ममता बनर्जी पर दिलीप घोष का तीखा हमला, बोले- ‘खेला होबे’ का नारा देने वालों के साथ ही हो गया खेला

सिलीगुड़ी में भाजपा नेता दिलीप घोष ने ममता बनर्जी और कांग्रेस पर तीखा हमला बोला। उन्होंने ‘खेला होबे’ नारे और कांग्रेस के उम्मीदवार चयन पर सवाल उठाए।
ममता बनर्जी पर दिलीप घोष का तीखा हमला, बोले- ‘खेला होबे’ का नारा देने वालों के साथ ही हो गया खेला
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पश्चिम बंगाल में आगामी उपचुनावों को लेकर राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। इसी बीच भारतीय जनता पार्टी के नेता और राज्य के मंत्री दिलीप घोष ने सिलीगुड़ी में तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी और कांग्रेस पर तीखा हमला बोला। उन्होंने ममता बनर्जी के पुराने राजनीतिक नारे ‘खेला होबे’ का जिक्र करते हुए कहा कि जिस नारे का इस्तेमाल तृणमूल कांग्रेस लंबे समय तक राजनीतिक संदेश के तौर पर करती रही, अब उसी के संदर्भ में ममता बनर्जी की मौजूदा राजनीतिक स्थिति पर सवाल उठ रहे हैं। घोष ने कांग्रेस को लेकर भी बेहद तीखी टिप्पणी की और पार्टी पर गंभीर आपराधिक आरोपों वाले लोगों को उम्मीदवार बनाने का आरोप लगाया। उनके ये बयान 22 सितंबर को सिलीगुड़ी रेगुलेटेड मार्केट के दौरे के दौरान सामने आए।

दिलीप घोष ने ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस की मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों को लेकर कहा कि ममता बनर्जी जिस ‘खेला होबे’ की बात करती थीं, अब उनके साथ ही ‘खेला’ हो गया है। उन्होंने तृणमूल कांग्रेस के संगठन और चुनावी गतिविधियों को लेकर कई दावे किए। घोष के मुताबिक, पार्टी के कार्यालय और बैंक खातों से जुड़े विवाद तथा चुनाव में उम्मीदवार उतारने की स्थिति ने तृणमूल के सामने चुनौती खड़ी की है। हालांकि, ये घोष के राजनीतिक दावे हैं और इनके सभी पहलुओं की स्वतंत्र पुष्टि उनके बयान से अलग स्रोतों से जरूरी है।

भाजपा नेता ने इसी दौरान कांग्रेस को भी निशाने पर लिया। उन्होंने कांग्रेस पर आरोप लगाया कि पार्टी के पास चुनाव मैदान में उतारने के लिए ऐसे उम्मीदवार हैं जिन पर आपराधिक मामलों से जुड़े आरोप या मामले रहे हैं। घोष ने बेहद कड़े शब्दों में कांग्रेस की उम्मीदवार चयन प्रक्रिया पर सवाल उठाया। उनके बयान में इस्तेमाल किए गए ‘चोर-डकैत’ जैसे शब्द उनके राजनीतिक आरोप और टिप्पणी का हिस्सा हैं, जिन्हें तथ्यात्मक रूप से किसी व्यक्ति या दल पर लागू निष्कर्ष के तौर पर नहीं देखा जा सकता।

दिलीप घोष का यह बयान ऐसे समय आया है जब पश्चिम बंगाल की कुछ विधानसभा सीटों पर उपचुनाव को लेकर राजनीतिक गतिविधियां तेज हैं। जागरण की रिपोर्ट के मुताबिक, नंदीग्राम और रेजीनगर जैसी सीटों को लेकर राज्य में राजनीतिक दलों के बीच बयानबाजी बढ़ी हुई है। नंदीग्राम उपचुनाव को लेकर कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के बीच भी राजनीतिक समीकरण चर्चा में हैं।

घोष ने नंदीग्राम उपचुनाव के संदर्भ में कांग्रेस उम्मीदवार मिलन प्रधान से जुड़े एक पुराने आपराधिक मामले में गिरफ्तारी का भी उल्लेख किया। उन्होंने विपक्ष की ओर से लगाए जा रहे राजनीतिक प्रतिशोध के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि आपराधिक गतिविधियों और कानून तोड़ने वालों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। यहां भी घोष का बयान एक राजनीतिक पक्ष का आरोप और उसका स्पष्टीकरण है; किसी व्यक्ति की आपराधिक जिम्मेदारी का निर्धारण संबंधित जांच और न्यायिक प्रक्रिया से ही होता है।

भाजपा नेता ने ममता बनर्जी की सरकार के पिछले कार्यकाल से जुड़े मुद्दों को भी अपने बयान में उठाया। उन्होंने आरोप लगाया कि पूर्ववर्ती तृणमूल सरकार के दौरान अपराधियों और अन्य आरोपित लोगों को संरक्षण मिला। उन्होंने आरजी कर मामले का भी उल्लेख करते हुए कहा कि जिन मामलों में पहले उचित कार्रवाई नहीं हुई, उनकी जांच कराई जा रही है। इन आरोपों पर संबंधित राजनीतिक पक्षों की प्रतिक्रिया अलग हो सकती है, इसलिए इन्हें दिलीप घोष के राजनीतिक दावे के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

सिलीगुड़ी में अपने दौरे के दौरान दिलीप घोष ने तृणमूल कांग्रेस की संगठनात्मक स्थिति पर भी सवाल उठाए। उन्होंने दावा किया कि पार्टी के सामने संगठन और चुनावी तैयारी से जुड़ी समस्याएं हैं। इससे पहले 19 सितंबर को जलपाईगुड़ी दौरे के दौरान भी घोष ने तृणमूल कांग्रेस पर इसी तरह का राजनीतिक हमला किया था। उस समय उन्होंने पार्टी के कार्यालय और बैंक खाते को लेकर टिप्पणी की थी तथा पिछली सरकार के पंचायत कार्यों में कथित भ्रष्टाचार की जांच की बात कही थी।

हालांकि, तृणमूल कांग्रेस की मौजूदा स्थिति को समझने के लिए केवल भाजपा नेता के बयान को आधार बनाना पर्याप्त नहीं होगा। पार्टी के भीतर चल रहे विवाद, संगठनात्मक स्थिति, चुनावी तैयारियों और चुनाव चिह्न से जुड़े मामलों के संबंध में अलग-अलग पक्षों के बयान और आधिकारिक रिकॉर्ड भी महत्वपूर्ण हैं। राजनीतिक दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप चुनावी माहौल का हिस्सा होते हैं और उनके दावों की स्वतंत्र पुष्टि अलग-अलग स्तर पर की जानी जरूरी है।

दिलीप घोष के बयान में ममता बनर्जी के पुराने राजनीतिक नारे ‘खेला होबे’ को विशेष रूप से निशाना बनाया गया। यह नारा 2021 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के दौरान तृणमूल कांग्रेस के प्रमुख राजनीतिक नारों में शामिल रहा था। अब घोष ने उसी नारे का इस्तेमाल मौजूदा राजनीतिक घटनाक्रम पर कटाक्ष करने के लिए किया। उनका कहना था कि जिस राजनीतिक संघर्ष की बात तृणमूल कांग्रेस करती थी, परिस्थितियां बदलने के बाद वही राजनीतिक चुनौती अब उसके सामने है।

ममता बनर्जी और कांग्रेस के रिश्तों का राजनीतिक संदर्भ भी इस पूरे घटनाक्रम में महत्वपूर्ण है। ममता बनर्जी ने 1998 में कांग्रेस से अलग होकर तृणमूल कांग्रेस की स्थापना की थी। इसके बाद पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस धीरे-धीरे कांग्रेस की प्रमुख राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी बन गई। 2011 में तृणमूल कांग्रेस ने वाम मोर्चे के लंबे शासन को समाप्त कर राज्य में सरकार बनाई। बाद के वर्षों में कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के बीच राज्य की राजनीति में कई मुद्दों पर मतभेद बने रहे।

मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में हालांकि दोनों दलों के बीच कुछ मुद्दों पर नजदीकी दिखाई देने का दावा किया जा रहा है। नंदीग्राम उपचुनाव को लेकर कांग्रेस उम्मीदवार को ममता बनर्जी के समर्थन की चर्चा भी इसी संदर्भ में सामने आई है। इससे पश्चिम बंगाल की राजनीति में पुराने राजनीतिक समीकरणों और मौजूदा परिस्थितियों के बीच बदलाव को लेकर बहस तेज हुई है।

नंदीग्राम ममता बनर्जी की राजनीति में लंबे समय से महत्वपूर्ण स्थान रखता है। 2007 के भूमि अधिग्रहण विरोधी आंदोलन के बाद नंदीग्राम तृणमूल कांग्रेस की राजनीति का एक महत्वपूर्ण केंद्र बना। 2011 में वाम मोर्चे के 34 साल लंबे शासन को समाप्त करने के बाद ममता बनर्जी मुख्यमंत्री बनीं। 2021 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने नंदीग्राम से चुनाव लड़ा था, जहां उनका मुकाबला भाजपा के सुवेंदु अधिकारी से हुआ और उन्हें हार का सामना करना पड़ा, हालांकि तृणमूल कांग्रेस ने राज्य में सरकार बनाई।

अब 2026 के राजनीतिक घटनाक्रम में नंदीग्राम एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। विधानसभा उपचुनाव को लेकर कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस से जुड़े घटनाक्रम ने इस सीट को फिर राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बना दिया है। इसी वजह से भाजपा नेताओं की ओर से ममता बनर्जी और कांग्रेस पर हमले भी चुनावी संदर्भ में देखे जा रहे हैं।

दिलीप घोष ने अपने बयान में यह भी कहा कि जनता विपक्षी दलों के गठजोड़ को लेकर अपना निर्णय करेगी। उन्होंने आगामी उपचुनावों में भाजपा के प्रदर्शन को लेकर जीत का दावा भी किया। राजनीतिक दलों के ऐसे दावे चुनावी अभियान का हिस्सा होते हैं और इन्हें भविष्य के चुनाव परिणाम का स्वतंत्र पूर्वानुमान नहीं माना जा सकता।

घोष के बयान के बाद पश्चिम बंगाल की सियासत में आने वाले दिनों में राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप और बढ़ने की संभावना है। उपचुनावों को लेकर भाजपा, तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस सभी अपने-अपने मुद्दों के साथ मैदान में हैं। ऐसे में नेताओं के बयानों का इस्तेमाल अपने-अपने राजनीतिक संदेश को मजबूत करने के लिए किया जा रहा है।

सिलीगुड़ी में दिया गया दिलीप घोष का बयान भी इसी व्यापक चुनावी माहौल का हिस्सा है। उन्होंने एक तरफ ममता बनर्जी की राजनीतिक स्थिति पर सवाल उठाया और दूसरी तरफ कांग्रेस की उम्मीदवार चयन प्रक्रिया तथा आपराधिक मामलों को लेकर हमला किया। वहीं, इन आरोपों और दावों का अंतिम आकलन संबंधित आधिकारिक रिकॉर्ड, जांच और न्यायिक प्रक्रियाओं के आधार पर ही किया जा सकता है।

फिलहाल इतना स्पष्ट है कि पश्चिम बंगाल में उपचुनावों से पहले राजनीतिक बयानबाजी तेज हो चुकी है और भाजपा नेता दिलीप घोष ने ममता बनर्जी तथा कांग्रेस को निशाने पर लेकर अपनी पार्टी का राजनीतिक पक्ष सामने रखा है। उनके बयान में इस्तेमाल किए गए तीखे शब्दों ने राज्य के राजनीतिक माहौल को और गरमा दिया है। आने वाले दिनों में तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस की ओर से इस बयान पर प्रतिक्रिया सामने आती है या नहीं, इस पर भी राजनीतिक नजरें रहेंगी।

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