मेहनत ने बदली तकदीर: ₹1200 किराए के कमरे में रहने वाले मंगेश IPL में 5.20 करोड़ में बिके

मेहनत ने बदली तकदीर: ₹1200 किराए के कमरे में रहने वाले मंगेश IPL में 5.20 करोड़ में बिके

बोरगांव के किराए के कमरे से निकलकर मंगेश यादव ने मेहनत और संघर्ष से IPL 2026 में 5.20 करोड़ की बोली हासिल की। आर्थिक तंगी के बावजूद हार नहीं मानी। परिवार गर्वित है, माता-पिता की ख्वाहिश है कि मंगेश भारत के लिए खेले।

Madhya Pradesh: पांढुर्णा जिला मुख्यालय से करीब 35 किलोमीटर दूर बोरगांव गांव की एक संकरी और गंदी गली, बजरंग गली। इसी गली में 10 बाय 10 का एक छोटा सा कमरा है, जिसके बगल में छोटी सी कोठरी बनी है। यही कोठरी किचन है। इसी एक कमरे में मंगेश यादव का पूरा परिवार रहता है, माता-पिता और तीन बहनें।

कमरा इतना छोटा है कि कुर्सी रखने तक की जगह नहीं। यहीं सोना, उठना, बैठना और खाना, सब कुछ होता है। महीने का किराया 1200 रुपए है और बिजली का बिल अलग से 300-400 रुपए आता है। ऐसे हालात में पले-बढ़े मंगेश आज करोड़ों की बोली पाने वाले खिलाड़ी बन चुके हैं।

जब घर पहुंचते हैं, तो बाहर जूते-चप्पलों का ढेर नजर आता है। साफ समझ आ जाता है कि सुबह से लोग बधाई देने आ-जा रहे हैं। कमरे के अंदर भीड़ है, लोग मिठाई लेकर पहुंच रहे हैं और हर कोई इस सफलता की कहानी सुनना चाहता है।

दीवारों पर मेडल

घर छोटा है, लेकिन सपनों और मेहनत की पहचान हर जगह दिखती है। दीवारों पर मेडल टंगे हैं, अलमारी और कोनों में ट्रॉफियां रखी हैं। मंगेश की बहनों ने कमरे को बेल-बूटों की पेंटिंग से सजाया है। इसी तंग जगह में बैठकर मंगेश ने बड़े सपने देखे और उन्हें पूरा करने के लिए दिन-रात मेहनत की।

किचन में गैस पर बड़ी तपेली में चाय बन रही है। ठंड का मौसम है और जो भी बधाई देने आ रहा है, उसे चाय जरूर पिलाई जा रही है। घर में उत्सव का माहौल है, लेकिन आंखों में बीते संघर्ष की यादें भी साफ झलकती हैं।

पिता बोले, फोन पर रो रहा था बेटा

मंगेश के पिता राम अवध यादव ट्रक ड्राइवर हैं। उन्होंने बताया कि वे पिछले 22 सालों से ड्राइवरी कर रहे हैं। नौकरी की शुरुआत 1000 रुपए महीने से की थी और आज भी उन्हें करीब 10 हजार रुपए ही मिलते हैं। बाहर जाने पर भत्ता मिलता है, नहीं तो वही आमदनी।

पिता बताते हैं कि मंगलवार रात करीब साढ़े नौ बजे मंगेश का फोन आया। वह पुणे में था और फोन पर रो रहा था। उसकी आवाज ठीक से निकल नहीं रही थी। उसने बस इतना कहा, “पापा, मैं सिलेक्ट हो गया हूं।” यह सुनते ही पूरे घर की आंखें भर आईं।

राम अवध यादव कहते हैं, 'हमने कभी नहीं सोचा था कि बेटा करोड़ों में बिकेगा। बस यही चाहते हैं कि वह खेले और एक दिन भारतीय टीम की जर्सी पहने। उसी दिन हमारा सपना पूरा होगा।'

मां की आंखों में खुशी और संघर्ष की यादें

मां रीता यादव के लिए यह पल खुशी और भावनाओं से भरा है। वे बताती हैं कि पूरी रात नींद नहीं आई। बेटे का बचपन आंखों के सामने घूमता रहा। पैसों की तंगी हमेशा बनी रही। बड़ी मुश्किल से मंगेश का एडमिशन प्राइवेट स्कूल में कराया, लेकिन कई-कई महीने फीस जमा नहीं हो पाती थी।

वे कहती हैं, 'कभी-कभी स्कूल से नोटिस आ जाता था। उसके पापा गाड़ी चलाकर जैसे-तैसे पैसे जुटाते थे। तीन बेटियां हैं, घर चलाना आसान नहीं था। फिर भी बेटे को पढ़ाया और खेलने दिया।'

मंगेश ने 12वीं तक पढ़ाई की। इसके बाद पढ़ाई छोड़कर क्रिकेट को अपना पूरा समय देने लगा और खेलने के लिए नोएडा चला गया।

इनाम भी दूसरों को दे देता था

मंगेश के कोच उत्सव बैरागी बताते हैं कि वह बाएं हाथ का गेंदबाज और ऑलराउंडर है। नोएडा जाने से पहले मंगेश रोज बोरगांव से 70 किलोमीटर दूर छिंदवाड़ा प्रैक्टिस करने आता-जाता था। कोच बताते हैं कि मंगेश की सबसे खास बात उसका दिल है। जब भी किसी टूर्नामेंट में उसे नकद इनाम मिलता था, तो वह उसे ग्राउंड कर्मचारियों को दे देता था। खुद सिर्फ ट्रॉफी लेकर घर आता था।

2022 में छिंदवाड़ा के सांसद कप में उसे रेसर साइकिल मिली थी। वह साइकिल भी उसने ग्राउंड में काम करने वाले कर्मचारी को दे दी। मंगेश का मानना था कि मैदान को संभालने वाले कर्मचारी सबसे ज्यादा मेहनत करते हैं।

 

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