नीतीश के ‘राजनीतिक दांव’में फंसे तेजस्वी? बड़ी वजहों ने बदल दिया चुनावी गणित

बिहार चुनाव में एनडीए की आक्रामक रणनीति और नीतीश कुमार की वापसी से तेजस्वी यादव की पकड़ कमजोर, महागठबंधन का जनाधार प्रभावित।

बिहार विधानसभा चुनाव के शुरुआती रुझान यह साफ दिखा रहे हैं कि तेजस्वी यादव की पकड़ कमजोर पड़ी है। न सिर्फ मुख्यमंत्री पद का उनका सपना दूर होता नजर आ रहा है, बल्कि आरजेडी और महागठबंधन की स्थिति भी पिछली बार से कमजोर दिख रही है। संकेत साफ हैं—एनडीए ने उनके वोट बैंक में गहरी सेंध लगाई है।

पटना: बिहार विधानसभा चुनाव के शुरुआती नतीजों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि तेजस्वी यादव अपेक्षित प्रदर्शन नहीं कर पाए। महागठबंधन की चुनावी रणनीति, जातिगत समीकरणों में कमजोरी, नीतीश कुमार की वापसी से उपजी राजनीतिक धारणा और एनडीए की आक्रामक सोशल इंजीनियरिंग ने तेजस्वी के जनाधार को कमजोर किया है। शुरुआती रुझानों में आरजेडी का ग्राफ गिरता दिख रहा है, जबकि एनडीए ने ग्रामीण इलाकों से लेकर शहरी मतदाताओं तक में प्रभावी पैठ बनाई है।

विशेषज्ञ मानते हैं कि गठबंधन के भीतर तालमेल की कमी, उम्मीदवार चयन में भ्रम और आखिरी समय पर माहौल बनाने में विफलता भी महागठबंधन को भारी पड़ी। इसके साथ ही, युवाओं और महिलाओं के बीच अपेक्षित समर्थन न मिलना भी तेजस्वी के लिए नुकसानदेह रहा। कुल मिलाकर, पटना से लेकर पूरे बिहार तक रुझान इस ओर इशारा कर रहे हैं कि तेजस्वी इस बार राजनीतिक जंग में पिछड़ गए हैं।

वादों की राजनीति और टीम में दरार

तेजस्वी यादव द्वारा मुकेश सहनी को उप मुख्यमंत्री पद का सार्वजनिक वादा महागठबन्धन के लिए उलटा साबित हुआ। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, इस फैसले से एक वर्ग के मतदाता नाखुश हुए, जबकि मुस्लिम वोटर्स को लगा कि उनके लिए कोई स्पष्ट राजनीतिक आश्वासन नहीं दिया गया। 

दूसरी ओर, कांग्रेस और राजद के बीच सीट बंटवारे और ‘सीएम फेस’ को लेकर खींचतान ने माहौल और बिगाड़ दिया। चुनाव अभियान के अंतिम चरण में समझौता तो हुआ, लेकिन तब तक जमीनी समीकरण काफी हद तक बदल चुके थे, जिसका नुकसान महागठबंधन को झेलना पड़ा।

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पारिवारिक विवाद का चुनावी असर

तेजस्वी यादव को चुनावी मैदान में अपने ही परिवार से चुनौती का सामना करना पड़ा। बड़े भाई तेज प्रताप यादव के अलग पार्टी बनाकर उतरने और खुले तौर पर अदावत दिखाने से राजद समर्थकों में भ्रम की स्थिति बनी। तेज प्रताप के बयानों ने यह संकेत दिया कि परिवार अंदरूनी रूप से एकजुट नहीं है।

पुराने नतीजों का बोझ

राजद 2020 के चुनावों में शानदार प्रदर्शन कर चुकी थी, और वही प्रदर्शन तेजस्वी के लिए आत्मविश्वास का आधार बना। लेकिन इस बार मतदाताओं का मूड अलग था। पुरानी सफलता के आधार पर तेजस्वी ने गठबंधन की भूमिका को कम आंका और अकेले दम पर जीत का अतिआत्मविश्वास दिखाया।

परिस्थितियाँ पूरी तरह बदल चुकी थीं—नई राजनीतिक रणनीतियाँ, नए उम्मीदवार, और नया चुनावी समीकरण। ऐसे में 2020 के ट्रेंड को दोहराने की उम्मीद ने उनके चुनाव अभियान की दिशा को गलत मोड़ दिया।

एनडीए की रणनीति में फंस गया महागठबंधन

चुनाव से तुरंत पहले नीतीश सरकार और एनडीए ने लगातार नई घोषणाएँ कीं—कई लाभकारी योजनाएँ, नकदी सहायता और विकास से जुड़े वादे। यह ‘रेवड़ी राजनीति’ सीधे जनता को प्रभावित करने में सफल रही।

तेजस्वी ने भी इसी राह पर चलते हुए आखिरी चरण में महिलाओं को 30-30 हजार रुपये देने का वादा कर दिया। लेकिन जनता उस तरफ झुकी जिसे पहले से लाभ मिल चुका था और जिनकी घोषणाएँ पहले विश्वसनीय लगीं।

एनडीए की प्री-पॉल रणनीति और समय पर किए गए कदमों ने महागठबंधन की योजना को कटघरे में खड़ा कर दिया। मतदाता वही चुनते दिखे, जिनकी रेवड़ियां पहले पहुंच चुकी थीं और जिन पर उन्हें भरोसा था।

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