जैसे उत्पाद अब केवल घरेलू इस्तेमाल तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इनकी मांग अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों तक पहुंच चुकी है। इस पहल से स्थानीय कारीगरों के लिए रोजगार के अवसर बढ़ाने और बिहार की लोककला को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने का प्रयास किया जा रहा है।
मुजफ्फरपुर में इस काम को आगे बढ़ाने के लिए डॉ. ऋतुराज की संस्था दी चाक एंड वीक सक्रिय है। संस्था का उद्देश्य पारंपरिक कुम्हारी कला को संरक्षित करने के साथ उसे आज के बाजार की जरूरतों के अनुसार विकसित करना है। इस पहल से जिले के 43 कुम्हार जुड़ चुके हैं, जबकि 20 लोगों को मिट्टी के बर्तनों पर चित्रकारी करने का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। प्रशिक्षण के माध्यम से कारीगरों को साधारण बर्तनों को कलात्मक रूप देने, डिजाइन तैयार करने और अपनी पारंपरिक कला को नए तरीके से प्रस्तुत करने का अवसर मिल रहा है। बच्चों, महिलाओं और वयस्कों को भी इस हुनर से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है, ताकि वे भविष्य में स्वरोजगार के जरिए अपनी आमदनी बढ़ा सकें।
इस पहल की खास बात यह है कि इसमें मिट्टी के बर्तनों पर केवल पारंपरिक डिजाइन ही नहीं बनाए जा रहे, बल्कि विभिन्न संस्कृतियों और कलात्मक शैलियों से प्रेरित चित्रों का भी इस्तेमाल किया जा रहा है। कारीगर बर्तनों पर लता-बेल, फूल-पत्तियां, पशु-पक्षी, शिकार के दृश्य और विभिन्न कथाओं से जुड़े चित्र उकेरते हैं। मिथिला और मधुबनी चित्रकला के साथ मथुरा, उज्बेकिस्तान, कजाकिस्तान, ईरान, ग्रीस, रोमन और गोथिक कला शैलियों से प्रेरित आकृतियों को भी शामिल किया जा रहा है। इससे बर्तनों का रूप पहले से अधिक आकर्षक बनता है और उनकी उपयोगिता के साथ सजावटी महत्व भी बढ़ता है।
मिथिला पेंटिंग बिहार की सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस कला में प्राकृतिक जीवन, धार्मिक मान्यताओं, लोककथाओं, पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों और सामाजिक परंपराओं से जुड़े चित्र बनाए जाते हैं। आमतौर पर यह चित्रकला कागज, कपड़े और दीवारों पर देखने को मिलती है, लेकिन जब इसे मिट्टी के बर्तनों पर उकेरा जाता है, तो पारंपरिक कला को एक नया माध्यम मिल जाता है। मिट्टी की प्राकृतिक बनावट और हाथ से बनाई गई चित्रकारी उत्पादों को अलग पहचान देती है। यही वजह है कि ऐसे उत्पाद उन लोगों को आकर्षित कर सकते हैं जो अपने घरों में पारंपरिक भारतीय हस्तशिल्प और सांस्कृतिक सजावट को जगह देना चाहते हैं।
मिट्टी के बर्तनों को कलात्मक उत्पादों में बदलने से कुम्हारों के सामने बाजार की नई संभावनाएं खुल रही हैं। पहले कई कारीगर मुख्य रूप से घड़े, दीये, कुल्हड़ और रोजमर्रा के इस्तेमाल के बर्तन बनाते थे। इन उत्पादों की बिक्री स्थानीय बाजार और त्योहारों के दौरान होने वाली मांग पर निर्भर रहती थी। अब इन्हीं बर्तनों पर चित्रकारी करके उन्हें सजावटी वस्तु, उपहार और पारंपरिक हस्तशिल्प के रूप में भी पेश किया जा रहा है। इस बदलाव से उत्पादों की पहचान बढ़ती है और ग्राहकों के सामने विकल्पों का दायरा भी विस्तृत होता है।
रिपोर्ट के अनुसार, मुशहरी, कांटी, रामबाग चौरी और मस्जिद चौक सहित आसपास के क्षेत्रों के परिवार इस पहल से जुड़े हुए हैं। कारीगर हर महीने करीब एक लाख से सवा लाख रुपये तक के तैयार उत्पादों का कारोबार कर रहे हैं। इस कारोबार से 25 से 30 प्रतिशत तक आमदनी होने की जानकारी दी गई है। हालांकि, यह आंकड़ा कारोबार और उससे होने वाली आमदनी के संदर्भ में है, इसलिए इसे हर कारीगर की व्यक्तिगत मासिक कमाई नहीं माना जाना चाहिए। वास्तविक आय उत्पादों की संख्या, डिजाइन, लागत, बिक्री और प्रत्येक कारीगर की भूमिका के आधार पर अलग-अलग हो सकती है।
इस पहल का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि स्थानीय उत्पादों को विदेशों तक पहुंचाने में लोगों के आपसी संपर्क मददगार बन रहे हैं। विदेश में रहने वाले मुजफ्फरपुर और आसपास के क्षेत्रों के लोगों के परिवार यहां तैयार उत्पाद खरीदकर अपने परिचितों और रिश्तेदारों तक भेजते हैं। इसी माध्यम से मिट्टी के बर्तनों पर बनी कलाकृतियां अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों तक पहुंची हैं। इससे बिहार के कारीगरों को अपने उत्पादों को बड़े बाजार में पेश करने का अवसर मिल रहा है। हालांकि, विदेशों में उत्पादों की नियमित मांग और बड़े स्तर पर निर्यात बढ़ाने के लिए व्यवस्थित विपणन, सुरक्षित पैकिंग और लगातार गुणवत्तापूर्ण उत्पादन की जरूरत होगी।
मिट्टी के बर्तन बनाने की परंपरा बिहार में लंबे समय से चली आ रही है। ग्रामीण इलाकों में कुम्हार परिवार पीढ़ी दर पीढ़ी इस हुनर को आगे बढ़ाते रहे हैं। चाक पर मिट्टी को आकार देना, उसे सुखाना, भट्ठी में पकाना और फिर जरूरत के अनुसार उसका इस्तेमाल करना इस पारंपरिक प्रक्रिया का हिस्सा है। लेकिन बदलती जीवनशैली और बाजार में प्लास्टिक, धातु तथा अन्य आधुनिक उत्पादों की उपलब्धता के कारण कई कारीगरों को अपने पारंपरिक कारोबार को बनाए रखने में चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। ऐसे में मिट्टी के बर्तनों को चित्रकारी और नए डिजाइन से जोड़ना उनकी कला को बाजार में अलग पहचान देने का माध्यम बन सकता है।
मिट्टी के बर्तनों पर चित्रकारी करने के लिए केवल पारंपरिक हुनर ही नहीं, बल्कि डिजाइन, रंगों के संयोजन और उत्पादों की मांग को समझना भी जरूरी है। प्रशिक्षण के जरिए कारीगरों को अपने काम में नई तकनीक और बेहतर प्रस्तुति अपनाने का अवसर मिलता है। अगर उन्हें बाजार की जरूरतों के अनुसार डिजाइन तैयार करने, उत्पादों की गुणवत्ता बनाए रखने और उचित कीमत तय करने में मदद मिले, तो उनकी प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है। इसके साथ ही ऑनलाइन बिक्री, हस्तशिल्प प्रदर्शनियों और सरकारी एम्पोरियम जैसे माध्यमों से भी स्थानीय उत्पादों को अधिक ग्राहकों तक पहुंचाया जा सकता है।
डॉ. ऋतुराज का मानना है कि कुम्हारी कला को संरक्षण देने के लिए प्रशिक्षण, औपचारिक शिक्षा और सरकारी सहायता की जरूरत है। उनका जोर इस बात पर है कि पारंपरिक कला को केवल पुरानी विरासत मानकर न छोड़ा जाए, बल्कि इसे आजीविका और कौशल विकास से भी जोड़ा जाए। यदि कुम्हारों को आधुनिक डिजाइन, बेहतर उपकरण, कच्चे माल और विपणन की सुविधा मिले, तो वे अपने उत्पादों को स्थानीय बाजार से आगे बढ़ाकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थापित कर सकते हैं।
गंडक नदी के किनारे के कारीगरों की विशिष्ट शैली में तैयार उत्पादों को भौगोलिक संकेतक यानी जीआई टैग दिलाने की जरूरत पर भी जोर दिया जा रहा है। जीआई टैग किसी खास क्षेत्र से जुड़े विशिष्ट उत्पाद की पहचान और उसकी भौगोलिक उत्पत्ति को मान्यता देने का माध्यम है। इससे उत्पाद की पहचान को संरक्षण देने और बाजार में उसकी अलग पहचान बनाने में मदद मिल सकती है। हालांकि, किसी उत्पाद को जीआई टैग मिलने के लिए निर्धारित मानकों और पंजीकरण प्रक्रिया को पूरा करना आवश्यक होता है। इस दिशा में पहल होने पर संबंधित कारीगरों को अपनी पारंपरिक शैली को व्यवस्थित रूप से सामने रखने का अवसर मिल सकता है।
कुम्हारों को प्रधानमंत्री विश्वकर्मा योजना जैसी सरकारी योजनाओं से जोड़ने की जरूरत भी बताई गई है। ऐसी योजनाओं के माध्यम से पात्र पारंपरिक कारीगरों को कौशल प्रशिक्षण, आधुनिक उपकरणों और कारोबार से संबंधित सहायता के अवसर मिल सकते हैं। इसके लिए पात्रता और योजना के निर्धारित नियमों के अनुसार आवेदन करना जरूरी होता है। सरकारी सहायता, प्रशिक्षण और बाजार तक बेहतर पहुंच मिलने से कारीगरों को अपना काम आगे बढ़ाने में मदद मिल सकती है। साथ ही स्थानीय स्तर पर युवाओं को इस पारंपरिक पेशे से जोड़ने का रास्ता भी खुल सकता है।
बिहार की पारंपरिक हस्तकला को बढ़ावा देने के लिए राज्य में अन्य प्रयास भी किए जा रहे हैं। मधुबनी जिले के जितवारपुर में मिथिला पेंटिंग को बढ़ावा देने के उद्देश्य से शिल्पग्राम परियोजना की आधारशिला फरवरी 2026 में रखी गई थी। इस तरह की पहल से कलाकारों को प्रशिक्षण, अपनी कला प्रदर्शित करने और सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने के अवसर मिल सकते हैं। मिट्टी के बर्तनों पर मिथिला चित्रकला का इस्तेमाल भी इसी व्यापक संभावना को दिखाता है कि बिहार की पारंपरिक कलाओं को नए उत्पादों और बाजारों से जोड़कर आगे बढ़ाया जा सकता है।
मुजफ्फरपुर में मिट्टी के बर्तनों को कलात्मक स्वरूप देने की पहल स्थानीय कारीगरों के लिए नई संभावनाएं लेकर आई है। 43 कुम्हारों का जुड़ना और 20 लोगों का चित्रकारी का प्रशिक्षण लेना इस काम के विस्तार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस और ऑस्ट्रेलिया तक उत्पादों की पहुंच से बिहार की लोककला को व्यापक पहचान मिल रही है। यदि कारीगरों को नियमित बाजार, प्रशिक्षण, तकनीकी सहायता और उचित मूल्य मिलता है, तो यह पहल पारंपरिक कुम्हारी कला को संरक्षित करने के साथ स्थानीय परिवारों की आजीविका मजबूत करने में भी मदद कर सकती है।








