मेजर मनकोटिया पंचतत्व में विलीन, हिमाचल की राजनीति के लंबे अध्याय का अंत; कभी ठुकराया था मंत्री पद

मेजर विजय सिंह मनकोटिया का तियारा में अंतिम संस्कार हुआ। पांच बार विधायक और दो बार मंत्री रहे मनकोटिया ने 1982 में निर्दलीय चुनाव जीता था।
मेजर मनकोटिया पंचतत्व में विलीन, हिमाचल की राजनीति के लंबे अध्याय का अंत; कभी ठुकराया था मंत्री पद
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हिमाचल प्रदेश की राजनीति के लंबे समय तक चर्चित रहे पूर्व मंत्री और शाहपुर से पांच बार विधायक रहे मेजर विजय सिंह मनकोटिया का अंतिम संस्कार उनके पैतृक गांव तियारा में कर दिया गया। बुधवार को बैंड-बाजे के साथ उनकी अंतिम यात्रा निकली, जिसमें कांगड़ा के अलावा प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों से बड़ी संख्या में लोग और पूर्व सैनिक पहुंचे। विदेश से लौटे उनके बेटे ने उन्हें मुखाग्नि दी। अंतिम विदाई के दौरान तियारा और आसपास के इलाके में शोक का माहौल रहा। उनके सम्मान में तियारा बाजार भी बंद रहा।

मेजर विजय सिंह मनकोटिया का निधन मंगलवार को 87 वर्ष की उम्र में उनके पैतृक गांव तियारा में हुआ था। उनके निधन की खबर सामने आने के बाद कांगड़ा और हिमाचल के राजनीतिक तथा सामाजिक क्षेत्र में शोक की लहर फैल गई। मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू समेत कई नेताओं ने उनके निधन पर शोक व्यक्त किया। मुख्यमंत्री ने कहा कि मनकोटिया ने हिमाचल प्रदेश के विकास, खासकर शाहपुर विधानसभा क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण योगदान दिया और उनके सामाजिक कार्यों को लोग लंबे समय तक याद रखेंगे।

अंतिम संस्कार से पहले मनकोटिया की पार्थिव देह को तियारा स्थित उनके आवास पर अंतिम दर्शन के लिए रखा गया। उनके बेटे और बेटी विदेश में थे, इसलिए उनके गांव लौटने के बाद अंतिम संस्कार की प्रक्रिया शुरू की गई। इसके बाद बैंड-बाजे के साथ अंतिम यात्रा निकली। स्थानीय लोगों, समर्थकों और पूर्व सैनिकों ने अंतिम यात्रा में शामिल होकर उन्हें श्रद्धांजलि दी। परिवार की ओर से बेटे ने चिता को मुखाग्नि दी, जिसके बाद मेजर मनकोटिया पंचतत्व में विलीन हो गए।

मेजर मनकोटिया का सार्वजनिक जीवन राजनीति में आने से काफी पहले शुरू हो चुका था। वह भारतीय सेना में अधिकारी रहे थे। सैन्य सेवा से सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने सक्रिय राजनीति में कदम रखा और वर्ष 1982 में शाहपुर विधानसभा क्षेत्र से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव जीतकर अपनी राजनीतिक पारी शुरू की। इसके बाद उन्होंने अलग-अलग राजनीतिक दलों के साथ चुनावी राजनीति की और शाहपुर से कुल पांच बार विधानसभा पहुंचे। उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार उन्होंने 1982, 1985, 1990, 1993 और 2003 में शाहपुर से जीत दर्ज की।

उनकी राजनीतिक यात्रा कई मायनों में अलग रही। 1982 में निर्दलीय विधायक बनने के बाद सरकार गठन के दौरान निर्दलीय विधायकों के समर्थन की जरूरत पड़ी थी। जागरण की रिपोर्ट के मुताबिक उस समय मनकोटिया को मंत्री पद की पेशकश की गई थी, लेकिन उन्होंने इसे स्वीकार नहीं किया। उनका तर्क था कि जनता ने उन्हें निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुना है और वह मतदाताओं के विश्वास के साथ समझौता नहीं करना चाहते। यही प्रसंग उनके राजनीतिक जीवन में उसूलों और स्वतंत्र राजनीतिक रुख से जुड़े चर्चित उदाहरणों में गिना जाता रहा।

मेजर मनकोटिया की राजनीति किसी एक दल तक सीमित नहीं रही। 1985 में वह कांग्रेस के साथ जुड़े और शाहपुर से चुनाव जीता। बाद में राजनीतिक मतभेदों के बीच उन्होंने कांग्रेस से अलग होकर वीपी सिंह के जनमोर्चा और जनता दल के साथ भी काम किया तथा 1990 में शाहपुर से जीत हासिल की। इसके बाद वह फिर कांग्रेस में लौटे और 1993 में चुनाव जीता। बाद के वर्षों में भी उनके राजनीतिक सफर में बदलाव आते रहे। 2007 में उन्होंने बहुजन समाज पार्टी के साथ चुनाव लड़ा और बाद के दौर में निर्दलीय राजनीति भी की।

मनकोटिया दो बार हिमाचल प्रदेश सरकार में मंत्री भी रहे। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार उन्होंने 1995 से 1998 के बीच और फिर मार्च 2003 से जुलाई 2004 तक मंत्री पद संभाला। उनके पास पर्यटन, नागरिक उड्डयन और कानून जैसे विभागों की जिम्मेदारी रही। इसके अलावा वह हिमाचल पर्यटन विकास निगम के उपाध्यक्ष भी रहे। इस तरह उनका राजनीतिक जीवन विधानसभा सदस्य से लेकर राज्य सरकार में मंत्री और पर्यटन क्षेत्र से जुड़ी जिम्मेदारियों तक फैला रहा।

उनकी राजनीति का एक महत्वपूर्ण पक्ष कांगड़ा और निचले हिमाचल से जुड़े मुद्दों को लगातार उठाना था। धर्मशाला में विधानसभा के शीतकालीन सत्र की मांग को लेकर भी उनका नाम प्रमुखता से सामने आता है। उन्होंने धर्मशाला को दूसरी राजधानी का दर्जा देने, तपोवन में विधानसभा सत्र की अवधि बढ़ाने, कांगड़ा हवाई अड्डे के विस्तार और पर्यटन सुविधाओं को मजबूत करने जैसे मुद्दे उठाए। धर्मशाला में विधानसभा के शीतकालीन सत्र की शुरुआत को लेकर उनकी भूमिका का उल्लेख उनकी राजनीतिक यात्रा से जुड़े प्रसंगों में किया जाता है।

मेजर मनकोटिया की राजनीति का अंदाज हमेशा मुखर रहा। सत्ता पक्ष में रहने के दौरान भी वह सरकार और प्रशासन से जुड़े मुद्दों पर अपनी बात रखने के लिए जाने जाते थे। पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के साथ उनके राजनीतिक मतभेद भी हिमाचल की राजनीति में लंबे समय तक चर्चा में रहे। दोनों के बीच कई मौकों पर राजनीतिक दूरी और मतभेद सामने आए, हालांकि मनकोटिया अलग-अलग समय पर कांग्रेस में लौटते भी रहे।

वर्ष 1987 का एक राजनीतिक प्रसंग भी उनकी बेबाक शैली से जोड़ा जाता है। जागरण की रिपोर्ट के अनुसार तत्कालीन परिवहन मंत्री सत महाजन से जुड़े भ्रष्टाचार और पद के दुरुपयोग के आरोपों का मुद्दा मनकोटिया ने उठाया था और तत्कालीन मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह से मंत्रिमंडल के सदस्यों की संपत्तियों की जांच की मांग की थी। इसके बाद उनके खिलाफ पठानकोट में मुकदमा दर्ज होने की बात भी रिपोर्ट में कही गई है। यह प्रसंग उस दौर में उनकी राजनीतिक सक्रियता और सरकार के भीतर रहते हुए भी सवाल उठाने की शैली से जोड़ा जाता रहा।

धर्मशाला और कांगड़ा की राजनीति में मनकोटिया की सक्रियता का एक और पहलू विधानसभा के शीतकालीन सत्र और क्षेत्रीय संस्थानों से जुड़ा था। उनका मानना था कि निचले हिमाचल के क्षेत्रों को प्रशासनिक और राजनीतिक गतिविधियों में पर्याप्त स्थान मिलना चाहिए। इसी सोच के तहत धर्मशाला में विधानसभा सत्र की मांग को उन्होंने लगातार उठाया। दिसंबर 2005 में धर्मशाला कॉलेज के प्रयास भवन में विधानसभा का शीतकालीन सत्र हुआ और इसके बाद दिसंबर 2006 में तपोवन स्थित विधानसभा परिसर में सत्र आयोजित किया गया।

शाहपुर की राजनीति में उनका चुनावी मुकाबला पूर्व मंत्री सरवीण चौधरी के साथ भी कई बार हुआ। दोनों नेताओं के बीच चुनावी मुकाबले लंबे समय तक स्थानीय राजनीति में चर्चा का विषय रहे। 2012 और 2017 के विधानसभा चुनावों में सरवीण चौधरी ने मनकोटिया को हराया था। वर्ष 2017 में मनकोटिया निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव मैदान में उतरे थे।

उनके राजनीतिक जीवन से जुड़ा एक दिलचस्प तथ्य यह भी सामने आया है कि वह शाहपुर से चुनाव लड़ते थे, लेकिन उनका पैतृक गांव तियारा कांगड़ा विधानसभा क्षेत्र में आता था। इसी वजह से उनका नाम कांगड़ा विधानसभा क्षेत्र की मतदाता सूची में रहा और वह अपने चुनावों में स्वयं को वोट नहीं दे पाते थे। एक रिपोर्ट के अनुसार इसके बावजूद वह 1982, 1985, 1990, 1993 और 2003 में शाहपुर से विधायक चुने गए।

मेजर मनकोटिया का सैन्य जीवन भी उनकी पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा। राजनीति में आने से पहले सेना में अधिकारी के रूप में सेवा देने के कारण पूर्व सैनिकों के बीच भी उनका जुड़ाव रहा। उनके अंतिम संस्कार में प्रदेश के विभिन्न हिस्सों से पूर्व सैनिकों की मौजूदगी इसकी एक झलक रही। अंतिम यात्रा में स्थानीय लोगों के साथ बड़ी संख्या में पूर्व सैनिक और उनके लंबे समय से जुड़े समर्थक शामिल हुए।

उनका निधन ऐसे समय में हुआ जब उनके करीब चार दशक लंबे सार्वजनिक जीवन को पीछे मुड़कर देखा जा रहा है। निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव जीतने से लेकर अलग-अलग राजनीतिक दलों के साथ काम करने, पांच बार विधायक बनने और दो बार मंत्री पद संभालने तक उनकी राजनीतिक यात्रा कई पड़ावों से गुजरी। इस दौरान कांगड़ा क्षेत्र के मुद्दे, क्षेत्रीय विकास, पर्यटन और धर्मशाला में विधानसभा गतिविधियों का विस्तार उनके सार्वजनिक जीवन के प्रमुख विषयों में रहे।

मनकोटिया के निधन पर हिमाचल के राजनीतिक क्षेत्र से जुड़े विभिन्न नेताओं ने भी शोक व्यक्त किया। मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने उनके निधन को प्रदेश के लिए क्षति बताते हुए उनके योगदान को याद किया। पूर्व मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने भी उनके निधन पर शोक जताया और उन्हें शाहपुर से पांच बार विधायक रहे वरिष्ठ नेता के रूप में याद किया।

तियारा में अंतिम विदाई के दौरान उमड़ी भीड़ और बाजार का बंद रहना स्थानीय स्तर पर उनके लंबे जुड़ाव को दर्शाता रहा। चार दशक से ज्यादा समय तक सार्वजनिक जीवन में सक्रिय रहने के कारण उनके समर्थकों, राजनीतिक सहयोगियों और विरोधियों के साथ-साथ क्षेत्र के आम लोगों के बीच भी उनकी पहचान बनी रही। सेना की पृष्ठभूमि से राजनीति में आए मनकोटिया ने विधानसभा, मंत्रिमंडल और संगठनात्मक राजनीति में अलग-अलग भूमिकाएं निभाईं।

मेजर विजय सिंह मनकोटिया के निधन के साथ हिमाचल प्रदेश की राजनीति का एक ऐसा दौर पीछे छूट गया जिसमें सैन्य पृष्ठभूमि वाले कई नेता सार्वजनिक जीवन में सक्रिय रहे और क्षेत्रीय मुद्दों को राज्य की राजनीति के केंद्र तक पहुंचाया। शाहपुर और कांगड़ा में उनकी राजनीतिक सक्रियता, पांच बार विधायक के रूप में उनका कार्यकाल, दो बार मंत्री पद की जिम्मेदारी और कई मुद्दों पर उनका खुलकर बोलना उनके सार्वजनिक जीवन की प्रमुख पहचान रहे। तियारा में अंतिम संस्कार के साथ उनके जीवन की राजनीतिक यात्रा का यह अध्याय अब समाप्त हो गया।

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