उत्तराखंड के चमोली जिले में मां नंदा देवी की बड़ी जात यात्रा इन दिनों आस्था, परंपरा और लोक संस्कृति का अद्भुत संगम बनी हुई है। 12 वर्ष के अंतराल के बाद आयोजित होने वाली इस ऐतिहासिक यात्रा में श्रद्धालुओं का उत्साह लगातार बढ़ रहा है। सिद्धपीठ कुरुड़ से कैलाश-होमकुंड की ओर रवाना हुई मां नंदा की डोली अब अलग-अलग पड़ावों से होकर आगे बढ़ रही है। इसी क्रम में बैराकुंड में भगवान शिव की विशेष पूजा-अर्चना की गई। धार्मिक परंपरा और स्थानीय मान्यताओं के अनुसार इस दौरान देवी-देवताओं के अवतरण की प्रक्रिया भी हुई, जिसके बाद यात्रा आगे के पड़ाव की ओर बढ़ी।
मां नंदा देवी की बड़ी जात को उत्तराखंड की सबसे महत्वपूर्ण लोक धार्मिक यात्राओं में गिना जाता है। इस यात्रा का संबंध केवल पूजा और दर्शन से नहीं है, बल्कि यह पहाड़ की सामाजिक संरचना, लोक परंपराओं, देवी-देवताओं में आस्था और गांवों के पारंपरिक संबंधों से भी जुड़ी हुई है। यात्रा के अलग-अलग पड़ावों पर स्थानीय ग्रामीण अपनी जिम्मेदारी निभाते हैं। हक-हकूकधारी गांवों की भूमिका इसमें विशेष मानी जाती है और डोली के एक पड़ाव से दूसरे पड़ाव तक पहुंचने की व्यवस्था पारंपरिक तरीके से आगे बढ़ती है।
इस वर्ष बड़ी जात की यात्रा 5 सितंबर को सिद्धपीठ कुरुड़ से शुरू हुई। यात्रा शुरू होने से पहले कुरुड़ में कई दिनों तक धार्मिक अनुष्ठान, पूजा-अर्चना और तैयारियां चलीं। मां नंदा की डोलियों को श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए मंडप में विराजमान किया गया था। चौसिंग्या खाडू को भी पारंपरिक रीति से यात्रा से जोड़ा गया और धार्मिक अनुष्ठानों के बीच बड़ी जात के शुभारंभ की प्रक्रियाएं पूरी की गईं।
कुरुड़ से यात्रा शुरू होने के बाद मां नंदा की डोली विभिन्न गांवों और धार्मिक पड़ावों से होते हुए आगे बढ़ रही है। तय कार्यक्रम के अनुसार यात्रा का मार्ग कुमजुग, कुंडबगड़, लुंतरा, कांडा, खुनाणा, लामसौड़ा, माणखी, चोपड़ाकोट, कांडई, खल्तरा, मोठा, चाका, सेमा, बैरासकुंड, इतमोली, धुबड़खेत, मटई, ग्वाड़ समेत कई स्थानों से होकर आगे बढ़ना है। बाद के चरणों में यात्रा रामणी और अन्य महत्वपूर्ण पड़ावों तक पहुंचती है।
बैराकुंड का पड़ाव इस यात्रा में इसलिए महत्वपूर्ण रहा क्योंकि यहां भगवान शिव की पूजा की गई। स्थानीय धार्मिक मान्यता में नंदा देवी को भगवान शिव के परिवार और हिमालयी लोक आस्था से जोड़कर देखा जाता है। नंदा को कहीं बेटी, कहीं बहन और कहीं लोकमाता के रूप में पूजा जाता है। इसी भाव के कारण बड़ी जात की यात्रा में नंदा को मायके से कैलाश स्थित अपने ससुराल की ओर विदा करने की परंपरा का भाव भी जुड़ा हुआ है।
बैराकुंड में पूजा-अर्चना के दौरान श्रद्धालुओं की मौजूदगी रही। धार्मिक अनुष्ठानों में स्थानीय पुजारी और परंपरा से जुड़े लोग शामिल हुए। इस दौरान देवी-देवताओं के अवतरित होने की बात भी स्थानीय आस्था और परंपरा के संदर्भ में सामने आई। पहाड़ के कई क्षेत्रों में देव-अवतरित होने की परंपरा लोक धार्मिक व्यवस्था का हिस्सा है। श्रद्धालु इसे देवी-देवताओं की उपस्थिति और आशीर्वाद से जोड़कर देखते हैं।
बड़ी जात की खासियत यही है कि यात्रा के दौरान केवल एक मंदिर या एक गांव की पूजा नहीं होती। जैसे-जैसे डोली आगे बढ़ती है, अलग-अलग गांवों की अपनी धार्मिक परंपराएं यात्रा का हिस्सा बनती जाती हैं। कहीं विशेष पूजा होती है, कहीं देवी-देवताओं का आह्वान किया जाता है और कहीं ग्रामीण पारंपरिक तरीके से डोली का स्वागत करते हैं। इससे यात्रा एक गांव की धार्मिक गतिविधि न रहकर पूरे क्षेत्र की सामूहिक आस्था का रूप ले लेती है।
बैराकुंड में भगवान शिव की पूजा के बाद यात्रा का अगला चरण मटई और ग्वाड़ क्षेत्र की ओर रहा। यात्रा मार्ग से जुड़े गांवों में मां नंदा के स्वागत को लेकर पहले से तैयारियां की गई थीं। बड़ी जात के कारण इन गांवों में प्रवासी ग्रामीण भी अपने पैतृक गांव लौट रहे हैं। यात्रा की तारीख नजदीक आने के साथ गांवों के रास्तों की सफाई और व्यवस्था पर भी स्थानीय स्तर पर काम किया गया था।
इस यात्रा में प्रवासियों की भागीदारी भी विशेष रूप से देखने को मिलती है। पहाड़ से बाहर रोजगार या अन्य कारणों से रहने वाले लोग बड़ी जात के समय अपने गांव लौटते हैं। इससे गांवों में लंबे समय बाद फिर से रौनक दिखाई देती है। परिवारों के लोग एक साथ जुटते हैं, पुराने रिश्ते और सामाजिक संपर्क मजबूत होते हैं तथा नई पीढ़ी को अपनी पारंपरिक संस्कृति से जोड़ने का अवसर मिलता है।
मां नंदा की बड़ी जात को केवल धार्मिक यात्रा कहने से इसकी पूरी तस्वीर सामने नहीं आती। यह कुमाऊं और गढ़वाल के पर्वतीय समाज में देवी परंपरा, गांवों की सामूहिक व्यवस्था और पीढ़ियों से चली आ रही लोक संस्कृति का भी हिस्सा है। यात्रा के दौरान ढोल-दमाऊं की थाप, जयकारों और पारंपरिक अनुष्ठानों से पूरा क्षेत्र धार्मिक वातावरण में डूब जाता है। 2026 की यात्रा के लिए भी बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के शामिल होने की जानकारी सामने आई है।
इस बार यात्रा को लेकर एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि 2026 में नंदा देवी की बड़ी जात और नौटी से होने वाली मुख्य राजजात को लेकर अलग-अलग निर्णय सामने आए। नौटी की राजजात समिति ने 2026 की मुख्य राजजात को 2027 तक स्थगित करने का निर्णय लिया, जबकि कुरुड़ से जुड़े हक-हकूकधारियों और ग्रामीण प्रतिनिधियों ने इस वर्ष बड़ी जात निकालने का निर्णय किया। इसलिए कुरुड़ से निकली 2026 की बड़ी जात को सीधे तौर पर नौटी की राजजात का समान आयोजन बताना सही नहीं होगा।
कुरुड़ से बड़ी जात निकाले जाने के पीछे स्थानीय धार्मिक परंपरा और हक-हकूकधारियों की भूमिका महत्वपूर्ण रही। जनवरी में ही दिनपट्टा कार्यक्रम के दौरान 5 सितंबर से यात्रा शुरू करने का निर्णय घोषित किया गया था। उस समय मां नंदा के अवतारी पुरुष पर अवतरित होने और कैलाश जाने की इच्छा जताने की धार्मिक मान्यता से यात्रा की तिथि को जोड़ा गया था। इसके बाद 21 दिन के यात्रा कार्यक्रम की तैयारी शुरू हुई।
यात्रा में चौसिंग्या खाडू की भूमिका भी श्रद्धालुओं के लिए खास आकर्षण का विषय है। इस वर्ष सुंग गांव का चार सींग वाला मेढ़ा यात्रा से जुड़ा है। स्थानीय मान्यता के अनुसार यह खाडू मां नंदा की यात्रा में मार्गदर्शक की भूमिका निभाता है। इसे यात्रा की धार्मिक परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है और इसके साथ भी कई पारंपरिक मान्यताएं जुड़ी हुई हैं।
कुरुड़ से शुरू हुई यात्रा के आगे बढ़ने के साथ अलग-अलग पड़ावों पर श्रद्धालुओं की संख्या भी बढ़ती जा रही है। स्थानीय लोग अपने-अपने स्तर पर यात्रियों के लिए जरूरी व्यवस्थाएं करते हैं। पहाड़ी रास्तों में यात्रा आसान नहीं होती। कई स्थानों पर पैदल मार्ग, ऊंचाई, मौसम और भौगोलिक परिस्थितियां श्रद्धालुओं के सामने चुनौती पैदा करती हैं। ऐसे में पड़ावों पर स्थानीय सहयोग यात्रा को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
बैराकुंड में भगवान शिव की पूजा के बाद देवी-देवताओं के अवतरण की धार्मिक प्रक्रिया ने श्रद्धालुओं के बीच विशेष उत्साह पैदा किया। ऐसे अवसरों पर स्थानीय लोग बड़ी संख्या में एकत्र होते हैं और पूजा-अर्चना के साथ अपनी मनोकामनाएं भी रखते हैं। धार्मिक विश्वास के अनुसार देवी-देवताओं से आशीर्वाद प्राप्त करना यात्रा की सफलता और क्षेत्र की सुख-समृद्धि से जोड़ा जाता है।
यात्रा के दौरान मां नंदा की डोली जहां भी पहुंचती है, वहां श्रद्धालु पारंपरिक तरीके से उसका स्वागत करते हैं। महिलाओं की भी बड़ी भागीदारी रहती है। कई स्थानों पर महिलाएं मंगलगीत और पारंपरिक लोकगीत गाती हैं। ढोल-दमाऊं और अन्य पारंपरिक वाद्य यात्रा के धार्मिक वातावरण को और जीवंत बनाते हैं। इससे पहाड़ की सांस्कृतिक विरासत भी सामने आती है।
मां नंदा को उत्तराखंड में बेटी के रूप में देखने की परंपरा बड़ी जात के भावनात्मक पक्ष को और मजबूत करती है। लोकमान्यता के अनुसार नंदा अपने मायके से कैलाश की ओर जाती हैं। इसलिए डोली की विदाई को बेटी को ससुराल भेजने की परंपरा से जोड़ा जाता है। यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं के भावुक होने का एक कारण यह भी है कि मां नंदा की विदाई को अपने घर की बेटी की विदाई जैसा माना जाता है।
यात्रा का अंतिम धार्मिक लक्ष्य कैलाश-होमकुंड क्षेत्र से जुड़ा है। यह मार्ग कठिन हिमालयी क्षेत्र से होकर गुजरता है। इसी कारण बड़ी जात केवल धार्मिक आस्था की परीक्षा नहीं, बल्कि शारीरिक और सामुदायिक सहभागिता की भी यात्रा बन जाती है। श्रद्धालु कठिन रास्तों और मौसम की चुनौतियों के बीच डोली के साथ आगे बढ़ते हैं।
इस यात्रा को ‘हिमालयी महाकुंभ’ कहे जाने का कारण भी इसकी व्यापक धार्मिक और सांस्कृतिक भागीदारी से जुड़ा है। हर 12 वर्ष में होने वाली इस बड़ी यात्रा के लिए देश के अलग-अलग हिस्सों में रहने वाले प्रवासी उत्तराखंडी भी अपने गांव लौटते हैं। इससे स्थानीय बाजारों और गांवों में भी गतिविधियां बढ़ती हैं। कई गांवों में लंबे समय बाद परिवारों के सदस्य एक साथ दिखाई देते हैं।
बड़ी जात के कारण चमोली के यात्रा मार्ग से जुड़े गांवों में धार्मिक पर्यटन और स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी गति मिलती है। श्रद्धालुओं के आने से स्थानीय दुकानदारों, छोटे व्यापारियों और सेवा से जुड़े लोगों की गतिविधियां बढ़ती हैं। हालांकि कठिन हिमालयी मार्ग के कारण प्रशासन और स्थानीय समितियों के लिए सुरक्षा व्यवस्था भी उतनी ही महत्वपूर्ण रहती है।
इस वर्ष यात्रा को लेकर पहले से ही गांवों में सफाई अभियान चलाए गए। रास्तों की स्थिति सुधारने, पड़ावों पर व्यवस्थाएं करने और श्रद्धालुओं की सुविधा सुनिश्चित करने की कोशिश की गई। धार्मिक आयोजन होने के बावजूद इतनी लंबी पैदल यात्रा में मौसम, स्वास्थ्य और रास्ते की स्थिति पर लगातार नजर रखना जरूरी है।
बैराकुंड में भगवान शिव की पूजा का प्रसंग इसी व्यापक यात्रा का एक पड़ाव है, लेकिन धार्मिक दृष्टि से इसका अपना महत्व है। मां नंदा और भगवान शिव की धार्मिक परंपरा से जुड़े होने के कारण श्रद्धालु इस पूजा को विशेष श्रद्धा से देखते हैं। पूजा के बाद यात्रा का आगे बढ़ना इस बात का संकेत है कि मां नंदा की डोली अपने निर्धारित मार्ग पर लगातार आगे बढ़ रही है।
मटई और ग्वाड़ जैसे पड़ावों पर भी मां नंदा के स्वागत को लेकर श्रद्धालुओं में उत्साह है। यात्रा के कार्यक्रम के अनुसार डोली आगे बढ़ते हुए कई गांवों में रात्रि प्रवास करेगी। हर पड़ाव पर स्थानीय लोग पारंपरिक जिम्मेदारी निभाएंगे और अगले चरण के लिए यात्रा को विदा करेंगे।
आने वाले दिनों में यात्रा के और महत्वपूर्ण पड़ाव सामने आएंगे। रामणी में विभिन्न डोलियों और छंतोलियों का मिलन भी यात्रा का महत्वपूर्ण चरण माना जाता है। उपलब्ध कार्यक्रम के अनुसार यहां बंड, दशमद्वार और लाता की डोलियों के साथ जाख देवता और बदरीनाथ की छंतोली के मिलन की परंपरा है। ऐसे अवसरों पर यात्रा का धार्मिक और सांस्कृतिक स्वरूप और व्यापक हो जाता है।
कुल मिलाकर नंदा देवी बड़ी जात इस समय चमोली के पहाड़ों में आस्था और परंपरा की एक जीवंत तस्वीर पेश कर रही है। बैराकुंड में भगवान शिव की पूजा, देवी-देवताओं के अवतरित होने की स्थानीय धार्मिक मान्यता और उसके बाद मां नंदा की डोली का आगे बढ़ना यात्रा के उसी पारंपरिक स्वरूप को सामने लाता है, जिसे पीढ़ियों से स्थानीय समाज सहेजता आया है।
कुरुड़ से शुरू हुई यह यात्रा अब एक-एक पड़ाव पार करते हुए कैलाश-होमकुंड की ओर बढ़ रही है। रास्ते में आने वाले हर गांव के लिए मां नंदा का आगमन केवल धार्मिक अवसर नहीं, बल्कि अपने मायके की बेटी के घर आने जैसा भावनात्मक क्षण भी है। यही वजह है कि बड़ी जात के दौरान पूरा क्षेत्र मां नंदा के जयकारों, ढोल-दमाऊं और लोक परंपराओं से गूंज रहा है।









