Sukhvinder Singh Sukhu की सरकार को नगर निकाय चुनावों से जुड़े एक अहम मामले में सुप्रीम कोर्ट से राहत मिली है। Supreme Court of India ने हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के उस अंतरिम आदेश पर रोक लगा दी है, जिसमें विधायकों को नगर परिषद और नगर पंचायतों के अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष के चुनाव में मतदान करने से रोका गया था।
नई दिल्ली: हिमाचल प्रदेश में नगर निकाय चुनावों को लेकर चल रहे कानूनी विवाद में राज्य सरकार को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। सर्वोच्च न्यायालय ने हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के उस अंतरिम आदेश पर रोक लगा दी है, जिसमें विधायकों को नगर परिषदों और नगर पंचायतों के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के चुनावों में मतदान करने से रोका गया था। इस फैसले के बाद फिलहाल राज्य में पुरानी व्यवस्था बहाल हो गई है और विधायक इन चुनावों में वोट डाल सकेंगे।
यह मामला मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू की सरकार के लिए बेहद अहम माना जा रहा था, क्योंकि इससे शहरी स्थानीय निकायों की चुनावी प्रक्रिया और शक्ति संतुलन पर सीधा असर पड़ता।
सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप, हाईकोर्ट के आदेश पर रोक
मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने मामले की सुनवाई के दौरान हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के अंतरिम आदेश पर रोक लगाने का फैसला किया। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि नगर परिषदों और नगर पंचायतों के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का चुनाव केवल निर्वाचित पार्षदों द्वारा ही किया जाना चाहिए।
हाईकोर्ट ने यह भी टिप्पणी की थी कि विधायकों सहित पदेन सदस्यों को मतदान का अधिकार संबंधित कानूनों के तहत स्पष्ट रूप से प्राप्त नहीं है, इसलिए उन्हें इस प्रक्रिया से बाहर रखा जाना चाहिए।
राज्य सरकार ने दी दलील, सुप्रीम कोर्ट पहुंचा मामला
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हिमाचल प्रदेश सरकार ने हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। राज्य सरकार की ओर से महाधिवक्ता अनूप रत्न ने अदालत में पक्ष रखा और कहा कि इस आदेश से शहरी निकायों की लोकतांत्रिक प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। सरकार ने तर्क दिया कि वर्षों से चली आ रही व्यवस्था के तहत विधायकों की भागीदारी स्थानीय निकायों के चुनावों में एक स्थापित प्रक्रिया रही है, जिसे अचानक रोकना प्रशासनिक असंतुलन पैदा कर सकता है।
सुप्रीम कोर्ट के ताज़ा आदेश के बाद अब हिमाचल प्रदेश में नगर निगम, नगर परिषद और नगर पंचायतों के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, मेयर और डिप्टी मेयर के चुनावों में विधायकों की भागीदारी पहले की तरह जारी रहेगी। इस निर्णय के बाद शहरी स्थानीय निकायों की चुनावी प्रक्रियाओं में फिलहाल कोई बदलाव नहीं होगा और मौजूदा प्रणाली के अनुसार ही मतदान होगा।
राजनीतिक और प्रशासनिक असर
इस फैसले का सीधा असर राज्य के शहरी निकायों में होने वाले नेतृत्व चुनावों पर पड़ेगा। लंबे समय से इस बात पर विवाद चल रहा था कि क्या विधायकों को स्थानीय निकायों के आंतरिक चुनावों में मतदान का अधिकार होना चाहिए या नहीं। एक पक्ष का मानना था कि विधायकों की भागीदारी से प्रशासनिक समन्वय मजबूत होता है, जबकि दूसरा पक्ष इसे स्थानीय स्वशासन की स्वायत्तता के खिलाफ मानता था।









