भाजपा संसदीय बोर्ड में बड़े बदलाव की तैयारी, येदियुरप्पा-जटिया समेत आधे सदस्य बदलने की चर्चा

भाजपा संसदीय बोर्ड में अक्टूबर में बदलाव की संभावना है। 12 सदस्यीय बोर्ड में आधे सदस्य बदलने, येदियुरप्पा-जटिया को हटाने और नए चेहरों को जगह देने की चर्चा है।

भाजपा संसदीय बोर्ड के पुनर्गठन की तैयारी शुरू हो गई है। सूत्रों के मुताबिक, 12 सदस्यीय बोर्ड में आधे सदस्यों को बदला जा सकता है। बीएस येदियुरप्पा और डॉ. सत्यनारायण जटिया की जगह नए चेहरों को शामिल किए जाने की चर्चा है।

नई दिल्ली: भारतीय जनता पार्टी (BJP) में संगठनात्मक नियुक्तियों के बाद अब पार्टी की प्रमुख निर्णय लेने वाली संस्थाओं के पुनर्गठन की प्रक्रिया शुरू हो गई है। राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन संसदीय बोर्ड के गठन को लेकर प्रारंभिक कवायद कर रहे हैं। सूत्रों के मुताबिक, 12 सदस्यीय संसदीय बोर्ड में करीब आधे सदस्यों को बदला जा सकता है। इसकी घोषणा पितृ पक्ष के बाद अक्टूबर में होने की संभावना बताई जा रही है।

संसदीय बोर्ड में किन नेताओं पर नजर?

सूत्रों के मुताबिक, बीएस येदियुरप्पा और डॉ. सत्यनारायण जटिया को संसदीय बोर्ड से हटाया जा सकता है। दोनों नेताओं की उम्र 80 वर्ष से अधिक है। संभावित बदलाव के पीछे उम्र को एक प्रमुख आधार बताया जा रहा है।

पार्टी के भीतर चर्चा है कि यदि इन नेताओं को बोर्ड से हटाया जाता है तो उनकी जगह ऐसे नेताओं को शामिल किया जा सकता है, जो जाति, वर्ग और क्षेत्रीय समीकरणों में फिट बैठते हों। हालांकि, नए सदस्यों के नामों को लेकर अभी अंतिम निर्णय की आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है।

भाजपा में पार्टी पदाधिकारियों, राज्य प्रभारियों और संगठन मंत्रियों की नियुक्ति के बाद अब संसदीय बोर्ड, केंद्रीय चुनाव समिति और राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्यों के नाम घोषित किए जाने हैं।

एक महामंत्री को संसदीय बोर्ड में मिल सकती है जगह

संसदीय बोर्ड के संभावित पुनर्गठन में पार्टी के एक महामंत्री को भी जगह दिए जाने पर विचार किया जा सकता है। चर्चा के मुताबिक, विनोद तावड़े और सुनील बंसल जैसे वरिष्ठ महामंत्रियों में से किसी एक को बोर्ड में शामिल किया जा सकता है। हालांकि, किसी अन्य महामंत्री के नाम पर भी विचार संभव है।

भाजपा के संगठनात्मक ढांचे में महामंत्रियों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। ऐसे में किसी वरिष्ठ महामंत्री को संसदीय बोर्ड में शामिल करने से संगठन और पार्टी की सर्वोच्च निर्णय प्रक्रिया के बीच समन्वय मजबूत करने का प्रयास माना जा सकता है।

लंबे समय बाद मुख्यमंत्री को मिल सकती है जगह

संभावित बदलाव में मुख्यमंत्री को भी भाजपा के संसदीय बोर्ड में स्थान दिए जाने की चर्चा है। वर्तमान में भाजपा 21 राज्यों में सत्ता में है। पार्टी के इतिहास में नरेंद्र मोदी और शिवराज सिंह चौहान मुख्यमंत्री रहते अलग-अलग समय पर संसदीय बोर्ड के सदस्य रह चुके हैं।

यदि किसी मौजूदा मुख्यमंत्री को बोर्ड में शामिल किया जाता है, तो यह पार्टी के वर्तमान राज्यों में शासन और केंद्रीय संगठन के बीच प्रतिनिधित्व का महत्वपूर्ण पहलू होगा। इसके अलावा, पहले संसदीय बोर्ड के सदस्य रह चुके किसी नेता और एक महिला नेत्री को भी बोर्ड में शामिल किए जाने की संभावना बताई जा रही है।

हालांकि, संभावित नामों को लेकर भाजपा की ओर से अंतिम सूची सार्वजनिक नहीं की गई है। इसलिए इन बदलावों को फिलहाल संगठन के भीतर चल रही कवायद और सूत्रों से मिली जानकारी के तौर पर देखा जाना चाहिए।

भाजपा का संसदीय बोर्ड क्या है?

भाजपा का संसदीय बोर्ड पार्टी की सबसे महत्वपूर्ण निर्णय लेने वाली संस्थाओं में से एक है। भाजपा के संविधान के मुताबिक, यह संसदीय दल और विधायक दल की गतिविधियों की निगरानी करता है तथा संगठन के कामकाज को दिशा देने में भूमिका निभाता है।

बोर्ड में पार्टी के शीर्ष स्तर के नेता शामिल होते हैं और कई महत्वपूर्ण राजनीतिक तथा संगठनात्मक मामलों पर इसकी भूमिका रहती है। इसके फैसले पार्टी के चुनावी और संगठनात्मक कामकाज पर प्रभाव डाल सकते हैं।

मुख्यमंत्री के चेहरे पर फैसला

विधानसभा चुनाव से पहले किसी राज्य में मुख्यमंत्री पद के चेहरे को लेकर पार्टी का फैसला संसदीय बोर्ड की प्रक्रिया का हिस्सा हो सकता है। चुनाव के बाद मुख्यमंत्री के चयन में भी बोर्ड की भूमिका रहती है।

इसका मतलब है कि किसी राज्य में नेतृत्व को लेकर होने वाले महत्वपूर्ण निर्णयों में संसदीय बोर्ड की राय महत्वपूर्ण हो सकती है। अलग-अलग चुनावी परिस्थितियों और राज्यों के राजनीतिक समीकरणों के आधार पर पार्टी नेतृत्व इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाता है।

प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री पद के लिए नाम की सिफारिश

भाजपा के संविधान के तहत प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री जैसे महत्वपूर्ण पदों के लिए नाम की सिफारिश करने का अधिकार संसदीय बोर्ड के पास है।

यह प्रावधान बोर्ड को पार्टी के शीर्ष राजनीतिक नेतृत्व के चयन की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका देता है। केंद्र और राज्यों में सरकार गठन से जुड़े नेतृत्व संबंधी निर्णयों में भी बोर्ड की भूमिका इसी वजह से महत्वपूर्ण मानी जाती है।

लोकसभा और विधानसभा उम्मीदवारों के चयन में भूमिका

भाजपा संसदीय बोर्ड के सभी सदस्य केंद्रीय चुनाव समिति के भी सदस्य होते हैं। केंद्रीय चुनाव समिति लोकसभा और विधानसभा चुनावों के लिए पार्टी के उम्मीदवारों के अंतिम चयन में भूमिका निभाती है।

उम्मीदवार चयन पार्टी की चुनावी रणनीति का अहम हिस्सा होता है। ऐसे में संसदीय बोर्ड के सदस्यों की केंद्रीय चुनाव समिति में मौजूदगी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व और उम्मीदवार चयन प्रक्रिया के बीच सीधा संबंध बनाती है।

बहुमत मिलने पर सरकार गठन में मार्गदर्शन

चुनाव में भाजपा को बहुमत मिलने की स्थिति में सरकार गठन से जुड़े मामलों में भी संसदीय बोर्ड मार्गदर्शन देता है। इसमें नेतृत्व चयन और सरकार गठन की व्यापक प्रक्रिया शामिल हो सकती है।

इस भूमिका के कारण संसदीय बोर्ड का महत्व केवल चुनाव से पहले उम्मीदवारों या मुख्यमंत्री के चेहरे तक सीमित नहीं रहता, बल्कि चुनाव परिणाम के बाद सरकार गठन तक बना रहता है।

पार्टी की नीतियों पर निर्णय

भाजपा के संविधान के मुताबिक, ऐसी नीति या नीति में बदलाव, जिसे पार्टी ने पहले औपचारिक रूप से स्वीकार नहीं किया है, उस पर संसदीय बोर्ड चर्चा और निर्णय कर सकता है।

इससे बोर्ड को पार्टी की राजनीतिक दिशा से जुड़े महत्वपूर्ण मामलों में विचार-विमर्श और निर्णय लेने का अधिकार मिलता है। हालांकि, नीति संबंधी प्रत्येक मामले की प्रक्रिया उसके स्वरूप और पार्टी के संगठनात्मक नियमों पर निर्भर करती है।

संगठनात्मक इकाइयों पर निगरानी

राष्ट्रीय कार्यकारिणी के नीचे आने वाली पार्टी की संगठनात्मक इकाइयों को भी संसदीय बोर्ड दिशा-निर्देश दे सकता है। इसका उद्देश्य संगठन के विभिन्न स्तरों के बीच समन्वय बनाए रखना और पार्टी के निर्धारित कार्यक्रमों तथा नीतियों के अनुरूप कामकाज सुनिश्चित करना है।

भाजपा के व्यापक संगठनात्मक ढांचे में राष्ट्रीय नेतृत्व, राज्य इकाइयों और अन्य संगठनात्मक स्तरों के बीच समन्वय के लिए ऐसे दिशा-निर्देश महत्वपूर्ण माने जाते हैं।

अनुशासन से जुड़े मामलों में कार्रवाई

पार्टी के सांसदों, विधायकों या राज्य संगठन के पदाधिकारियों से जुड़े अनुशासन उल्लंघन के मामलों में भी संसदीय बोर्ड की भूमिका हो सकती है। जरूरत पड़ने पर बोर्ड ऐसे मामलों में कार्रवाई के संबंध में निर्णय ले सकता है।

यह अधिकार पार्टी के निर्वाचित प्रतिनिधियों और संगठनात्मक पदाधिकारियों के आचरण से जुड़े मामलों में शीर्ष संगठनात्मक निगरानी का हिस्सा है।

राजनीतिक गठबंधनों पर भी भूमिका

मौजूदा रिपोर्टों के अनुसार, भाजपा संसदीय बोर्ड को राजनीतिक गठबंधनों जैसे बड़े राजनीतिक फैसलों पर निर्णय लेने का अधिकार भी है। गठबंधन से जुड़े फैसले राष्ट्रीय और राज्य स्तर की राजनीति पर असर डाल सकते हैं, इसलिए ऐसे मामलों में पार्टी की शीर्ष निर्णय प्रक्रिया की भूमिका महत्वपूर्ण होती है।

अक्टूबर में हो सकती है घोषणा

भाजपा में हालिया संगठनात्मक नियुक्तियों के बाद अब संसदीय बोर्ड, केंद्रीय चुनाव समिति और राष्ट्रीय कार्यकारिणी के पुनर्गठन पर नजर है। सूत्रों के मुताबिक, संसदीय बोर्ड की घोषणा पितृ पक्ष के बाद अक्टूबर में की जा सकती है।

12 सदस्यीय बोर्ड में करीब आधे सदस्यों के संभावित बदलाव, वरिष्ठ नेताओं के स्थान पर नए चेहरों की संभावित एंट्री, एक महामंत्री और महिला नेता को जगह देने की चर्चा तथा मुख्यमंत्री को बोर्ड में शामिल किए जाने की संभावना ने इस पुनर्गठन को महत्वपूर्ण बना दिया है। हालांकि, अंतिम नामों और संरचना पर भाजपा की आधिकारिक घोषणा का इंतजार है।

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