झारखंड में दोगुना हुआ खाद्यान्न उत्पादन, दूध और मछली पालन से किसानों की बढ़ रही कमाई

झारखंड में खाद्यान्न उत्पादन 74 लाख टन पहुंचा। मछली उत्पादन में 95% से अधिक आत्मनिर्भरता का दावा है। दूध, अंडा और पशुपालन से किसानों की कमाई बढ़ाने पर जोर है।

झारखंड में खेती और पशुपालन की तस्वीर बदल रही है। राज्य का खाद्यान्न उत्पादन 35 लाख टन से बढ़कर करीब 74 लाख टन पहुंच गया है। मछली उत्पादन में 95 प्रतिशत से अधिक आत्मनिर्भरता का दावा है। डेयरी और मुर्गीपालन से भी रोजगार के अवसर बढ़ रहे हैं।

रांची: कभी अनाज, दूध और मछली की जरूरतें पूरी करने के लिए दूसरे राज्यों पर निर्भर रहने वाला झारखंड अब अपना उत्पादन बढ़ाने पर जोर दे रहा है। बीते वर्षों में धान की खेती का क्षेत्रफल बढ़ा है, जबकि मछली और दूध के उत्पादन में भी सुधार हुआ है। सरकार किसानों को आधुनिक तकनीक, बेहतर बीज और सिंचाई सुविधाओं से जोड़ रही है। ग्रामीण महिलाओं के लिए भी नई योजनाएं तैयार की जा रही हैं।

झारखंड में दोगुना हुआ अनाज उत्पादन, धान की खेती का रकबा भी बढ़ा

झारखंड बनने के समय राज्य के सामने खेती से जुड़ी कई परेशानियां थीं। सिंचाई की सुविधाएं सीमित थीं और बड़ी संख्या में किसान बारिश के भरोसे खेती करते थे। अब खेती के तरीकों में बदलाव आया है और उत्पादन बढ़ाने के लिए सरकारी योजनाओं का सहारा लिया जा रहा है।

झारखंड में दोगुना हुआ खाद्यान्न उत्पादन, दूध और मछली पालन से किसानों की बढ़ रही कमाई

राज्य के कृषि विभाग से जुड़े आंकड़ों के अनुसार, फसल उत्पादन करीब 35 लाख टन से बढ़कर 74 लाख टन तक पहुंच गया है। धान की खेती का क्षेत्रफल भी बढ़ा है। साल 2000 में लगभग 10 लाख हेक्टेयर में धान बोया जाता था, जबकि अब यह क्षेत्रफल करीब 18 लाख हेक्टेयर बताया गया है।

दलहन की खेती में भी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। पहले लगभग एक लाख हेक्टेयर में दलहन की फसल होती थी, जो अब बढ़कर आठ लाख हेक्टेयर तक पहुंच गई है।

किसानों को प्रमाणित बीज खरीदने के लिए 50 से 100 प्रतिशत तक अनुदान दिया जा रहा है। बीज वितरण में पारदर्शिता लाने के लिए ब्लॉकचेन तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है। खेती में पानी की बचत के लिए ड्रिप सिंचाई, मल्चिंग और सौर ऊर्जा से चलने वाले पंपों को भी बढ़ावा मिल रहा है।

सरकार की कोशिश है कि धान की कटाई के बाद खेत खाली न रहें। किसान रबी की फसलें भी उगाएं, ताकि एक ही जमीन से साल में अधिक उत्पादन लिया जा सके।

मेधा डेयरी से जुड़े 66 हजार किसान, मछली उत्पादन में भी बड़ी बढ़त

झारखंड में दूध उत्पादन और डेयरी कारोबार में भी बदलाव देखने को मिला है। पहले राज्य में अपना बड़ा सहकारी डेयरी ब्रांड नहीं था। अब मेधा डेयरी के जरिए बड़ी संख्या में पशुपालक दूध की बिक्री कर रहे हैं।

मेधा की शुरुआत में प्रतिदिन करीब 11 हजार लीटर दूध इकट्ठा होता था। अब यह मात्रा लगभग ढाई लाख लीटर प्रतिदिन तक पहुंचने की जानकारी दी गई है। राज्य के करीब 66 हजार किसान झारखंड मिल्क फेडरेशन से जुड़े हैं। दूध बेचने वाले किसानों को सरकार की ओर से पांच रुपये प्रति लीटर प्रोत्साहन राशि भी दी जा रही है।

मछली पालन में भी राज्य ने अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा पूरा करना शुरू कर दिया है। पहले मछली के लिए पश्चिम बंगाल और आंध्र प्रदेश से आपूर्ति पर निर्भरता अधिक थी। अब राज्य में मछली उत्पादन लगभग 3.63 लाख मीट्रिक टन तक पहुंच गया है।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, झारखंड अपनी मछली की जरूरत का 95 प्रतिशत से अधिक उत्पादन कर रहा है। इस काम से करीब दो लाख लोग जुड़े होने की जानकारी दी गई है।

मछली पालन बढ़ाने के लिए तालाबों के साथ केज कल्चर, बायोफ्लॉक और दूसरी आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल किया जा रहा है। मछली के चारे, हैचरी, कोल्ड स्टोरेज और बिक्री के लिए बेहतर बाजार तैयार करने की भी योजना है।

पांच हजार महिलाओं को मुर्गीपालन से जोड़ने की योजना

झारखंड सरकार अब ग्रामीण महिलाओं की कमाई बढ़ाने के लिए मुर्गीपालन पर भी ध्यान दे रही है। प्रस्तावित झील योजना के तहत राज्य के 10 जिलों की पांच हजार महिलाओं को लेयर मुर्गीपालन इकाइयों से जोड़ने की तैयारी है।

इस परियोजना की अनुमानित लागत 470.93 करोड़ रुपये बताई गई है। योजना के जरिए सालाना 100 से 124 करोड़ अंडे तैयार करने का लक्ष्य रखा गया है। सरकार का अनुमान है कि इससे राज्य की अंडा उत्पादन क्षमता में 40 प्रतिशत से अधिक बढ़ोतरी हो सकती है।

योजना के तहत प्रत्येक महिला को हर महीने करीब 8,900 से 9,000 रुपये की शुद्ध आय मिलने का अनुमान है। हालांकि, वास्तविक कमाई उत्पादन, लागत और बाजार में अंडों की कीमत पर निर्भर करेगी।

मुख्यमंत्री पशुधन विकास योजना के तहत बकरी और सूकर पालन को भी बढ़ावा दिया जा रहा है। व्यावसायिक बकरी पालन की 100 बकरी और पांच बकरों वाली इकाई के लिए करीब 9.78 लाख रुपये की परियोजना लागत पर 70 प्रतिशत अनुदान का प्रावधान बताया गया है।

इसी तरह सूकर पालन की निर्धारित इकाई पर भी लगभग 70 प्रतिशत सरकारी सहायता देने की योजना है। इन गतिविधियों से ग्रामीण परिवार खेती के अलावा कमाई के दूसरे साधन तैयार कर सकते हैं।

मोटे अनाज और वन उत्पादों से भी किसानों की आय बढ़ाने की तैयारी

झारखंड में धान के अलावा मोटे अनाज की खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है। राज्य मिलेट मिशन के तहत किसानों को प्रति एकड़ तीन हजार रुपये की प्रोत्साहन राशि दी जा रही है।

वर्ष 2024-25 में करीब 18,900 किसानों को 6.37 करोड़ रुपये और 2025-26 में लगभग 24,070 किसानों को 11.47 करोड़ रुपये की सहायता देने की जानकारी है।

ग्रामीण इलाकों में महुआ, साल बीज, करंज, चिरौंजी और लाह जैसे वन उत्पाद भी कमाई का साधन हैं। सरकार इनका संग्रह करने वाले लोगों को प्रशिक्षण और बाजार उपलब्ध कराने पर काम कर रही है।

लाह की खेती बढ़ाने के लिए किसानों को पोषक पौधे देने की योजना भी शुरू की गई है। इसके तहत पात्र किसानों को सेमियालता, कुसुम, बेर और दूसरे पौधे उपलब्ध कराए जाएंगे।

फसलों को खराब होने से बचाने के लिए सहकारी समितियों के जरिए कोल्ड रूम बनाने की तैयारी है। वित्त वर्ष 2026-27 में इसके लिए 162.21 करोड़ रुपये का प्रावधान प्रस्तावित है।

झारखंड की कृषि, पशुपालन एवं सहकारिता मंत्री शिल्पी नेहा तिर्की के अनुसार, सरकार का उद्देश्य किसानों की आमदनी बढ़ाने के साथ ग्रामीण महिलाओं और युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर तैयार करना है।

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