लखनऊ। राजधानी लखनऊ के अलीगंज इलाके में हुए भीषण अग्निकांड ने प्रशासनिक लापरवाही और अवैध निर्माण पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। तीन मंजिला इमारत में लगी आग में 15 लोगों की मौत हो गई, जबकि कई अन्य घायल हुए हैं। शुरुआती जांच में सामने आया है कि जिस इमारत में हादसा हुआ, उसे 2016 में अवैध निर्माण के कारण गिराने का आदेश दिया गया था, लेकिन महज दो महीने बाद यह आदेश वापस ले लिया गया था।
यह इमारत अलीगंज के उषा मेहता मार्ग पर स्थित थी। सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक, भवन को आवासीय उपयोग के लिए मंजूरी मिली थी, लेकिन पिछले कई वर्षों से इसका इस्तेमाल व्यावसायिक गतिविधियों के लिए किया जा रहा था। इमारत में एक एनीमेशन सेंटर, पेट क्लीनिक और अन्य व्यावसायिक प्रतिष्ठान संचालित हो रहे थे।
जांच में पता चला है कि 10 मई 2016 को अवैध निर्माण के कारण इस इमारत को ध्वस्त करने का आदेश जारी हुआ था। हालांकि, 5 जुलाई 2016 को यह आदेश वापस ले लिया गया और उसके बाद भवन के खिलाफ कोई बड़ी कार्रवाई नहीं हुई। अब हादसे के बाद यह सवाल उठ रहा है कि आखिर किसके दबाव या किस वजह से कार्रवाई रोक दी गई थी।
हादसे के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने तत्काल कार्रवाई करते हुए चार अधिकारियों को निलंबित कर दिया है। इनमें बिजली विभाग के एक कार्यपालक अभियंता, फायर विभाग के अधिकारी और लखनऊ विकास प्राधिकरण (LDA) के दो इंजीनियर शामिल हैं। सरकार ने इन अधिकारियों पर सुरक्षा मानकों की अनदेखी और निगरानी में लापरवाही के आरोप लगाए हैं।
पुलिस ने इस मामले में अब तक चार लोगों को गिरफ्तार किया है, जिनमें भवन मालिक और एनीमेशन सेंटर के संचालक भी शामिल हैं। अलीगंज थाने में छह नामजद आरोपियों और अन्य अज्ञात लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है। आरोप है कि सभी ने मिलकर एक आवासीय भवन का अवैध रूप से व्यावसायिक उपयोग किया और सुरक्षा मानकों की अनदेखी की।
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, आग लगने के बाद इमारत में धुआं तेजी से भर गया। कई छात्र और कर्मचारी दूसरी मंजिल पर फंस गए। कुछ लोगों ने जान बचाने के लिए खिड़कियों से छलांग लगा दी, जबकि दमकल कर्मियों को कई लोगों तक पहुंचने के लिए दीवार तोड़नी पड़ी। शुरुआती आशंका है कि आग एसी डक्ट या बिजली संबंधी गड़बड़ी से शुरू हुई हो सकती है, हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उच्चस्तरीय जांच के आदेश दिए हैं। एक विशेष जांच दल (SIT) और वरिष्ठ अधिकारियों की समिति गठित की गई है, जिन्हें सात दिनों के भीतर रिपोर्ट सौंपने को कहा गया है।
यह हादसा केवल एक आगजनी की घटना नहीं, बल्कि वर्षों से चली आ रही प्रशासनिक लापरवाही, अवैध निर्माण और सुरक्षा मानकों की अनदेखी की भी कहानी बन गया है। अब सबकी नजर जांच रिपोर्ट पर है, जिससे यह स्पष्ट होगा कि 2016 में जारी ध्वस्तीकरण आदेश आखिर क्यों वापस लिया गया और इस त्रासदी के लिए जिम्मेदार लोगों पर क्या कार्रवाई होती है।










