भारत और यूरोपीय संघ के बीच व्यापार समझौते की तैयारी चल रही है, लेकिन CBAM को लेकर दोनों के मतभेद बने हुए हैं। पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने साफ किया है कि COP31 में भारत विकासशील देशों के हितों का मुद्दा मजबूती से उठाएगा।
नई दिल्ली: यूरोपीय संघ (EU) के साथ मुक्त व्यापार समझौते की तैयारी के बीच भारत ने कार्बन टैक्स को लेकर अपना रुख साफ कर दिया है। केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने कहा कि भारत यूरोपीय संघ के कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) का विरोध जारी रखेगा। उन्होंने यह बात 9 नवंबर से तुर्किये में शुरू होने वाले जलवायु सम्मेलन COP31 से पहले कही। भारत का मानना है कि इस तरह के व्यापारिक नियमों से विकासशील देशों के उद्योगों और निर्यात पर अतिरिक्त बोझ पड़ सकता है।
यूरोपीय संघ के साथ समझौता होगा, लेकिन CBAM पर मतभेद बरकरार
भारत और यूरोपीय संघ के बीच मुक्त व्यापार समझौते (FTA) को लेकर बातचीत पूरी हो चुकी है। दोनों पक्ष दिसंबर 2026 के मध्य तक इस समझौते पर हस्ताक्षर कर सकते हैं। इससे भारत के कपड़ा, चमड़ा, रत्न और आभूषण जैसे क्षेत्रों को यूरोपीय बाजार में बेहतर अवसर मिलने की उम्मीद है। हालांकि, व्यापार समझौते से अलग कार्बन टैक्स को लेकर भारत की आपत्तियां बनी हुई हैं। मंगलवार, 3 नवंबर को मीडिया से बातचीत में भूपेंद्र यादव ने कहा कि भारत CBAM पर अपने पहले के रुख से पीछे नहीं हटेगा।
उन्होंने कहा कि जब भारत के हितों की रक्षा की बात आती है, तो सरकार इस मुद्दे को पूरी मजबूती से उठाती है। भारत चाहता है कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के नियम ऐसे हों, जिनसे विकासशील देशों के लिए व्यापार करना और नई तकनीक अपनाना मुश्किल न हो।
क्या है CBAM, जिसका भारत कर रहा विरोध?
यूरोपीय संघ के कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) को लेकर भारत ने अपनी चिंता जताई है। आसान भाषा में समझें तो यह एक ऐसी व्यवस्था है, जिसमें यूरोप में बाहर से आने वाले कुछ सामान पर उसके उत्पादन के दौरान हुए कार्बन उत्सर्जन के हिसाब से लागत तय की जाती है। इसके नए नियम 1 जनवरी 2026 से लागू हुए हैं।
इस व्यवस्था के दायरे में स्टील, लोहा, सीमेंट, एल्युमीनियम, खाद, बिजली और हाइड्रोजन जैसे उत्पाद आते हैं। यूरोपीय संघ का कहना है कि उसके यहां की कंपनियों को प्रदूषण फैलाने के लिए जो कार्बन लागत चुकानी पड़ती है, वैसी ही व्यवस्था बाहर से आने वाले सामान पर भी होनी चाहिए। इससे कंपनियां ऐसी तकनीक अपनाने के लिए आगे आएंगी, जिससे प्रदूषण कम हो।
भारत की आपत्ति इसी व्यवस्था के व्यापार पर पड़ने वाले असर को लेकर है। भारतीय कंपनियां बड़ी मात्रा में स्टील और एल्युमीनियम यूरोप भेजती हैं। CBAM के कारण इन कंपनियों का खर्च बढ़ सकता है। इससे भारतीय सामान यूरोपीय बाजार में महंगा पड़ने और उसकी मांग प्रभावित होने की चिंता है।
नई तकनीक को लेकर भारत ने क्या मांग रखी?
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केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने कहा कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए नई तकनीक जरूरी है। लेकिन ऐसी तकनीक हर देश आसानी से नहीं खरीद सकता। कई बार इसकी कीमत बहुत ज्यादा होती है। पेटेंट के नियम और व्यापार से जुड़ी पाबंदियां भी विकासशील देशों के सामने मुश्किलें खड़ी करती हैं।
भारत चाहता है कि अमीर देश नई और साफ तकनीक विकासशील देशों तक पहुंचाने में मदद करें। इससे छोटे और कम आय वाले देशों को भी प्रदूषण कम करने में आसानी होगी। भूपेंद्र यादव ने कार्बन बाजार को लेकर भी भारत की बात रखी। उन्होंने कहा कि किसी देश को इसमें शामिल होने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए। हर देश को अपनी आर्थिक स्थिति और जरूरत के हिसाब से फैसला लेने का मौका मिलना चाहिए।
भारत COP31 में इस मुद्दे को दूसरे विकासशील देशों के साथ मिलकर उठाएगा। इनमें G77 और चीन, समान विचारधारा वाले विकासशील देशों का समूह (LMDC) और BASIC समूह शामिल हैं।
साफ बिजली का इस्तेमाल बढ़ाने पर भी होगी बात
COP31 में बिजली और स्वच्छ ऊर्जा का मुद्दा भी उठाया जाएगा। सम्मेलन की मेजबानी कर रहा तुर्किये चाहता है कि दुनिया में ऊर्जा की कुल खपत में बिजली का इस्तेमाल बढ़ाया जाए। अभी इसकी हिस्सेदारी करीब 23 प्रतिशत बताई जा रही है। इसे 2035 तक बढ़ाकर 35 प्रतिशत करने का प्रस्ताव है। इसके लिए कोयला, पेट्रोलियम और गैस जैसे ईंधनों के बजाय दूसरे साफ स्रोतों से बनने वाली बिजली के इस्तेमाल को बढ़ावा देने की बात कही जा रही है।
इस प्रस्ताव पर भारत ने अपनी राय रखी है। पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने कहा कि सभी देशों की जरूरतें एक जैसी नहीं हैं। कुछ देशों के पास साफ ऊर्जा के लिए पर्याप्त साधन हैं, जबकि कई देशों में अभी बिजली की जरूरत पूरी करना ही बड़ी चुनौती है। उन्होंने कहा कि देशों की अपनी इच्छा से शुरू की गई योजनाओं और आधिकारिक जलवायु वार्ता को अलग रखना चाहिए। कोई भी वैश्विक लक्ष्य तय करते समय यह देखना जरूरी है कि गरीब और विकासशील देशों पर उसका कितना असर पड़ेगा।
जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए भारत ने मांगी आर्थिक मदद
भारत COP31 में विकसित देशों से आर्थिक सहायता का मुद्दा भी उठाएगा। भारत का कहना है कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए विकासशील देशों को काफी पैसे की जरूरत है। लेकिन कई देशों के पास इसके लिए पर्याप्त बजट नहीं है। भूपेंद्र यादव ने पेरिस समझौते के अनुच्छेद 9.1 का जिक्र करते हुए कहा कि विकसित देशों की जिम्मेदारी है कि वे विकासशील देशों को आर्थिक मदद दें। भारत चाहता है कि यह मदद समय पर मिले और इसके लिए ऐसी शर्तें न रखी जाएं, जिनसे गरीब देशों पर कर्ज का बोझ बढ़ जाए।
भारत की मांग है कि सहायता का बड़ा हिस्सा सरकारी धन से दिया जाए। साथ ही यह भी तय होना चाहिए कि देशों को मिलने वाली मदद भरोसेमंद हो और जरूरत पड़ने पर उपलब्ध हो सके।
कब और कहां आयोजित होगा COP31 सम्मेलन?
संयुक्त राष्ट्र का जलवायु सम्मेलन COP31 इस साल 9 से 20 नवंबर तक तुर्किये के अंताल्या शहर में आयोजित होगा। तुर्किये सम्मेलन की मेजबानी और अध्यक्षता करेगा, जबकि ऑस्ट्रेलिया जलवायु वार्ताओं की अध्यक्षता की जिम्मेदारी संभालेगा। इस दौरान भारत और स्वीडन की LeadIT 3.0 पहल पर भी कार्यक्रम होगा।
इसके अलावा तटीय क्षेत्रों की सुरक्षा, जंगलों और इंटरनेशनल बिग कैट एलायंस से जुड़े मुद्दों पर चर्चा की जाएगी। यूरोपीय संघ भी सम्मेलन में CBAM को लेकर बातचीत करेगा। ऐसे में भारत और EU के बीच इस मुद्दे पर फिर मतभेद सामने आ सकते हैं।









