चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ (COAS) जनरल धीरज सेठ ने डिफेंस प्रोडक्शन में आत्मनिर्भरता और स्वदेशी क्षमता के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि युद्ध में जमीन हमेशा सफलता का ‘एकमात्र ठोस’ पैमाना रहेगी, क्योंकि जीत का आकलन हासिल किए गए इलाके के आधार पर ही किया जाता है।
Indian Army Chief: आधुनिक युद्ध में ड्रोन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, सैटेलाइट और सूचना तकनीक की भूमिका लगातार बढ़ रही है, लेकिन जमीनी स्तर पर नियंत्रण का महत्व अब भी कायम है। सेना प्रमुख जनरल धीरज सेठ ने आधुनिक युद्ध के बदलते स्वरूप, सोशल मीडिया पर फैलने वाली भ्रामक सूचनाओं और भारत की रक्षा आत्मनिर्भरता पर बात करते हुए कहा कि तकनीक लड़ाइयों की अवधि कम कर सकती है, लेकिन जरूरी नहीं कि इससे पूरा युद्ध जल्दी खत्म हो जाए।
जनरल धीरज सेठ ने यह बात हाल ही में आयोजित एक रक्षा सम्मेलन में कही। उन्होंने आधुनिक संघर्षों की बदलती प्रकृति का उल्लेख करते हुए बताया कि आज युद्ध लगातार लंबे, अनिश्चित और कई चरणों में बंटे हुए दिखाई दे सकते हैं। उनके मुताबिक, तीव्र सैन्य कार्रवाई के बाद रणनीतिक ठहराव आ सकता है और फिर संघर्ष दोबारा तेज हो सकता है। इस वजह से किसी युद्ध के अंत को केवल एक निर्णायक क्षण या घटना से परिभाषित करना हमेशा संभव नहीं होता।
सोशल मीडिया पर बढ़ती सूचना की लड़ाई
सेना प्रमुख ने युद्ध के डिजिटल पहलू पर भी ध्यान दिलाया। उन्होंने कहा कि दुनियाभर में चल रहे संघर्षों की खबरें सोशल मीडिया पर लगातार सामने आती रहती हैं। इस दौरान सूचनाओं और अलग-अलग नैरेटिव का इस्तेमाल वास्तविक घटनाक्रम को अस्पष्ट करने, भ्रम पैदा करने और लोगों के बीच अनिश्चितता बढ़ाने के लिए किया जा सकता है।
उन्होंने इस स्थिति को 'साल्वो आफ्टर साल्वो' के रूपक से समझाया। उनका कहना था कि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर सूचनाओं की लगातार बौछार के बीच वास्तविक जमीनी तस्वीर को समझना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। इसलिए सैन्य घटनाओं का आकलन केवल ऑनलाइन दावों और वायरल सामग्री के आधार पर नहीं किया जाना चाहिए।
जमीन पर नियंत्रण को क्यों बताया अहम?

तकनीकी बदलावों के बावजूद जनरल सेठ ने क्षेत्रीय नियंत्रण को सैन्य सफलता का महत्वपूर्ण और प्रत्यक्ष पैमाना बताया। उनके अनुसार, अंतिम रूप से किसी इलाके को कब्जे में लेना, सुरक्षित रखना और उसकी रक्षा करना जमीनी बलों की जिम्मेदारी होती है। उन्होंने कहा कि युद्ध की सफलता को क्षेत्रीय नियंत्रण के संदर्भ में देखा जाता रहा है और यह पहलू भविष्य में भी महत्वपूर्ण रहेगा।
उनकी टिप्पणी का व्यापक संदर्भ यह था कि नई तकनीक युद्धक्षेत्र में निगरानी, सटीक हमले, संचार और प्रतिक्रिया की गति बदल सकती है, लेकिन सैनिक की भूमिका खत्म नहीं होती। सेना प्रमुख ने कहा कि सैन्य क्षमताओं के विकास का केंद्र वह जवान होना चाहिए जो वास्तविक जमीन पर तैनात होकर लड़ता है। हर नई क्षमता के बारे में यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि इससे अग्रिम मोर्चे पर मौजूद सैनिक को कितना प्रत्यक्ष लाभ मिलेगा।
रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता पर जोर
जनरल धीरज सेठ ने रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता को भी रणनीतिक जरूरत से जोड़ा। उनके अनुसार, आत्मनिर्भरता का अर्थ केवल विदेशी आयात कम करना नहीं है। भारत को ऐसी क्षमता विकसित करनी होगी जिसमें रक्षा प्रणालियों को देश में डिजाइन किया जाए, उनका विकास और निर्माण यहीं हो, साथ ही उनका रखरखाव और भविष्य के लिए अपग्रेड भी देश में संभव हो।
उन्होंने इस दृष्टिकोण को वैश्विक बाजार से भी जोड़ा। उनके मुताबिक, देश में विकसित तकनीक को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाना उत्पादन क्षमता को मजबूत कर सकता है। शांति के समय की निर्यात क्षमता को उन्होंने संभावित युद्ध परिस्थितियों में उत्पादन बढ़ाने की क्षमता से भी जोड़ा।
नई तकनीक पुरानी न पड़ जाए, इसका भी रखना होगा ध्यान
सेना प्रमुख ने स्वदेशी रक्षा तकनीक विकसित करने के साथ उसकी समयबद्ध उपलब्धता पर भी जोर दिया। उनके अनुसार, केवल देश में किसी प्रणाली का विकास कर लेना पर्याप्त नहीं है। यह भी सुनिश्चित करना होगा कि जब वह तकनीक सेना के वास्तविक इस्तेमाल में आए, तब तक वह अप्रचलित न हो जाए।उन्होंने चेतावनी दी कि लंबी विकास प्रक्रिया के कारण कोई स्वदेशी प्रणाली जरूरत के समय पुरानी पड़ सकती है। इसलिए अनुसंधान, विकास, परीक्षण, उत्पादन और तैनाती के बीच समय कम करना रक्षा क्षेत्र की महत्वपूर्ण चुनौती है।












