जापान में तलाक के बाद बच्चों की कस्टडी को लेकर बड़ा कानूनी बदलाव लागू हुआ है। अब माता-पिता संयुक्त कस्टडी चुन सकेंगे। नए कानून से बच्चों को दोनों अभिभावकों का साथ मिलेगा, हालांकि घरेलू हिंसा के मामलों को लेकर कई लोगों ने चिंता भी जताई है।
टोक्यो: जापान में तलाक के बाद बच्चों की कस्टडी को लेकर दशकों पुरानी व्यवस्था अब ऐतिहासिक बदलाव के दौर से गुजर रही है। लंबे समय तक देश में ऐसा कानून लागू था, जिसके तहत तलाक के बाद केवल एक माता-पिता को बच्चों की कानूनी कस्टडी मिलती थी। अक्सर इसका परिणाम यह होता था कि दूसरा अभिभावक अपने बच्चों के जीवन से लगभग पूरी तरह अलग हो जाता था।
अब 1 अप्रैल 2026 से जापान में संयुक्त अभिभावकता (Joint Custody) को कानूनी मान्यता मिल गई है। यह बदलाव जापान की पारिवारिक और सामाजिक संरचना में एक बड़ा मोड़ माना जा रहा है। इससे पहले जापान G7 देशों में अकेला ऐसा देश था जहां संयुक्त कस्टडी की कानूनी व्यवस्था मौजूद नहीं थी।
नया कानून उन हजारों माता-पिताओं के लिए उम्मीद लेकर आया है, जो तलाक के बाद अपने बच्चों से दूर हो गए थे। हालांकि, इसके साथ घरेलू हिंसा और मानसिक उत्पीड़न से जुड़े मामलों को लेकर नई चिंताएं भी सामने आ रही हैं।
बच्चों से दूर होने का दर्द: एक पिता की कहानी
हांगकांग मूल के जॉन डेंग (बदला हुआ नाम) पिछले 22 वर्षों से जापान में रह रहे हैं। यहीं उन्होंने अपना परिवार बसाया, शादी की और दो बच्चों के पिता बने। लेकिन शादी टूटने के बाद उनकी जिंदगी पूरी तरह बदल गई।
डेंग बताते हैं कि एक दिन अचानक उनकी पूर्व पत्नी बच्चों को लेकर चली गईं और उसके बाद उन्हें बच्चों से मिलने का अधिकार लगभग खत्म हो गया।
वे कहते हैं,
“मुझे ऐसा लगा जैसे मेरी पूरी दुनिया खत्म हो गई। मैं असहाय, दुखी और सिस्टम से बेहद नाराज था।”
आज भी डेंग अपने बच्चों के करीब रहने की कोशिश में दो घरों में रह रहे हैं—एक टोक्यो में और दूसरा उस इलाके के पास जहां उनके बच्चे रहते हैं। इसके बावजूद उन्हें महीने में केवल कुछ घंटों के लिए निगरानी में बच्चों से मिलने की अनुमति मिलती है।
वे कहते हैं कि उनकी बेटी अब फोन पर भी उनसे बात नहीं कर पाती। इस वजह से वे केवल जन्मदिन, स्कूल कार्यक्रम या फादर्स डे ही नहीं, बल्कि बच्चों के रोजमर्रा के जीवन से भी कट चुके हैं।
पुरानी व्यवस्था पर क्यों उठे सवाल?
जापान की पुरानी “सोल कस्टडी” व्यवस्था के तहत तलाक के बाद केवल एक अभिभावक को कानूनी अधिकार मिलते थे। आमतौर पर जिस माता-पिता के पास बच्चा रहता था, वही पूरी तरह फैसले लेता था।
इस व्यवस्था की सबसे बड़ी आलोचना यह रही कि इससे दूसरा अभिभावक बच्चों के जीवन से पूरी तरह गायब हो सकता था। कई मामलों में माता-पिता को अपने बच्चों से मिलने तक की अनुमति नहीं मिलती थी।
विशेषज्ञों का मानना है कि इससे बच्चों के मानसिक विकास और भावनात्मक संतुलन पर भी असर पड़ता था।
टोक्यो स्थित सेतागाया इंटरनेशनल लॉ ऑफिस के फैमिली लॉयर सेइया साइटो कहते हैं,
“अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों में पारिवारिक मामलों में यह नहीं देखा जाता कि कौन जीता या हारा। वहां सबसे अहम बात बच्चों का हित होता है।”
जापान में तलाक के बढ़ते मामले
जापान के स्वास्थ्य, श्रम और कल्याण मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, 2024 में देश में लगभग 38.5% शादियां तलाक में समाप्त हुईं। यानी हर तीन में से एक शादी टूट रही है।
उसी वर्ष 18 साल से कम उम्र के 1.64 लाख से अधिक बच्चे ऐसे थे जिनके माता-पिता तलाकशुदा थे और जो कस्टडी व्यवस्था से प्रभावित हुए।

आंकड़ों के मुताबिक, 86% से अधिक मामलों में बच्चों की कस्टडी मां को मिली। संयुक्त कस्टडी के मामले बेहद कम थे।
विशेषज्ञों का कहना है कि बदलते सामाजिक ढांचे और पारिवारिक चुनौतियों के बीच पुराने कानून अब आधुनिक जापानी समाज की जरूरतों को पूरा नहीं कर पा रहे थे।
नया कानून क्या बदलेगा?
नए कानून के तहत अब तलाकशुदा दंपती बच्चों की संयुक्त कस्टडी चुन सकते हैं। इसका मतलब है कि दोनों माता-पिता बच्चों के पालन-पोषण, शिक्षा और भविष्य से जुड़े फैसलों में भागीदारी कर सकेंगे।
कानून का उद्देश्य बच्चों को दोनों अभिभावकों के साथ संबंध बनाए रखने का अवसर देना है।
सेइया साइटो का मानना है कि यह बदलाव जापानी समाज के लिए सकारात्मक साबित हो सकता है।
वे कहते हैं,
“जो माता-पिता आपसी समझ से फैसले ले सकते हैं, उनके लिए संयुक्त कस्टडी एक बेहतर विकल्प है। यह बच्चों के लिए भी फायदेमंद है।”
घरेलू हिंसा पीड़ितों की चिंता
हालांकि इस नए कानून को लेकर सभी लोग उत्साहित नहीं हैं।
रियो (बदला हुआ नाम) नाम की एक महिला, जिन्होंने घरेलू हिंसा का सामना किया, इस बदलाव को लेकर चिंतित हैं। उनका कहना है कि उनके पूर्व पति ने कई बार उनके साथ हिंसा की थी।
वे बताती हैं,
“जब मुझे अकेली कस्टडी मिली थी, तब लगा था कि अब जिंदगी सुरक्षित होगी। लेकिन अब डर है कि वे दोबारा हमारे जीवन में आ सकते हैं।”
रियो को चिंता है कि उनका पूर्व पति उनकी 15 वर्षीय बेटी की संयुक्त कस्टडी के लिए आवेदन कर सकता है, जिससे उन्हें फिर मानसिक तनाव का सामना करना पड़ सकता है।
कानून में सुरक्षा प्रावधान भी शामिल
हालांकि जापान के नए कानून में घरेलू हिंसा और बच्चों की सुरक्षा को लेकर विशेष प्रावधान भी जोड़े गए हैं।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यदि अदालत को घरेलू हिंसा, मानसिक प्रताड़ना या बच्चे की सुरक्षा को खतरा महसूस होता है, तो वह संयुक्त कस्टडी देने से इनकार कर सकती है।
फैमिली लॉयर साइटो कहते हैं,
“यदि अदालत को यह विश्वास हो जाता है कि तलाक से पहले घरेलू हिंसा हुई थी, तो उसे केवल एक अभिभावक को कस्टडी देनी होगी।”
फिर भी कई महिला अधिकार समूहों और सामाजिक संगठनों का कहना है कि जापानी अदालतों में घरेलू हिंसा साबित करना आसान नहीं होता, खासकर तब जब शारीरिक चोट के स्पष्ट सबूत न हों।
जापान की घटती आबादी और परिवार नीति
जापान इस समय गंभीर जनसंख्या संकट का सामना कर रहा है। देश में जन्मदर लगातार गिर रही है और बुजुर्ग आबादी तेजी से बढ़ रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार परिवारों को मजबूत करने और बच्चों की परवरिश का बोझ साझा करने के लिए नए सामाजिक और कानूनी सुधारों पर जोर दे रही है।
संयुक्त कस्टडी को इसी व्यापक सामाजिक सुधार का हिस्सा माना जा रहा है।
समाज में नई बहस शुरू
नए कानून ने जापान में परिवार, अभिभावकता और बच्चों के अधिकारों को लेकर नई बहस छेड़ दी है।
एक ओर हजारों माता-पिता इसे बच्चों के साथ रिश्ता बचाने की दिशा में ऐतिहासिक कदम मान रहे हैं। दूसरी ओर घरेलू हिंसा पीड़ितों और महिला संगठनों को आशंका है कि कहीं यह कानून उन्हें फिर असुरक्षित स्थिति में न पहुंचा दे।
विशेषज्ञों का कहना है कि इस कानून की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि अदालतें हर मामले में बच्चों के सर्वोत्तम हित को कितनी गंभीरता से लागू करती हैं।
फिलहाल इतना तय है कि जापान अब परिवार और तलाक को देखने के अपने पारंपरिक दृष्टिकोण में बड़ा बदलाव कर रहा है, जिसका असर आने वाले वर्षों में पूरे समाज पर दिखाई देगा।









