पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने 64 साल पुरानी सिंधु जल संधि को निलंबित कर रखा है। भारत ने स्पष्ट किया है कि ‘पानी और खून साथ-साथ नहीं बह सकते’, जबकि पाकिस्तान इस मुद्दे पर अड़ियल रुख अपनाए हुए है।
World News: भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty) लंबे समय से दोनों देशों के बीच साझा जल संसाधनों के प्रबंधन का आधार रही है। हालांकि, बदलते भू-राजनीतिक माहौल के साथ अब जलवायु परिवर्तन भी इस समझौते के लिए बड़ी चुनौती बनकर सामने आया है। विशेषज्ञों का मानना है कि करीब छह दशक पुराने समझौते को आज की परिस्थितियों के अनुरूप दोबारा देखने की जरूरत है।
पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने सिंधु जल संधि को निलंबित करने का फैसला किया था। भारत का कहना है कि आतंकवाद और पानी के मुद्दे को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता। दूसरी ओर, पाकिस्तान लगातार संधि को बनाए रखने की मांग करता रहा है। इसी बीच विशेषज्ञों ने दोनों देशों के बीच भविष्य के जल सहयोग के लिए नए मॉडल पर चर्चा शुरू की है।
केवल पानी बांटने के बजाय साझा प्रबंधन पर जोर
इंटरनेशनल सोसाइटी ऑफ इंटरनेशनल लॉ से जुड़े पर्यावरण कानून विशेषज्ञ अनवर सदात ने अपने विश्लेषण में कहा है कि सिंधु बेसिन को केवल नदियों के पानी के बंटवारे के नजरिए से देखना पर्याप्त नहीं होगा। इसके बजाय भारत और पाकिस्तान को साझा जल प्रबंधन की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। विशेषज्ञों के मुताबिक, साझा नदियों के इस्तेमाल में ‘न्यायसंगत और उचित उपयोग’ यानी Equitable and Reasonable Utilization (ERU) को महत्वपूर्ण सिद्धांत बनाया जा सकता है। इस व्यवस्था में किसी नदी पर पहले अधिकार या भौगोलिक स्थिति के बजाय दोनों देशों की मौजूदा जरूरतों और परिस्थितियों को ध्यान में रखा जा सकता है।
जलवायु परिवर्तन ने बढ़ाई चुनौती
सिंधु जल संधि ऐसे समय में तैयार हुई थी, जब आज जैसी जलवायु संबंधी चुनौतियां सामने नहीं थीं। मौजूदा दौर में ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, मानसून का स्वरूप बदल रहा है और कई क्षेत्रों में सूखे तथा अचानक बाढ़ की घटनाएं बढ़ रही हैं। इसका असर नदियों के जल प्रवाह और पानी की गुणवत्ता दोनों पर पड़ सकता है।
पाकिस्तान की कृषि व्यवस्था सिंधु नदी प्रणाली पर काफी निर्भर है। दूसरी तरफ भारत को जम्मू-कश्मीर और अन्य क्षेत्रों में सिंचाई, पेयजल तथा जलविद्युत परियोजनाओं के लिए जल संसाधनों की आवश्यकता है। ऐसे में भविष्य में दोनों देशों की जरूरतों के बीच संतुलन बनाना बड़ी चुनौती हो सकती है।

पुराने आंकड़ों पर आधारित है मौजूदा व्यवस्था
विशेषज्ञों के अनुसार सिंधु जल संधि की मूल व्यवस्था उस दौर के हाइड्रोलॉजिकल आंकड़ों और परिस्थितियों को ध्यान में रखकर बनाई गई थी। आज आबादी, कृषि जरूरत, ऊर्जा की मांग और पर्यावरणीय दबाव काफी बदल चुके हैं। इसी वजह से यह सवाल उठ रहा है कि क्या केवल नदियों को अलग-अलग हिस्सों में बांटने वाला मॉडल आने वाले दशकों में पर्याप्त रहेगा। जलवायु परिवर्तन के कारण पानी की उपलब्धता में होने वाले उतार-चढ़ाव को देखते हुए अधिक लचीली व्यवस्था की जरूरत महसूस की जा रही है।
विशेषज्ञों ने दुनिया के कुछ अन्य सीमा-पार जल समझौतों को भारत-पाकिस्तान के लिए संभावित उदाहरण बताया है। अमेरिका और कनाडा के बीच जल सहयोग में नदी से मिलने वाले विभिन्न आर्थिक लाभों और बाढ़ नियंत्रण जैसे फायदे साझा करने की व्यवस्था देखने को मिलती है। इसी तरह अमेरिका और मेक्सिको के बीच कोलोराडो नदी से संबंधित समझौतों में पानी की उपलब्धता और मौसम की परिस्थितियों के अनुसार कुछ लचीलापन रखा गया है। अफ्रीका में नील नदी बेसिन से जुड़े प्रयासों में भी पर्यावरण और जलवायु परिस्थितियों के अनुसार जल प्रबंधन की समीक्षा पर जोर दिया गया है।
पर्यावरण संरक्षण भी बन सकता है साझा एजेंडा
सिंधु बेसिन का भविष्य केवल पानी की मात्रा से नहीं जुड़ा है। आर्द्रभूमि, जैव-विविधता और नदी पारिस्थितिकी भी इससे सीधे प्रभावित होती है। भारत और पाकिस्तान दोनों अंतरराष्ट्रीय पर्यावरणीय समझौतों का हिस्सा हैं, जिनमें रामसर कन्वेंशन और जैव विविधता पर कन्वेंशन शामिल हैं। ऐसे में विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य की जल व्यवस्था में पानी के बंटवारे के साथ-साथ नदी पारिस्थितिकी, जैव-विविधता और जल संरक्षण को भी शामिल किया जाना चाहिए।









