बड़वानी के अरुण बड़ोले ने NEET परीक्षा में पारदर्शिता की मांग को लेकर इंदौर में 26 दिनों तक शांतिपूर्ण आंदोलन का नेतृत्व किया। आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद उन्होंने पढ़ाई, परिवार की जिम्मेदारियों और छात्र हितों के बीच संतुलन बनाकर अपनी अलग पहचान बनाई।
इंदौर: NEET परीक्षा से जुड़े विवाद के दौरान मध्य प्रदेश में छात्रों की आवाज़ बनकर उभरे अरुण बड़ोले ने इंदौर में 26 दिनों तक शांतिपूर्ण आंदोलन का नेतृत्व किया। बड़वानी के एक साधारण परिवार से आने वाले अरुण ने सीमित संसाधनों और पारिवारिक जिम्मेदारियों के बावजूद शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता की मांग को लगातार उठाया और हजारों छात्रों का समर्थन हासिल किया।
26 दिनों तक शांतिपूर्ण आंदोलन का किया नेतृत्व
NEET परीक्षा को लेकर उठे विवाद के बीच मध्य प्रदेश के इंदौर में छात्रों के आंदोलन का एक प्रमुख चेहरा अरुण बड़ोले रहे। बड़वानी जिले के राजपुर तहसील स्थित लिंबई गांव के रहने वाले अरुण ने शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता और निष्पक्ष परीक्षा प्रणाली की मांग को लेकर लगातार 26 दिनों तक शांतिपूर्ण प्रदर्शन किया। उनका कहना था कि यह आंदोलन किसी व्यक्ति या संस्था के खिलाफ नहीं, बल्कि लाखों छात्रों के भविष्य और परीक्षा प्रक्रिया में भरोसा कायम रखने के लिए था।

अरुण पिछले छह वर्षों से इंदौर में रहकर पढ़ाई कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि देशभर में चल रहे छात्र आंदोलनों और परीक्षा से जुड़े विवादों ने उन्हें भी आवाज़ उठाने के लिए प्रेरित किया। 30 जून को जब आंदोलन शुरू हुआ, तब उनके साथ केवल कुछ छात्र थे, लेकिन समय के साथ कई सामाजिक संगठनों और युवाओं का समर्थन भी मिलने लगा। देखते ही देखते यह प्रदर्शन इंदौर में चर्चा का विषय बन गया।
संघर्षों के बीच नहीं छोड़ी पढ़ाई
अरुण बड़ोले की निजी जिंदगी भी संघर्षों से भरी रही है। उनका परिवार आर्थिक रूप से कमजोर है। उनकी मां खेतों में मजदूरी कर परिवार का पालन-पोषण करती हैं, जबकि पिता की आंखों की रोशनी कमजोर होने के कारण नियमित रूप से काम करना उनके लिए आसान नहीं है। परिवार में तीन बहनों की जिम्मेदारी भी है, जिससे आर्थिक चुनौतियां और बढ़ जाती हैं।
इन परिस्थितियों के बावजूद अरुण ने अपनी पढ़ाई जारी रखी। इंदौर में रहने और पढ़ाई का खर्च उठाने के लिए वे ड्राइविंग का काम भी करते हैं। उनका मानना है कि कठिन परिस्थितियां व्यक्ति को मजबूत बनाती हैं और यही अनुभव उन्हें दूसरे छात्रों की समस्याओं को समझने की ताकत देता है।
पारदर्शी परीक्षा प्रणाली की उठाई मांग
अरुण का कहना है कि प्रतियोगी परीक्षाओं पर लाखों युवाओं का भविष्य निर्भर करता है। यदि परीक्षा प्रक्रिया पर सवाल उठते हैं, तो छात्रों का विश्वास भी प्रभावित होता है। इसी वजह से उन्होंने पूरे आंदोलन के दौरान शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रखी।
उन्होंने बार-बार इस बात पर जोर दिया कि उनका उद्देश्य केवल परीक्षा प्रणाली को अधिक पारदर्शी, निष्पक्ष और भरोसेमंद बनाने की मांग करना था। उनका मानना है कि शिक्षा व्यवस्था में सुधार केवल छात्रों के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे देश के भविष्य के लिए आवश्यक है।
आगे भी छात्र हितों के लिए रहेंगे सक्रिय
आंदोलन समाप्त होने के बाद भी अरुण बड़ोले ने शिक्षा से जुड़े मुद्दों पर सक्रिय रहने की बात कही है। उनका कहना है कि यदि भविष्य में विद्यार्थियों के हितों से जुड़ा कोई महत्वपूर्ण विषय सामने आता है, तो वे फिर शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक तरीके से अपनी आवाज़ उठाएंगे।
अरुण की कहानी यह दिखाती है कि सीमित संसाधन और कठिन पारिवारिक परिस्थितियां किसी व्यक्ति के इरादों को कमजोर नहीं कर सकतीं। पढ़ाई, रोजगार और परिवार की जिम्मेदारियों के साथ छात्र हितों के लिए लगातार आवाज़ उठाकर उन्होंने कई युवाओं को प्रेरित किया है। उनकी यात्रा इस बात का उदाहरण है कि दृढ़ संकल्प, अनुशासन और सामाजिक जिम्मेदारी के साथ कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी सकारात्मक बदलाव की दिशा में प्रयास किया जा सकता है।










