हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने कहा कि जिरह का अधिकार गवाहों को प्रताड़ित करने का माध्यम नहीं बन सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि विस्तृत पूछताछ के बाद केवल मामले को लंबा खींचने के लिए गवाह को दोबारा नहीं बुलाया जा सकता।
शिमला: Himachal High Court ने आपराधिक मामलों में गवाहों के अधिकारों को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा कि जिरह का उद्देश्य केवल सच सामने लाना है, न कि गवाह को मानसिक रूप से परेशान करना। यदि किसी गवाह से पहले ही पर्याप्त पूछताछ हो चुकी है, तो उसे दोबारा बुलाने की अनुमति केवल उचित कारण होने पर ही दी जा सकती है।
जिरह के अधिकार की सीमा तय की
हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि किसी भी आरोपी को जिरह का अधिकार जरूर प्राप्त है, लेकिन इस अधिकार का इस्तेमाल गवाह को प्रताड़ित करने या अनावश्यक रूप से परेशान करने के लिए नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि यदि किसी गवाह से पहले ही विस्तृत पूछताछ की जा चुकी है, तो केवल मुकदमे को लंबा खींचने या गवाह पर दबाव बनाने के उद्देश्य से उसे दोबारा अदालत में बुलाने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि न्यायिक प्रक्रिया का उद्देश्य सत्य तक पहुंचना है, न कि गवाहों के साथ ऐसा व्यवहार करना जिससे वे मानसिक रूप से परेशान हों।
क्या था मामला?
यह फैसला न्यायमूर्ति राकेश कैंथला ने दिनेश चंद्र शर्मा द्वारा दायर एक आपराधिक याचिका पर सुनाया। याचिकाकर्ता ऊना की मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट अदालत में लंबित एक आपराधिक मामले में आरोपी हैं।
मामले में अभियोजन पक्ष ने एक व्यक्ति को मुख्य गवाह के रूप में पेश किया था। रिकॉर्ड के अनुसार, आरोपी पक्ष ने उस गवाह से लगातार तीन दिनों तक जिरह की थी। इस दौरान पूछे गए सवाल और जवाब अदालत के रिकॉर्ड में लगभग 35 पन्नों में दर्ज किए गए।
निचली अदालत ने दूसरी अर्जी की थी खारिज
लंबी जिरह पूरी होने के बाद निचली अदालत ने जून 2025 में गवाह से आगे जिरह करने का अधिकार समाप्त कर दिया था। इसके बाद आरोपी ने दोबारा आवेदन देकर उसी गवाह को फिर से बुलाने की अनुमति मांगी।
आरोपी का तर्क था कि गवाह प्रभावशाली और शिक्षित व्यक्ति है, इसलिए उससे पूरी सच्चाई सामने लाने के लिए दोबारा जिरह जरूरी है। हालांकि मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने मार्च 2026 में इस आवेदन को खारिज कर दिया, जिसके खिलाफ आरोपी ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की।
हाई कोर्ट ने याचिका की खारिज
हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ता की दलीलों को स्वीकार नहीं किया और निचली अदालत के फैसले को सही ठहराया। अदालत ने कहा कि पहले ही विस्तृत जिरह हो चुकी है और दोबारा गवाह को बुलाने का कोई ठोस कारण प्रस्तुत नहीं किया गया।
कोर्ट ने यह भी कहा कि बार-बार एक जैसे सवाल पूछना, अदालती रिकॉर्ड को अनावश्यक रूप से बढ़ाना और गवाह को मानसिक दबाव में रखना न्यायिक प्रक्रिया के उद्देश्य के अनुरूप नहीं है। ऐसे मामलों में अदालतों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि मुकदमे की सुनवाई निष्पक्ष, प्रभावी और समयबद्ध तरीके से पूरी हो।
फैसले का क्या होगा असर?
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यह फैसला आपराधिक मामलों में गवाहों के अधिकारों की सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इससे यह संदेश गया है कि अदालतें जिरह के अधिकार और गवाहों की गरिमा के बीच संतुलन बनाए रखने पर जोर दे रही हैं। साथ ही, न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग कर मामलों को अनावश्यक रूप से लंबा खींचने की कोशिशों पर भी रोक लगाने की दिशा में यह फैसला अहम माना जा रहा है।








