सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों और केंद्र में दी जा रही मुफ्त योजनाओं (Freebies) पर चिंता जताई। न्यायालय ने कहा कि ये वित्तीय दबाव बढ़ाते हैं और बेरोजगारी, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे वास्तविक विकास कार्यों में बाधा डाल सकते हैं।
New Delhi: सुप्रीम कोर्ट ने राजनीतिक दलों द्वारा राज्य और केंद्र में दी जा रही मुफ्त योजनाओं या 'Freebies' पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। न्यायालय ने कहा कि ये योजनाएं देश के आर्थिक विकास में बाधक बन सकती हैं। न्यायालय ने जोर दिया कि राज्यों को जनता को मुफ्त उपहार देने के बजाय ऐसी योजनाओं पर ध्यान देना चाहिए जो बेरोजगारी, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में वास्तविक सुधार लाएं।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने गुरुवार को टिप्पणी करते हुए कहा कि यह फिजूलखर्ची देश के वित्तीय ढांचे को कमजोर कर रही है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब राज्य घाटे में हैं, तो फिर मुफ्त योजनाओं का वितरण क्यों किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि जो राजस्व एक वर्ष में एकत्र किया जाता है, उसका केवल एक हिस्सा यदि सुनियोजित विकास योजनाओं पर लगाया जाए तो इससे जनता को लंबे समय तक लाभ मिल सकता है।
मुफ्त योजनाओं से बढ़ता वित्तीय दबाव
न्यायालय ने कहा कि मुफ्त योजनाएं अब केवल चुनावी वादों तक सीमित नहीं रह गई हैं। राजनीतिक दल इसे वोट बैंक बनाने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं। न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने कहा कि यह सिर्फ किसी एक राज्य की समस्या नहीं है, बल्कि देश के सभी राज्यों के लिए चिंताजनक है।
उन्होंने सवाल उठाया कि बजट में नियोजित व्यय के लिए क्यों कोई औचित्य नहीं पेश किया जाता। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यदि राज्य बेरोजगारी, स्वास्थ्य या शिक्षा जैसी योजनाओं के लिए व्यय कर रहे हैं, तो इसका पारदर्शी बजट होना चाहिए और जनता को इसकी जानकारी दी जानी चाहिए।
इक्विटास इन्वेस्टमेंट्स की रिपोर्ट में भी यह बात सामने आई है कि राजनीतिक दल कल्याणकारी योजनाओं के नाम पर मुफ्त पैकेजों का सहारा लेकर वोट बैंक मजबूत कर रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार, ये मुफ्त योजनाएं राज्य के वित्त पर भारी दबाव डालती हैं।
आर्थिक विकास पर असर
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने जोर दिया कि मुफ्त योजनाओं का लगातार वितरण देश की आर्थिक वृद्धि को प्रभावित करता है। उन्होंने कहा कि यदि यह संसाधन सही दिशा में नियोजित किए जाएं, तो बेरोजगारी योजनाओं, स्वास्थ्य सेवा और शिक्षा सुधार जैसे क्षेत्रों में अधिक प्रभावशाली परिणाम मिल सकते हैं।
न्यायालय ने यह भी सवाल उठाया कि क्या राज्य सरकारें मुफ्त पैकेज के लाभार्थियों पर ध्यान नहीं देती हैं। न्यायालय ने कहा कि केवल वोट बैंक बनाने की दृष्टि से की गई योजनाएं लंबे समय तक आर्थिक और सामाजिक विकास में मदद नहीं कर सकती।








