कोलकाता में एक अखबार की हेडलाइन को लेकर शुरू हुआ विवाद अब सड़क तक पहुंच गया है। 1 सितंबर को प्रदर्शनकारियों के एक समूह ने कोलकाता स्थित आनंदबाजार पत्रिका के कार्यालय के बाहर विरोध प्रदर्शन किया और नारेबाजी की। प्रदर्शन के दौरान कुछ लोगों ने अखबार के कार्यालय के गेट के हिस्से को भगवा रंग से रंग दिया। घटना के दौरान प्रदर्शनकारी नारे लगाते हुए नजर आए, जबकि कार्यालय के बाहर पुलिस की मौजूदगी भी रही। इस पूरे घटनाक्रम ने पश्चिम बंगाल में मीडिया, राजनीतिक बयानबाजी और विश्वविद्यालय परिसर में हुए विवाद को लेकर चल रही बहस को और तेज कर दिया है।
मामले की शुरुआत आनंदबाजार पत्रिका में प्रकाशित एक हेडलाइन को लेकर हुई थी। रिपोर्टों के मुताबिक, अखबार ने जादवपुर विश्वविद्यालय में हुई झड़प से जुड़ी खबर में ‘गेरुआ गुंडागर्दी’ शब्द का इस्तेमाल किया था। इसी शब्दावली को लेकर भाजपा नेता शुभेंदु अधिकारी ने सार्वजनिक रूप से आपत्ति जताई और अखबार से माफी मांगने की मांग की थी। इसके बाद विवाद और गहरा गया तथा अब प्रदर्शनकारियों ने अखबार के कार्यालय के बाहर पहुंचकर अपना विरोध दर्ज कराया।
प्रदर्शन के दौरान कुछ लोग भगवा कपड़े पहने हुए थे। प्रदर्शनकारियों ने अखबार के खिलाफ नारे लगाए और कार्यालय के बाहर विरोध जताया। रिपोर्टों के अनुसार, प्रदर्शनकारियों के एक हिस्से ने कार्यालय के सफेद गेट के खंभों और आसपास के हिस्से पर भगवा रंग लगा दिया। उस समय पुलिसकर्मी मौके पर मौजूद थे। घटना का वीडियो और तस्वीरें सामने आने के बाद यह मामला सोशल मीडिया और राजनीतिक हलकों में भी चर्चा का विषय बन गया है।
बताया जा रहा है कि विवादित हेडलाइन 21 अगस्त के अखबार के फ्रंट पेज पर प्रकाशित खबर से जुड़ी थी। यह खबर जादवपुर विश्वविद्यालय में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ताओं और स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया से जुड़े छात्रों के बीच हुई झड़प के संदर्भ में थी। रिपोर्टों के अनुसार, इस दौरान विश्वविद्यालय के गेट पर लगे प्रतीक को नुकसान पहुंचने की बात भी सामने आई थी। इसी घटना के संदर्भ में अखबार की हेडलाइन में ‘गेरुआ गुंडागर्दी’ शब्द का इस्तेमाल किया गया, जिस पर भाजपा की ओर से तीखी प्रतिक्रिया आई।
शुभेंदु अधिकारी ने इस शब्दावली को लेकर अखबार से आपत्ति जताई थी और माफी की मांग की थी। उनके रुख के बाद यह विवाद राजनीतिक मुद्दा भी बन गया। भाजपा समर्थक समूहों की ओर से अखबार की हेडलाइन को लेकर विरोध दर्ज कराया गया। इसके बाद 1 सितंबर को प्रदर्शनकारियों के अखबार कार्यालय पहुंचने से मामला और गंभीर हो गया। विरोध के दौरान नारेबाजी और कार्यालय के गेट पर रंग लगाए जाने की घटना ने मीडिया संस्थानों की सुरक्षा और विरोध के तौर-तरीकों को लेकर भी सवाल खड़े किए हैं।
अखबार के कार्यालय के बाहर प्रदर्शन के दौरान पुलिसकर्मी मौजूद रहे। रिपोर्टों के अनुसार प्रदर्शनकारियों ने कार्यालय के बाहर नारे लगाए और कुछ लोगों ने गेट के हिस्से को भगवा रंग से रंग दिया। घटना के बाद कार्यालय के हिस्से को दोबारा सफेद रंग से रंगे जाने की भी जानकारी सामने आई है। पुलिस की मौजूदगी के बावजूद प्रदर्शनकारियों द्वारा रंग लगाए जाने की घटना को लेकर भी चर्चा हो रही है।
इस पूरे विवाद का एक दूसरा पहलू जादवपुर विश्वविद्यालय में हाल में हुई राजनीतिक और वैचारिक गतिविधियों से जुड़ा है। विश्वविद्यालय परिसर में नारों और दीवारों पर बने चित्रों को लेकर भी विवाद चल रहा है। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने विश्वविद्यालय परिसर में लगाए गए कुछ नारों और माओवादी नेता किशनजी से जुड़े चित्र को लेकर कड़ा रुख अपनाया था। उन्होंने ऐसे नारों को लेकर सार्वजनिक रूप से नाराजगी जताई थी और विश्वविद्यालय में ‘धमकी की संस्कृति’ खत्म करने की बात कही थी।
जादवपुर विश्वविद्यालय से जुड़े विवाद के बीच मीडिया रिपोर्टिंग और हेडलाइन को लेकर नया विवाद सामने आने से पश्चिम बंगाल का राजनीतिक माहौल और गरमा गया है। एक तरफ भाजपा और उसके समर्थक अखबार की भाषा को आपत्तिजनक बताते हुए विरोध कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ मीडिया की स्वतंत्रता और पत्रकारों को राजनीतिक दबाव से मुक्त रखने को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। प्रेस संगठनों ने पत्रकारों के खिलाफ कार्रवाई और अखबार कार्यालय को निशाना बनाए जाने की घटनाओं पर चिंता जताई है।
मामले में पत्रकारों के खिलाफ दर्ज शिकायतों और एफआईआर को लेकर भी प्रेस संगठनों की प्रतिक्रिया सामने आई है। आलोचकों का कहना है कि किसी खबर की भाषा या हेडलाइन से असहमति होने पर विरोध और कानूनी प्रक्रिया का रास्ता अपनाया जा सकता है, लेकिन किसी मीडिया संस्थान के कार्यालय को निशाना बनाना अलग मुद्दा है। दूसरी ओर प्रदर्शनकारियों का कहना है कि वे अखबार की कथित आपत्तिजनक भाषा के खिलाफ अपना विरोध दर्ज कराने पहुंचे थे।
घटना के बाद अखबार कार्यालय के आसपास सुरक्षा व्यवस्था पर भी ध्यान दिया गया। मीडिया संस्थानों के कार्यालयों पर राजनीतिक या वैचारिक विवाद के दौरान प्रदर्शन होने की स्थिति में पुलिस के सामने कानून-व्यवस्था बनाए रखने के साथ पत्रकारों और कार्यालय की सुरक्षा सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी होती है। इस मामले में भी पुलिस की मौजूदगी में प्रदर्शन हुआ, जिसके बाद कार्यालय परिसर पर रंग लगाए जाने की घटना सामने आई।
राजनीतिक रूप से देखें तो यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब पश्चिम बंगाल में राजनीतिक गतिविधियां तेज हैं। जादवपुर विश्वविद्यालय का मुद्दा पहले ही भाजपा और विपक्षी दलों के बीच बहस का विषय बना हुआ है। विश्वविद्यालय परिसर में नारे, दीवारों पर लिखे संदेश और छात्र संगठनों के बीच टकराव को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच लगातार बयानबाजी हो रही है। इसी बीच एक प्रमुख अखबार की हेडलाइन को लेकर विवाद ने इस बहस में मीडिया की भूमिका को भी जोड़ दिया है।
अखबार की हेडलाइन को लेकर शुभेंदु अधिकारी की आपत्ति के बाद शुरू हुआ विवाद अब प्रदर्शन तक पहुंच चुका है। प्रदर्शनकारियों द्वारा कार्यालय के बाहर नारेबाजी और गेट को भगवा रंग से रंगे जाने की घटना ने इसे केवल संपादकीय भाषा के विवाद तक सीमित नहीं रहने दिया। अब यह सवाल भी उठ रहा है कि किसी मीडिया संस्थान की रिपोर्टिंग से असहमति जताने के लिए विरोध का कौन-सा तरीका लोकतांत्रिक और स्वीकार्य माना जाना चाहिए।
इस घटना ने पत्रकारिता में शब्दों के चयन को लेकर भी बहस छेड़ दी है। राजनीतिक रूप से संवेदनशील घटनाओं की रिपोर्टिंग में हेडलाइन का महत्व काफी अधिक होता है। एक ही घटना को अलग-अलग शब्दों में प्रस्तुत करने से पाठकों पर अलग प्रभाव पड़ सकता है। ऐसे में राजनीतिक दलों और मीडिया संस्थानों के बीच भाषा को लेकर विवाद होना नया नहीं है, लेकिन जब यह विवाद सड़क पर प्रदर्शन और कार्यालय को नुकसान पहुंचाने जैसी घटनाओं तक पहुंचता है तो मामला कानून-व्यवस्था और प्रेस स्वतंत्रता से भी जुड़ जाता है।
फिलहाल कोलकाता में अखबार कार्यालय के बाहर हुए प्रदर्शन के बाद यह विवाद शांत होने के बजाय और चर्चा में आ गया है। एक ओर शुभेंदु अधिकारी की ओर से हेडलाइन को लेकर जताई गई आपत्ति और माफी की मांग है, तो दूसरी ओर प्रदर्शनकारियों का विरोध और कार्यालय के गेट पर भगवा रंग लगाए जाने की घटना है। आने वाले दिनों में इस मामले को लेकर राजनीतिक दलों, मीडिया संगठनों और प्रशासन की ओर से और प्रतिक्रियाएं सामने आ सकती हैं।
कुल मिलाकर, कोलकाता में अखबार कार्यालय के बाहर हुआ प्रदर्शन जादवपुर विश्वविद्यालय की घटना से शुरू हुए विवाद की अगली कड़ी के रूप में देखा जा रहा है। हेडलाइन में इस्तेमाल शब्दों को लेकर उठी आपत्ति अब प्रदर्शन, नारेबाजी और कार्यालय के गेट को रंगने तक पहुंच गई है। घटना ने एक बार फिर यह बहस तेज कर दी है कि राजनीतिक और वैचारिक रूप से संवेदनशील खबरों की रिपोर्टिंग में भाषा का इस्तेमाल किस तरह किया जाए और असहमति की स्थिति में विरोध का लोकतांत्रिक तरीका क्या होना चाहिए।








