सुप्रीम कोर्ट ने लोकसभा और विधानसभा की SC-ST आरक्षित सीटों को हर चुनाव में बदलने की मांग खारिज कर दी है। अदालत ने कहा कि रोटेशन की व्यवस्था लागू करने का फैसला संसद को करना है। मामला यूपी की कादीपुर विधानसभा सीट से जुड़ा है।
नई दिल्ली: लोकसभा और विधानसभा चुनावों में अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षित सीटों को हर चुनाव में बदलने की मांग पर सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। बुधवार, 4 नवंबर 2026 को अदालत ने इस व्यवस्था को लागू करने का निर्देश देने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने साफ किया कि आरक्षित सीटों में रोटेशन लागू करना संसद का अधिकार है। अदालत अपनी तरफ से कानून में नया प्रावधान नहीं जोड़ सकती।
सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षित सीटों को लेकर क्या कहा?
देश में लोकसभा और विधानसभा की SC-ST आरक्षित सीटों को हर चुनाव में बदलने की मांग फिलहाल पूरी नहीं होगी। सुप्रीम कोर्ट ने इस संबंध में दाखिल याचिका खारिज करते हुए कहा है कि मौजूदा कानून में बदलाव करना संसद का काम है। अदालत अपनी ओर से ऐसी व्यवस्था लागू करने का आदेश नहीं दे सकती। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की तीन सदस्यीय पीठ ने मामले की सुनवाई की।
अदालत ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के पुराने फैसले में दखल देने से इनकार कर दिया। सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने याचिकाकर्ता से कहा कि वह अपनी मांग लेकर गलत जगह आए हैं। अगर आरक्षित सीटों में रोटेशन की व्यवस्था चाहिए, तो इसके लिए संसद और चुने हुए जनप्रतिनिधियों के सामने बात रखनी होगी। कोर्ट ने याचिकाकर्ता को इस विषय पर जनप्रतिनिधियों से संपर्क करने और कानून बदलने के लिए सहमति बनाने की छूट भी दी।
70 साल से आरक्षित कादीपुर सीट से शुरू हुआ मामला
यह पूरा विवाद उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले की 191-कादीपुर विधानसभा सीट से जुड़ा है। इस क्षेत्र के मतदाता जगदीश सिंह ने अदालत में याचिका दाखिल की थी। जगदीश सिंह का कहना था कि कादीपुर विधानसभा सीट करीब सात दशक से अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है। लंबे समय से आरक्षण की स्थिति नहीं बदलने के कारण दूसरे वर्गों के उम्मीदवार इस सीट से चुनाव नहीं लड़ सकते।
उन्होंने दलील दी कि लगातार एक ही सीट आरक्षित रहने से राजनीतिक प्रतिनिधित्व का अवसर सीमित हो जाता है। उनके मुताबिक, इससे कुछ परिवारों को बार-बार राजनीतिक लाभ मिलता है, जबकि आरक्षित वर्ग के दूसरे लोगों को अलग क्षेत्रों से चुनाव लड़ने का मौका नहीं मिल पाता। याचिकाकर्ता की मांग थी कि जिस तरह पंचायत और नगर निकाय चुनावों में आरक्षित सीटें समय-समय पर बदली जाती हैं, उसी तरह लोकसभा और विधानसभा चुनावों में भी रोटेशन की व्यवस्था होनी चाहिए। उनका कहना था कि इससे अलग-अलग क्षेत्रों के SC-ST समुदाय के लोगों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व का बेहतर अवसर मिल सकेगा।
हाई कोर्ट ने पहले ही खारिज कर दी थी मांग
जगदीश सिंह ने पहले इलाहाबाद हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। उन्होंने परिसीमन अधिनियम, 2002 की धारा 9(1)(सी) को चुनौती दी थी। इस कानून के तहत आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों की पहचान करते समय संबंधित समुदाय की आबादी को ध्यान में रखा जाता है। याचिकाकर्ता का तर्क था कि इस व्यवस्था के कारण कुछ विधानसभा सीटें लगातार आरक्षित बनी रहती हैं।
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 22 जून 2026 को उनकी याचिका खारिज कर दी थी। कोर्ट ने माना था कि रोटेशन की व्यवस्था पर विचार किया जा सकता है, लेकिन इसका आदेश देने का अधिकार अदालत के पास नहीं है। हाई कोर्ट के इसी फैसले के खिलाफ जगदीश सिंह सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे। हालांकि, शीर्ष अदालत ने भी उनकी मांग स्वीकार नहीं की।
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संविधान और कानून में आरक्षण को लेकर क्या नियम हैं?
संविधान के अनुच्छेद 330 और 332 के मुताबिक लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं में अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए सीटें आरक्षित रखी जाती हैं। किसी राज्य में इन समुदायों की जितनी आबादी है, उसी हिसाब से आरक्षित सीटों की संख्या तय की जाती है। लेकिन इन नियमों में ऐसा कहीं नहीं कहा गया है कि हर चुनाव के बाद आरक्षित सीटों को बदलना जरूरी है।
पंचायत और नगर निकाय चुनावों में नियम कुछ अलग हैं। संविधान के अनुच्छेद 243D और 243T में आरक्षण के साथ सीटों को बदलने की व्यवस्था भी है। इसी को रोटेशन कहा जाता है। यानी एक चुनाव में जो सीट आरक्षित है, अगले चुनाव में उसकी जगह दूसरी सीट आरक्षित की जा सकती है। सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाने वालों की मांग थी कि लोकसभा और विधानसभा चुनावों में भी इसी तरह सीटें बदली जाएं।
लेकिन अदालत ने कहा कि मौजूदा कानून में ऐसी व्यवस्था नहीं है। कोर्ट अपनी तरफ से नया नियम नहीं बना सकता। अगर लोकसभा और विधानसभा में आरक्षित सीटें बदलने का नियम लाना है, तो इसका फैसला संसद को करना होगा। सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची ने एक और बात कही। उन्होंने कहा कि यह मान लेना ठीक नहीं होगा कि लोग चुनाव में सिर्फ उम्मीदवार की जाति या धर्म देखकर वोट देते हैं। मतदाता पार्टी, उसकी सोच और कामकाज को देखकर भी अपना प्रतिनिधि चुनते हैं।
क्या अब आरक्षित सीटों में कभी बदलाव नहीं होगा?
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का मतलब यह नहीं है कि भविष्य में SC-ST आरक्षित सीटों का रोटेशन कभी लागू नहीं हो सकता। अदालत ने सिर्फ यह स्पष्ट किया है कि मौजूदा कानून में हर चुनाव के बाद सीटें बदलने की अनिवार्य व्यवस्था नहीं है। इस तरह का नियम बनाने का अधिकार संसद के पास है। फिलहाल लोकसभा और विधानसभा में आरक्षित सीटों की मौजूदा व्यवस्था जारी रहेगी। किसी नई रोटेशन प्रणाली को लागू करने के लिए विधायी स्तर पर बदलाव जरूरी होगा।
कादीपुर सीट से जुड़े इस मामले में याचिकाकर्ता को जनप्रतिनिधियों के सामने अपनी मांग रखने की छूट मिली है। अब यह विषय राजनीतिक और विधायी स्तर पर आगे बढ़ सकता है।









