NEET री-एग्जाम को लेकर बढ़ते तनाव के बीच देश में दो दिनों में चार छात्रों की आत्महत्या के मामले सामने आए हैं। कोयंबटूर की छात्रा ने सुसाइड नोट में दोबारा परीक्षा का डर जताया, जबकि अहमदाबाद में एक छात्र ने इमारत से कूदकर जान दे दी।
कोयंबटूर: भारत में मेडिकल प्रवेश परीक्षा NEET-UG 2026 को लेकर जारी विवाद के बीच छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य को लेकर गंभीर चिंताएं सामने आई हैं। पिछले दो दिनों में देश के अलग-अलग हिस्सों से चार छात्रों की मौत की खबरों ने परीक्षा प्रणाली, प्रतिस्पर्धी माहौल और युवा अभ्यर्थियों पर बढ़ते मनोवैज्ञानिक दबाव को लेकर नई बहस छेड़ दी है।
ताजा मामलों में तमिलनाडु के कोयंबटूर की एक 19 वर्षीय छात्रा और गुजरात के अहमदाबाद के एक 17 वर्षीय छात्र की मौत शामिल है। दोनों छात्र राष्ट्रीय पात्रता एवं प्रवेश परीक्षा (NEET) की तैयारी कर रहे थे। इन घटनाओं ने न केवल परिवारों को गहरे सदमे में डाल दिया है, बल्कि देशभर में शिक्षा व्यवस्था और परीक्षा प्रबंधन को लेकर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।
कोयंबटूर की छात्रा मेडिकल कॉलेज में प्रवेश का इंतजार कर रही थी
तमिलनाडु के कोयंबटूर में रहने वाली 19 वर्षीय छात्रा अनुकीर्तना लंबे समय से डॉक्टर बनने का सपना देख रही थी। उसने हाल ही में NEET परीक्षा दी थी और परिणामों के आधार पर मेडिकल कॉलेज में प्रवेश मिलने की उम्मीद कर रही थी।
परिवार के अनुसार परीक्षा रद्द होने और दोबारा परीक्षा आयोजित किए जाने की घोषणा के बाद वह मानसिक रूप से काफी परेशान रहने लगी थी। बताया गया कि वह भविष्य को लेकर चिंतित थी और दोबारा परीक्षा देने के दबाव को लेकर असहज महसूस कर रही थी। अनुकीर्तना ने अपने कुछ रिश्तेदारों को संदेश भेजकर परीक्षा को लेकर अपनी चिंता व्यक्त की थी। परिवार का कहना है कि वह पढ़ाई में मेहनती थी और गरीब मरीजों की सेवा करने के उद्देश्य से डॉक्टर बनना चाहती थी।
परिवार और समाज में शोक का माहौल
अनुकीर्तना की मौत के बाद स्थानीय स्तर पर गहरा दुख और आक्रोश देखा गया। परिवार ने परीक्षा प्रणाली और हालिया घटनाक्रम को लेकर सवाल उठाए हैं। छात्रा के परिजनों का कहना है कि लाखों छात्रों के भविष्य से जुड़ी परीक्षाओं में पारदर्शिता और स्थिरता सुनिश्चित की जानी चाहिए ताकि युवाओं को अनिश्चितता और तनाव का सामना न करना पड़े। घटना के बाद विभिन्न छात्र संगठनों और सामाजिक समूहों ने भी छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता देने की मांग की है।
अहमदाबाद में भी NEET अभ्यर्थी की मौत
गुजरात के अहमदाबाद में भी एक 17 वर्षीय छात्र की मौत का मामला सामने आया है। पुलिस के अनुसार छात्र NEET परीक्षा की तैयारी कर रहा था।
अधिकारियों ने मामले की जांच शुरू कर दी है और घटनाक्रम के सभी पहलुओं की पड़ताल की जा रही है। प्रारंभिक जानकारी के अनुसार छात्र लंबे समय से मेडिकल प्रवेश परीक्षा की तैयारी में जुटा हुआ था। पुलिस ने कहा है कि जांच पूरी होने के बाद ही घटना के कारणों को लेकर कोई अंतिम निष्कर्ष निकाला जाएगा।
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दो दिनों में चार छात्रों की मौत से बढ़ी चिंता
रिपोर्टों के अनुसार पिछले दो दिनों में NEET से जुड़े चार छात्रों की मौत के मामले सामने आए हैं। इससे पहले उत्तराखंड के देहरादून और उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में भी छात्रों की मौत की घटनाएं दर्ज की गई थीं।
इन घटनाओं ने देशभर में अभिभावकों, शिक्षकों और मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों को चिंतित कर दिया है। विशेषज्ञों का कहना है कि प्रतियोगी परीक्षाओं का दबाव, भविष्य की अनिश्चितता और सामाजिक अपेक्षाएं कई छात्रों के लिए गंभीर मानसिक तनाव का कारण बन सकती हैं।
NEET परीक्षा विवाद क्या है?
NEET-UG भारत की सबसे बड़ी मेडिकल प्रवेश परीक्षा है। इसके माध्यम से MBBS, BDS, आयुष और अन्य स्वास्थ्य विज्ञान पाठ्यक्रमों में प्रवेश दिया जाता है।
इस वर्ष आयोजित परीक्षा के बाद कई राज्यों से कथित पेपर लीक और परीक्षा अनियमितताओं की शिकायतें सामने आई थीं। जांच के बाद परीक्षा को रद्द करने और पुनः आयोजित करने का निर्णय लिया गया।
इस फैसले का असर लाखों छात्रों पर पड़ा, जिन्होंने परीक्षा की तैयारी में महीनों और कई मामलों में वर्षों का समय लगाया था। परीक्षा दोबारा होने की घोषणा के बाद कई छात्र तनाव और असमंजस की स्थिति में आ गए।
मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों की चेतावनी
मनोवैज्ञानिकों और शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं को लेकर छात्रों पर अत्यधिक दबाव बनता जा रहा है।
विशेषज्ञों के अनुसार भारत में मेडिकल और इंजीनियरिंग जैसे पेशों को लेकर सामाजिक अपेक्षाएं इतनी अधिक हैं कि कई छात्र अपनी रुचियों के बजाय दबाव में करियर विकल्प चुनते हैं।
मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि परीक्षा परिणाम को जीवन का अंतिम लक्ष्य नहीं माना जाना चाहिए। छात्रों को भावनात्मक सहयोग, परामर्श सेवाएं और तनाव प्रबंधन के अवसर उपलब्ध कराना आवश्यक है।
अभिभावकों और संस्थानों की भूमिका
शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि छात्रों की सफलता केवल परीक्षा परिणामों से नहीं मापी जानी चाहिए। अभिभावकों को बच्चों से नियमित संवाद बनाए रखना चाहिए और उन पर अवास्तविक अपेक्षाओं का बोझ नहीं डालना चाहिए।
कोचिंग संस्थानों और स्कूलों को भी मानसिक स्वास्थ्य सहायता कार्यक्रमों को मजबूत करने की आवश्यकता है। नियमित काउंसलिंग, तनाव प्रबंधन कार्यशालाएं और भावनात्मक सहायता तंत्र छात्रों को कठिन परिस्थितियों से उबरने में मदद कर सकते हैं।
रीक्षा सुधार की मांग तेज
हालिया घटनाओं के बाद शिक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग फिर तेज हो गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि राष्ट्रीय स्तर की परीक्षाओं में पारदर्शिता, सुरक्षा और समयबद्ध निर्णय अत्यंत आवश्यक हैं।
यदि परीक्षा प्रक्रिया पर छात्रों का विश्वास कमजोर होता है, तो इसका असर केवल शैक्षणिक व्यवस्था पर नहीं बल्कि लाखों युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य और भविष्य की योजनाओं पर भी पड़ता है।










