दक्षिणी लेबनान में अमेरिकी मध्यस्थता वाले समझौते के तहत लेबनानी सेना ने पायलट ज़ोन में तैनाती शुरू कर दी है। इजरायल ने कुछ क्षेत्रों से सेना हटाई है, जबकि हिजबुल्लाह के हथियारों का मुद्दा अब भी क्षेत्रीय सुरक्षा की सबसे बड़ी चुनौती बना हुआ है।
बेरूत: दक्षिणी लेबनान में सुरक्षा व्यवस्था को स्थिर करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए लेबनानी सेना ने इजरायली बलों की आंशिक वापसी के बाद ‘पायलट ज़ोन’ में अपनी तैनाती शुरू कर दी है। यह कदम अमेरिका की मध्यस्थता में हुए त्रिपक्षीय समझौते के तहत उठाया गया है, जिसका उद्देश्य सीमावर्ती क्षेत्र में तनाव कम करना और स्थानीय सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करना है।
लेबनान की सेना ने बताया कि उसकी इकाइयों ने नबाटियेह (Nabatieh) जिले के ज़ावतार अल-घरबियेह (Zawtar al-Gharbiyeh) गांव में प्रवेश कर तैनाती शुरू कर दी है। इसके साथ ही फ्रौन (Froun) और श्रीफा (Srifa) गांवों में भी सुरक्षा अभियान चलाया जा रहा है।
इजरायल ने शुरू की सीमित वापसी
इजरायली सेना (IDF) ने पुष्टि की है कि उसने पायलट ज़ोन योजना के तहत दक्षिणी लेबनान के कुछ हिस्सों से अपनी सैन्य उपस्थिति कम करनी शुरू कर दी है। इस योजना के तहत जिन क्षेत्रों से इजरायली सैनिक पीछे हटेंगे, वहां लेबनानी सेना सुरक्षा की जिम्मेदारी संभालेगी। हालांकि इजरायल ने स्पष्ट किया है कि वह सीमा से लगे लगभग 10 किलोमीटर गहरे सुरक्षा क्षेत्र (Security Zone) में अपनी सैन्य मौजूदगी फिलहाल बनाए रखेगा। इजरायली अधिकारियों का कहना है कि यह कदम उत्तरी इजरायल के नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक है।
समझौते का मुख्य उद्देश्य
अमेरिका, लेबनान और इजरायल के बीच हुए इस त्रिपक्षीय ढांचे (Trilateral Framework) का प्रमुख उद्देश्य दक्षिणी लेबनान में स्थायी शांति स्थापित करना है।
इस समझौते के तहत तीन प्रमुख लक्ष्य निर्धारित किए गए हैं—
- इजरायली सेना की चरणबद्ध वापसी।
- लेबनानी सेना की प्रभावी तैनाती।
- हिजबुल्लाह के हथियारों को हटाना और उसकी सैन्य गतिविधियों को सीमित करना।
अमेरिका का कहना है कि यह पहल क्षेत्रीय तनाव कम करने और संघर्ष की पुनरावृत्ति रोकने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
अमेरिका ने बताया महत्वपूर्ण उपलब्धि
अमेरिकी विदेश विभाग ने इस सैन्य तैनाती को एक महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया है। विभाग के अनुसार, यह प्रगति पिछले सप्ताह रोम में इजरायल और लेबनान के प्रतिनिधियों के बीच हुई वार्ता का प्रत्यक्ष परिणाम है। अमेरिकी अधिकारियों का मानना है कि यदि पायलट ज़ोन सफल रहता है, तो भविष्य में इसी मॉडल को दक्षिणी लेबनान के अन्य हिस्सों में भी लागू किया जा सकता है।
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लेबनानी सेना ने नागरिकों से की अपील
लेबनानी सेना ने स्थानीय नागरिकों से अपील की है कि सुरक्षा स्थिति पूरी तरह सामान्य होने तक प्रभावित गांवों में लौटने से बचें। सेना ने कहा कि तैनात सैन्य इकाइयों के निर्देशों का पालन करना सभी नागरिकों की सुरक्षा के लिए आवश्यक है। फिलहाल क्षेत्र में तलाशी अभियान, सुरक्षा जांच और स्थिति का आकलन किया जा रहा है।
ट्रंप और जोसेफ आउन की बैठक पर नजर
यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब लेबनान के राष्ट्रपति जोसेफ आउन की अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से वाशिंगटन में मुलाकात प्रस्तावित है। सूत्रों के अनुसार, राष्ट्रपति आउन इस बैठक में अमेरिका से आग्रह करेंगे कि वह इजरायल पर दक्षिणी लेबनान के शेष कब्जे वाले क्षेत्रों से भी सेना हटाने के लिए दबाव बनाए। साथ ही लेबनानी सेना को वित्तीय और सैन्य सहायता बढ़ाने का मुद्दा भी बैठक में प्रमुखता से उठाया जा सकता है।
हिजबुल्लाह बना सबसे बड़ा मुद्दा
इस पूरे समझौते का सबसे संवेदनशील पहलू ईरान समर्थित संगठन हिजबुल्लाह से जुड़ा है। इजरायल लंबे समय से आरोप लगाता रहा है कि हिजबुल्लाह दक्षिणी लेबनान में भारी मात्रा में हथियार जमा कर रहा है और सीमा पार हमलों की तैयारी करता है। इजरायल का कहना है कि किसी भी स्थायी समझौते के लिए हिजबुल्लाह का निरस्त्रीकरण (Disarmament) आवश्यक है। दूसरी ओर, लेबनान के भीतर इस मुद्दे पर राजनीतिक मतभेद बने हुए हैं, क्योंकि हिजबुल्लाह देश की राजनीति में भी प्रभावशाली भूमिका निभाता है।
हालिया संघर्ष की पृष्ठभूमि
दक्षिणी लेबनान में तनाव उस समय बढ़ गया था जब हिजबुल्लाह ने इजरायल की ओर रॉकेट दागे थे। इसके बाद इजरायल ने जवाबी कार्रवाई करते हुए लेबनान के कई हिस्सों में हवाई हमले किए और दक्षिणी क्षेत्र में सैन्य अभियान शुरू किया।
संघर्ष के दौरान दोनों पक्षों को नुकसान उठाना पड़ा और बड़ी संख्या में नागरिकों को अपने घर छोड़ने पड़े। अंतरराष्ट्रीय समुदाय लगातार दोनों देशों से संयम बरतने और कूटनीतिक समाधान अपनाने की अपील करता रहा है।
आगे क्या होगा
विशेषज्ञों का मानना है कि पायलट ज़ोन की सफलता पर पूरे समझौते का भविष्य निर्भर करेगा। यदि लेबनानी सेना प्रभावी ढंग से सुरक्षा व्यवस्था संभालने में सफल रहती है और क्षेत्र में हिंसा नहीं होती, तो इजरायली सेना अन्य इलाकों से भी चरणबद्ध तरीके से पीछे हट सकती है। हालांकि हिजबुल्लाह के हथियारों का मुद्दा और सीमा सुरक्षा अब भी सबसे बड़ी चुनौती बने हुए हैं।









