दतिया उपचुनाव में भाजपा द्वारा नरोत्तम मिश्रा का टिकट काटे जाने के बाद पार्टी के भीतर असंतोष बढ़ गया है। समर्थकों के विरोध के बीच भाजपा डैमेज कंट्रोल में जुटी है, जबकि कांग्रेस ने घनश्याम सिंह को उम्मीदवार बनाकर चुनावी मुकाबला तेज कर दिया।
दतिया: मध्य प्रदेश की दतिया विधानसभा सीट पर होने वाला उपचुनाव भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के लिए राजनीतिक चुनौती बनता दिखाई दे रहा है। पार्टी ने वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री नरोत्तम मिश्रा की जगह आशुतोष तिवारी को उम्मीदवार घोषित किया है। इस फैसले के बाद दतिया में पार्टी कार्यकर्ताओं और मिश्रा समर्थकों के बीच नाराजगी खुलकर सामने आई। वहीं भाजपा नेतृत्व लगातार यह संदेश देने की कोशिश कर रहा है कि संगठन पूरी तरह एकजुट है और चुनाव पार्टी के सामूहिक नेतृत्व में लड़ा जाएगा।
इधर कांग्रेस ने भी इस सीट से घनश्याम सिंह को उम्मीदवार बनाकर मुकाबले को रोचक बना दिया है। ऐसे में दतिया उपचुनाव अब केवल एक विधानसभा सीट का चुनाव नहीं, बल्कि दोनों प्रमुख दलों की राजनीतिक रणनीति और संगठनात्मक मजबूती की परीक्षा बन गया है।
टिकट बदलने के फैसले के बाद बढ़ा विरोध
भाजपा द्वारा उम्मीदवार बदलने की घोषणा के बाद दतिया में नरोत्तम मिश्रा के समर्थकों ने विरोध प्रदर्शन किया। स्थानीय स्तर पर कई कार्यकर्ताओं ने पार्टी नेतृत्व के फैसले पर नाराजगी जताई। कुछ पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं ने इस्तीफे की भी घोषणा की तथा आरोप लगाया कि मिश्रा जैसे अनुभवी नेता की अनदेखी की गई है। समर्थकों का कहना है कि यदि नरोत्तम मिश्रा को टिकट दिया जाता तो भाजपा को इस सीट पर मजबूत बढ़त मिल सकती थी। हालांकि पार्टी नेतृत्व ने अब तक अपने फैसले में किसी बदलाव का संकेत नहीं दिया है।
कांग्रेस ने घनश्याम सिंह पर लगाया दांव
भाजपा में जारी अंदरूनी असंतोष के बीच कांग्रेस ने दतिया उपचुनाव के लिए घनश्याम सिंह को अपना उम्मीदवार घोषित किया है। कांग्रेस को उम्मीद है कि भाजपा के भीतर पैदा हुए मतभेदों का उसे चुनावी लाभ मिल सकता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि भाजपा समय रहते संगठनात्मक असंतोष को नियंत्रित नहीं करती, तो चुनावी मुकाबला अपेक्षा से अधिक कठिन हो सकता है।
नरोत्तम मिश्रा का राजनीतिक प्रभाव
नरोत्तम मिश्रा मध्य प्रदेश भाजपा के वरिष्ठ नेताओं में गिने जाते हैं। वे दतिया से तीन बार विधायक रह चुके हैं और राज्य सरकार में गृह मंत्री, संसदीय कार्य मंत्री तथा कानून मंत्री जैसे महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं। हालांकि वर्ष 2023 के विधानसभा चुनाव में उन्हें कांग्रेस उम्मीदवार से हार का सामना करना पड़ा था, लेकिन दतिया क्षेत्र में उनकी राजनीतिक पकड़ अब भी मजबूत मानी जाती है। यही कारण है कि टिकट कटने के बाद उनके समर्थकों की प्रतिक्रिया राजनीतिक चर्चा का विषय बन गई।
भाजपा ने आशुतोष तिवारी पर क्यों जताया भरोसा
भाजपा ने इस बार दतिया उपचुनाव में नए चेहरे के रूप में आशुतोष तिवारी को मैदान में उतारा है। पार्टी का मानना है कि संगठनात्मक रणनीति और स्थानीय समीकरणों को ध्यान में रखते हुए यह फैसला लिया गया है। भाजपा नेतृत्व लगातार यह स्पष्ट कर रहा है कि चुनाव किसी एक व्यक्ति का नहीं बल्कि पूरे संगठन का होता है और सभी कार्यकर्ताओं को अधिकृत उम्मीदवार के समर्थन में काम करना चाहिए।
कैलाश विजयवर्गीय ने दिया भरोसे का संदेश
मध्य प्रदेश सरकार में मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने कहा कि पार्टी में उम्मीदवार घोषित होने के बाद सभी कार्यकर्ता एकजुट होकर चुनाव लड़ते हैं। उन्होंने विश्वास जताया कि दतिया में पैदा हुआ विवाद जल्द समाप्त हो जाएगा और भाजपा पूरी ताकत के साथ चुनाव मैदान में उतरेगी। हालांकि राजनीतिक चर्चाओं में यह भी सवाल उठ रहा है कि अन्य राज्यों में उम्मीदवार बदलने के उदाहरण सामने आने के बाद दतिया में ऐसा क्यों नहीं किया जा सकता।
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नरोत्तम मिश्रा की प्रतिक्रिया
विवाद के बीच नरोत्तम मिश्रा ने कहा कि उन्हें घटनाक्रम की जानकारी मीडिया और सोशल मीडिया के माध्यम से मिली। उन्होंने यह भी कहा कि जब वे दतिया पहुंचेंगे तो अपने समर्थकों से बातचीत करेंगे।
मिश्रा ने सार्वजनिक रूप से पार्टी के खिलाफ कोई बयान नहीं दिया और कहा कि वे संगठन के अनुशासित कार्यकर्ता हैं तथा पार्टी नेतृत्व जो निर्णय करेगा, उसका सम्मान करेंगे।
भाजपा ने डैमेज कंट्रोल शुरू किया
दतिया में बढ़ते असंतोष को देखते हुए भाजपा प्रदेश नेतृत्व सक्रिय हो गया है। पार्टी अध्यक्ष ने स्पष्ट किया कि नरोत्तम मिश्रा भाजपा के वरिष्ठ और सम्मानित नेता हैं तथा उनका अनुभव पार्टी के लिए महत्वपूर्ण है। प्रदेश नेतृत्व ने कहा कि दतिया का उपचुनाव नरोत्तम मिश्रा के मार्गदर्शन में ही लड़ा जाएगा और संगठन पूरी तरह एकजुट होकर जीत सुनिश्चित करने का प्रयास करेगा।
उपचुनाव क्यों बना प्रतिष्ठा का सवाल
दतिया सीट का उपचुनाव केवल स्थानीय राजनीति तक सीमित नहीं है। इसे राज्य की सत्तारूढ़ भाजपा के संगठनात्मक अनुशासन और नेतृत्व क्षमता की परीक्षा के रूप में भी देखा जा रहा है। यदि भाजपा अपने कार्यकर्ताओं और वरिष्ठ नेताओं के बीच तालमेल बनाए रखने में सफल रहती है, तो चुनावी नुकसान की संभावना कम हो सकती है। वहीं विपक्ष इस असंतोष को अपने पक्ष में भुनाने की कोशिश करेगा।
आगे क्या होगा
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या भाजपा नरोत्तम मिश्रा के समर्थकों को पूरी तरह अपने साथ जोड़ पाएगी। आने वाले दिनों में पार्टी नेतृत्व और मिश्रा के बीच होने वाली बातचीत चुनावी रणनीति तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। दूसरी ओर कांग्रेस इस मौके का लाभ उठाने की कोशिश करेगी। ऐसे में दतिया उपचुनाव मध्य प्रदेश की राजनीति का सबसे चर्चित मुकाबला बनता जा रहा है।










