200 रुपये के चालान का केस 12 साल बाद कोर्ट पहुंचा: 19 साल पुराने मामले में जज ने चालान किया खारिज, पुलिस की लापरवाही पर सवाल

हिमाचल के मंडी में 200 रुपये जुर्माने का चालान 12 साल की देरी से कोर्ट पहुंचा। 19 साल पुराने मामले में जज ने पुलिस की लापरवाही पर चालान खारिज किया।
200 रुपये के चालान का केस 12 साल बाद कोर्ट पहुंचा: 19 साल पुराने मामले में जज ने चालान किया खारिज, पुलिस की लापरवाही पर सवाल
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हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले में पुलिस और न्यायिक व्यवस्था से जुड़ा एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने सभी को हैरान कर दिया। महज 200 रुपये के जुर्माने वाले एक मामले का चालान पुलिस ने 12 साल से अधिक समय की देरी के बाद अदालत में पेश किया। जब मामला न्यायालय के सामने पहुंचा तो कोर्ट ने पुलिस की इस देरी पर कड़ा रुख अपनाया और चालान को खारिज कर दिया। यह मामला वर्ष 2007 का है और करीब 19 साल तक अलग-अलग स्तर पर लंबित रहने के बाद अब अदालत में इसका पटाक्षेप हुआ है। न्यायिक दंडाधिकारी प्रथम श्रेणी (JMFC) कोर्ट नंबर-3, मंडी ने आरोपी अशोक को मामले से बरी कर दिया।

मामला मंडी जिले के बल्ह थाना क्षेत्र का है। जानकारी के अनुसार 4 फरवरी 2007 को पुलिस ने अशोक के खिलाफ भारतीय दंड संहिता यानी IPC की धारा 283 के तहत मामला दर्ज किया था। यह धारा सार्वजनिक रास्ते में बाधा डालने या लोगों के लिए खतरा पैदा करने से संबंधित थी। इस अपराध के लिए उस समय अधिकतम 200 रुपये के जुर्माने का प्रावधान था। यानी जिस मामले में पुलिस को कार्रवाई करनी थी, उसमें संभावित सजा भी केवल 200 रुपये के जुर्माने तक सीमित थी।

मामला दर्ज होने के बाद पुलिस की ओर से चालान अदालत में समय पर पेश नहीं किया गया। इसके बाद यह फाइल लंबे समय तक अलग-अलग कार्यालयों के बीच घूमती रही। अदालत में सुनवाई के दौरान सामने आया कि फाइल ग्राम पंचायत, नगर परिषद नेरचौक और संबंधित पुलिस थाने के बीच पत्राचार और प्रशासनिक प्रक्रिया में उलझी रही। इस दौरान वर्षों बीत गए, लेकिन चालान अदालत तक नहीं पहुंच सका।

सबसे हैरान करने वाली बात यह रही कि पुलिस ने 12 साल से अधिक समय गुजर जाने के बाद चालान अदालत में पेश किया। लेकिन इतनी लंबी देरी के बावजूद पुलिस की ओर से देरी को माफ करने के लिए कोई ठोस कारण नहीं बताया गया। इसके साथ ही देरी की माफी के लिए आवश्यक आवेदन भी अदालत के सामने प्रस्तुत नहीं किया गया। ऐसे में अदालत के सामने सबसे बड़ा सवाल यह था कि इतने पुराने और मामूली मामले में अब कानूनी प्रक्रिया किस आधार पर आगे बढ़ाई जाए।

अदालत ने मामले की कानूनी स्थिति पर विचार करते हुए पाया कि सिर्फ जुर्माने से दंडनीय अपराधों में अदालत के संज्ञान लेने की समय-सीमा निर्धारित होती है। रिपोर्ट के मुताबिक, दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 468 के तहत इस तरह के मामले में संज्ञान लेने की अवधि छह महीने थी। लेकिन यहां पुलिस ने चालान ही 12 साल से अधिक की देरी के बाद पेश किया। यानी मामला निर्धारित समय-सीमा से बहुत पहले ही बाहर हो चुका था।

कोर्ट ने इस बात को भी गंभीरता से लिया कि जिस घटना का मामला वर्ष 2007 में दर्ज हुआ था, उसका चालान वर्षों बाद अदालत में लाया गया। अदालत के सामने इतने लंबे समय बाद मामले की सुनवाई शुरू करने का कोई व्यावहारिक औचित्य भी नहीं था। कोर्ट ने माना कि इतने पुराने और मामूली मामले का ट्रायल चलाना आरोपी के लिए अनावश्यक मानसिक परेशानी का कारण बन सकता है।

अदालत ने यह भी माना कि ऐसे मामले में न्यायालय का बहुमूल्य समय और संसाधन खर्च होंगे। जब कानून में इस प्रकार के मामले के लिए सीमित समय में अदालत का संज्ञान लेने का प्रावधान है और पुलिस की ओर से निर्धारित अवधि में कार्रवाई नहीं की गई, तो वर्षों बाद मामले को आगे बढ़ाने का कोई उचित आधार नहीं बचता।

इसी आधार पर न्यायालय ने पुलिस की ओर से पेश किए गए चालान को खारिज कर दिया और आरोपी अशोक को सम्मानपूर्वक बरी कर दिया। इसके साथ ही मामले की फाइल को रिकॉर्ड रूम में भेजने का आदेश दिया गया। इस फैसले के साथ करीब 19 साल पुराने इस मामले का अंत हो गया।

इस मामले में अदालत की नाराजगी केवल देरी तक सीमित नहीं रही। न्यायालय ने यह भी देखा कि पुलिस के पास देरी को सही ठहराने के लिए कोई पर्याप्त कारण नहीं था। अगर पुलिस समय पर चालान अदालत में पेश करती तो मामला निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत आगे बढ़ सकता था। लेकिन फाइल वर्षों तक प्रशासनिक स्तर पर घूमती रही और जब उसे अदालत में पेश किया गया तब तक कानूनी समय-सीमा खत्म हो चुकी थी।

इस घटना से सरकारी कार्यालयों में फाइलों के लंबित रहने की समस्या भी सामने आती है। एक मामूली मामले की फाइल कई वर्षों तक अलग-अलग कार्यालयों के बीच घूमती रही। इस दौरान न तो संबंधित अधिकारियों ने समय-सीमा के भीतर कार्रवाई सुनिश्चित की और न ही अदालत में समय पर चालान पेश हो पाया। आखिरकार इतने वर्षों बाद जब मामला कोर्ट पहुंचा तो कानूनी अवधि खत्म होने के कारण उसे आगे बढ़ाना संभव नहीं रहा।

मामले की खास बात यह है कि संभावित जुर्माना केवल 200 रुपये था, लेकिन इस छोटी रकम के मामले को अदालत तक पहुंचने में 12 साल से अधिक लग गए। घटना के समय से लेकर अदालत के अंतिम आदेश तक करीब 19 साल का समय बीत चुका था। इतने लंबे अंतराल के बाद कोर्ट ने मामले को आगे बढ़ाने के बजाय कानूनी समय-सीमा और न्यायिक संसाधनों को ध्यान में रखते हुए चालान खारिज करना उचित समझा।

अदालत के इस फैसले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि देरी का असर केवल आरोपी पर नहीं पड़ता, बल्कि न्याय व्यवस्था पर भी पड़ता है। पुराने मामलों में गवाहों की उपलब्धता, दस्तावेजों की स्थिति और घटनाक्रम से जुड़ी जानकारी जैसी कई चीजें प्रभावित हो सकती हैं। ऐसे में कानून ने अलग-अलग अपराधों के लिए संज्ञान लेने की समय-सीमा तय की है, ताकि मामलों को अनिश्चितकाल तक लंबित न रखा जाए।

रिपोर्ट के मुताबिक, मंडी की इसी अदालत ने इसी तरह के चार अन्य मामलों में भी पुलिस की ओर से देरी से पेश किए गए चालान खारिज किए हैं। इससे यह संकेत मिलता है कि अदालत लंबित और अत्यधिक देरी से पेश किए जा रहे मामलों को लेकर सख्त रुख अपना रही है।

यह मामला पुलिस की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े करता है। किसी मामले में कार्रवाई के बाद समय पर चालान अदालत में पेश करना जांच एजेंसी की जिम्मेदारी होती है। अगर किसी वजह से निर्धारित समय में चालान पेश नहीं हो पाता है तो कानून में देरी को माफ कराने की प्रक्रिया भी मौजूद है। लेकिन इस मामले में पुलिस ने न तो समय पर चालान पेश किया और न ही बाद में देरी की माफी के लिए उचित आवेदन दिया। नतीजा यह हुआ कि अदालत को मामले को समाप्त करना पड़ा।

वर्ष 2007 में दर्ज हुए इस मामले में आरोपी को लगभग दो दशक तक इस मुकदमे की अनिश्चितता का सामना करना पड़ा। भले ही संभावित जुर्माना केवल 200 रुपये था, लेकिन मामला रिकॉर्ड में मौजूद रहा और अंततः 2026 में अदालत के सामने आया। कोर्ट ने इसी वजह से इतने पुराने मामले की सुनवाई को आरोपी के लिए मानसिक उत्पीड़न और अदालत के समय की बर्बादी माना।

मंडी कोर्ट का यह फैसला इस बात की ओर भी ध्यान दिलाता है कि कानून में तय समय-सीमा का पालन करना कितना जरूरी है। मामूली अपराध होने के बावजूद अगर कार्रवाई वर्षों तक टलती रहे तो न्यायिक प्रक्रिया का उद्देश्य ही प्रभावित हो सकता है। पुलिस और संबंधित प्रशासनिक विभागों के लिए यह मामला एक तरह की चेतावनी भी है कि कानूनी कार्रवाई को समय पर पूरा करना जरूरी है।

फिलहाल अदालत के आदेश के बाद अशोक के खिलाफ इस पुराने मामले की कार्रवाई समाप्त हो गई है। चालान खारिज होने के साथ ही रिकॉर्ड को रिकॉर्ड रूम भेजने का निर्देश दिया गया है। करीब 19 साल पुराने इस मामले में आखिरकार फैसला आया, लेकिन फैसला आरोपी को सजा देने के बजाय पुलिस की देरी के कारण चालान खारिज करने के रूप में सामने आया।

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